भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर सरकार की आक्रामक नीति ने पिछले कुछ वर्षों में एथेनॉल उद्योग को तेज रफ्तार दी है। लेकिन अब यही सेक्टर एक नई चुनौती का सामना कर रहा है। देश की एथेनॉल उत्पादन क्षमता इतनी तेजी से बढ़ चुकी है कि अब मांग उसके मुकाबले काफी पीछे रह गई है। रेटिंग एजेंसी केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) की एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की एथेनॉल उत्पादन क्षमता करीब 2,000 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है, जबकि E20 ब्लेंडिंग और अन्य उपयोगों को मिलाकर कुल मांग अभी लगभग 1,400-1,450 करोड़ लीटर ही है।
रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले दो वर्षों में स्थिति और दिलचस्प हो सकती है क्योंकि वित्त वर्ष 2027 तक अतिरिक्त 400 करोड़ लीटर क्षमता और जुड़ने की उम्मीद है। यानी देश की कुल एथेनॉल क्षमता 2,400 करोड़ लीटर के आसपास पहुंच सकती है। ऐसे में उद्योग में ओवरसप्लाई यानी जरूरत से ज्यादा उत्पादन की स्थिति बनती दिखाई दे रही है।
E20 लक्ष्य हासिल, लेकिन अब मांग बनी चुनौती
भारत सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य तय समय से पांच साल पहले ही दिसंबर 2025 में हासिल कर लिया था। इसे ऊर्जा सुरक्षा और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना गया। लेकिन अब सवाल यह है कि आगे इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता का उपयोग कैसे होगा।
CareEdge Ratings की रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल E20 ब्लेंडिंग के लिए लगभग 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की जरूरत है। इसके अलावा औद्योगिक और अन्य गैर-ईंधन उपयोगों के लिए 300-350 करोड़ लीटर की मांग है। यानी कुल मिलाकर अभी लगभग 1,450 करोड़ लीटर तक की खपत ही संभव है।
इसके मुकाबले देश की उत्पादन क्षमता कहीं ज्यादा हो चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल बाजार में उपलब्ध कुल एथेनॉल का केवल लगभग 60 प्रतिशत ही उपयोग हो पा रहा है। इससे उद्योग की क्षमता उपयोग दर पर दबाव बढ़ रहा है।
उद्योग में शुरू हुआ Consolidation Phase
रिपोर्ट के अनुसार अब एथेनॉल सेक्टर तेजी से विस्तार वाले दौर से निकलकर “कंसोलिडेशन फेज” में प्रवेश कर रहा है। इसका मतलब है कि अब कंपनियां नई बड़ी क्षमता जोड़ने के बजाय मौजूदा प्लांट्स की क्षमता सुधारने, ऑपरेशन बेहतर करने और लागत कम करने पर फोकस करेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगले तीन वर्षों तक उद्योग की औसत क्षमता उपयोग दर 65-75 प्रतिशत के बीच रह सकती है। इसका सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ सकता है क्योंकि जब उत्पादन क्षमता ज्यादा और मांग कम होती है तो मार्जिन दबाव में आ जाते हैं।
रिपोर्ट में बताया गया कि लगभग 700 करोड़ लीटर अतिरिक्त सप्लाई ने उद्योग की कमाई पर दबाव बढ़ा दिया है।
कुछ राज्यों में भारी सरप्लस, कुछ में कमी
एथेनॉल क्षमता विस्तार पूरे देश में समान रूप से नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर डिस्टिलरी क्षमता बनाई गई है। इसका नतीजा यह हुआ कि कई राज्यों में भारी सरप्लस पैदा हो गया है।
रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में लगभग 277 करोड़ लीटर का सरप्लस है। वहीं तमिलनाडु में करीब 77 करोड़ लीटर की कमी बनी हुई है।
यह क्षेत्रीय असंतुलन लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहा है। एथेनॉल को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाने में अतिरिक्त लागत आती है, जिससे कंपनियों की लाभप्रदता प्रभावित हो सकती है।
