भारत में विदेशी निवेश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। लंबे समय तक भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिए मॉरीशस सबसे बड़ा रास्ता माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका ने मॉरीशस को पीछे छोड़ते हुए भारत में दूसरा सबसे बड़ा एफडीआई स्रोत बनने का दर्जा हासिल कर लिया है।
यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक निवेशकों के भारत पर बढ़ते भरोसे और भारतीय अर्थव्यवस्था की बदलती ताकत को भी दिखाता है। खास बात यह है कि अब विदेशी कंपनियां टैक्स हेवन देशों के जरिए निवेश करने के बजाय सीधे भारत में पैसा लगा रही हैं।
अमेरिका से निवेश क्यों बढ़ा?
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान अमेरिका से भारत में आने वाला इक्विटी निवेश दोगुने से अधिक बढ़कर 11 अरब डॉलर के पार पहुंच गया। यह उछाल ऐसे समय में आया है जब वैश्विक कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने और नए निवेश गंतव्य तलाशने में जुटी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तेज आर्थिक वृद्धि, डिजिटल इकोनॉमी का विस्तार, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सुधार और सरकार की निवेश-समर्थक नीतियों ने अमेरिकी कंपनियों को आकर्षित किया है। हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने कहा था कि अमेरिकी कंपनियों ने हाल के महीनों में करीब 60 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। इससे साफ है कि आने वाले वर्षों में भी अमेरिका से निवेश का प्रवाह मजबूत रह सकता है।
अभी भी नंबर-1 पर कौन?
हालांकि अमेरिका तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन भारत में एफडीआई के मामले में अभी भी Singapore पहले स्थान पर बना हुआ है। पिछले वित्त वर्ष में कुल इक्विटी निवेश प्रवाह में सिंगापुर की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई रही। मॉरीशस के साथ टैक्स संधि में बदलाव के बाद कई वैश्विक कंपनियों ने निवेश के लिए सिंगापुर को प्राथमिक रूट के रूप में अपनाया है।
भारत में एफडीआई का नया समीकरण
| देश | स्थिति |
|---|---|
| सिंगापुर | सबसे बड़ा एफडीआई स्रोत |
| अमेरिका | दूसरे स्थान पर पहुंचा |
| मॉरीशस | तीसरे स्थान पर खिसका |
| जापान | निवेश में तेज उछाल |
| केमैन आइलैंड्स | चुनिंदा बड़े निवेशों से बढ़ोतरी |
मॉरीशस क्यों पीछे छूटा?
एक समय ऐसा था जब भारत में आने वाले बड़े हिस्से का एफडीआई मॉरीशस के जरिए आता था। इसकी सबसे बड़ी वजह टैक्स लाभ थे। लेकिन भारत और मॉरीशस के बीच टैक्स संधि में बदलाव के बाद कंपनियों के लिए वहां से निवेश करना उतना फायदेमंद नहीं रहा। अब विदेशी कंपनियां अधिक पारदर्शी और सीधे निवेश मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। यही कारण है कि अमेरिका जैसे देशों से सीधा निवेश बढ़ता दिखाई दे रहा है।
टैक्स हेवन पूरी तरह खत्म नहीं हुए
हालांकि निवेश का रुझान बदल रहा है, लेकिन टैक्स हेवन देशों की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। उदाहरण के तौर पर, केमैन आइलैंड्स से भारत में निवेश 2024-25 के 371 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 2.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया। अधिकारियों का मानना है कि यह वृद्धि कुछ बड़े सौदों और चुनिंदा निवेशों की वजह से हुई।
किन सेक्टर में सबसे ज्यादा निवेश आया?
इस बार एफडीआई का सेक्टोरल पैटर्न भी काफी बदला हुआ नजर आया। पहले जहां सर्विसेज सेक्टर निवेश का सबसे बड़ा केंद्र होता था, वहीं अब टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
1. कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर सेक्टर बना नंबर-1
डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी मांग बढ़ने के कारण कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर सेक्टर निवेश के मामले में शीर्ष पर पहुंच गया। भारत में डिजिटल इकोनॉमी के विस्तार और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की तेजी से बढ़ती संख्या ने विदेशी कंपनियों को आकर्षित किया है। बड़ी टेक कंपनियां भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने पर जोर दे रही हैं।
2. फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में बड़ा उछाल
फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में इक्विटी निवेश पांच गुना से अधिक बढ़ गया।
इसके पीछे कई कारण हैं बढ़ती घरेलू मांग, सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं, कृषि और फूड सप्लाई चेन में सुधार, निर्यात की संभावनाएं भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों में शामिल हो चुका है, जिसका फायदा विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने में मिल रहा है।
3. शिपिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में रिकॉर्ड वृद्धि
सी ट्रांसपोर्ट और शिपिंग सेक्टर में करीब 2 अरब डॉलर का निवेश आया, जो लगभग 30 गुना की रिकॉर्ड वृद्धि है। वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव, बंदरगाहों के आधुनिकीकरण और लॉजिस्टिक्स सुधारों के कारण विदेशी कंपनियां भारत को एशिया के बड़े मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब के रूप में देख रही हैं।
सरकार की आत्मनिर्भरता रणनीति का असर
केंद्र सरकार लगातार उन सेक्टरों में निवेश बढ़ाने की कोशिश कर रही है जहां भारत अभी भी आयात पर ज्यादा निर्भर है। सरकार का फोकस इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, ग्रीन एनर्जी, सप्लाई चेन विविधीकरण पर है। सरकार की “आत्मनिर्भर भारत” नीति का मकसद सिर्फ घरेलू उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक निवेश केंद्र बनाना भी है।
भारत पर क्यों बढ़ रहा दुनिया का भरोसा?
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को लेकर विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ने की कई बड़ी वजहें हैं:
मजबूत आर्थिक विकास
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
बड़ा उपभोक्ता बाजार
140 करोड़ से अधिक आबादी वाला भारत कंपनियों के लिए विशाल बाजार है।
चीन प्लस वन रणनीति
कई वैश्विक कंपनियां चीन के विकल्प के तौर पर भारत में निवेश बढ़ा रही हैं।
डिजिटल क्रांति
UPI, डिजिटल पेमेंट, ई-कॉमर्स और इंटरनेट इकोनॉमी ने निवेश का नया माहौल तैयार किया है।
सरकारी सुधार
GST, PLI स्कीम, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और श्रम सुधार जैसे कदमों ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है।
आम लोगों पर इसका क्या असर होगा?
एफडीआई बढ़ने का सीधा फायदा आम अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार को मिल सकता है।
संभावित फायदे
नई नौकरियों का सृजन, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूती, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, निर्यात में बढ़ोतरी, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, स्टार्टअप इकोसिस्टम को फायदा अगर विदेशी निवेश इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में भारत एशिया के सबसे बड़े निवेश केंद्रों में शामिल हो सकता है।
निष्कर्ष
भारत में एफडीआई का बदलता पैटर्न यह दिखाता है कि वैश्विक कंपनियां अब भारत को सिर्फ एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक निवेश गंतव्य के रूप में देख रही हैं। अमेरिका का मॉरीशस को पीछे छोड़ना इस बदलाव का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
सिंगापुर अभी भी शीर्ष पर है, लेकिन अमेरिका, जापान और अन्य विकसित देशों से बढ़ता निवेश यह साफ करता है कि भारत वैश्विक आर्थिक नक्शे पर तेजी से मजबूत स्थिति बना रहा है। आने वाले समय में टेक्नोलॉजी, डेटा सेंटर, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स सेक्टर भारत की एफडीआई ग्रोथ के सबसे बड़े इंजन बन सकते हैं।
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