EPC कंपनियों की रफ्तार भी हुई धीमी
एथेनॉल सेक्टर में पिछले कुछ वर्षों में Engineering, Procurement and Construction (EPC) कंपनियों को भारी काम मिला था क्योंकि देशभर में नए प्लांट लगाए जा रहे थे। लेकिन अब नई परियोजनाओं की रफ्तार धीमी पड़ने लगी है।
रिपोर्ट के अनुसार अब उद्योग का फोकस नई फैक्ट्री लगाने के बजाय Brownfield expansion, Debottlenecking, Operational efficiency, और मौजूदा संयंत्रों के आधुनिकीकरण पर शिफ्ट हो रहा है।
इसका असर उन कंपनियों पर भी पड़ सकता है जो एथेनॉल प्लांट निर्माण से जुड़ी हुई हैं।
आगे की उम्मीद E85 और Flex Fuel Vehicles पर टिकी
CareEdge Ratings के असिस्टेंट डायरेक्टर नीरज थोराट के अनुसार आने वाले वर्षों में एथेनॉल की मांग बढ़ सकती है, लेकिन इसके लिए सिर्फ E20 काफी नहीं होगा। रिपोर्ट के मुताबिक ESY 2026-27 तक मांग करीब 1,200 करोड़ लीटर और ESY 2029-30 तक लगभग 1,600 करोड़ लीटर तक पहुंच सकती है।
हालांकि इसके लिए भारत में Flex Fuel Vehicles (FFV) और उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन जैसे E85 और E100 को तेजी से अपनाना होगा।
रिपोर्ट में कहा गया कि:
- FY28 तक नई गाड़ियों की बिक्री में FFV की हिस्सेदारी लगभग 5 प्रतिशत होनी चाहिए।
- FY30 तक इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाना होगा।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो नई उत्पादन क्षमता को खपाना मुश्किल हो जाएगा।
सरकार भी तैयार कर रही नई नीति
सरकार अब E20 से आगे बढ़कर E85 और शुद्ध एथेनॉल ईंधन की दिशा में भी कदम बढ़ा रही है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने हाल ही में ऐसे ड्राफ्ट संशोधन जारी किए हैं जिनसे E85 और एक्सक्लूसिव एथेनॉल फ्यूल को बढ़ावा मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत Flex Fuel Vehicles और हाई ब्लेंडिंग मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर देता है तो इससे:
- कच्चे तेल के आयात में कमी,
- किसानों की आय में वृद्धि,
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी,
- और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है।
किसानों और चीनी उद्योग के लिए क्यों अहम है एथेनॉल?
भारत में एथेनॉल उत्पादन का बड़ा हिस्सा गन्ने और मक्का जैसे कृषि उत्पादों से आता है। यही वजह है कि सरकार इसे किसानों की आय बढ़ाने का बड़ा माध्यम मानती है।
एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम से:
- चीनी मिलों को अतिरिक्त कमाई मिली,
- किसानों के बकाया भुगतान में सुधार हुआ,
- और तेल आयात बिल कम करने में मदद मिली।
हालांकि अब ओवरकैपेसिटी की स्थिति से यह चिंता बढ़ रही है कि यदि मांग पर्याप्त नहीं बढ़ी तो उद्योग की वित्तीय स्थिति कमजोर हो सकती है।
भारत के लिए आगे क्या चुनौती?
भारत दुनिया में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है और एथेनॉल इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती “उत्पादन बढ़ाने” की नहीं बल्कि “मांग बढ़ाने” की बन गई है।
यदि:
- Flex Fuel Vehicles तेजी से नहीं बढ़े,
- E85/E100 इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं हुआ,
- और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क मजबूत नहीं किया गया,
तो एथेनॉल उद्योग में भारी निवेश के बावजूद क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले 3-5 साल भारत के एथेनॉल सेक्टर के लिए निर्णायक साबित होंगे। अगर मांग पक्ष मजबूत हुआ तो यह सेक्टर भारत की ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ बन सकता है। लेकिन अगर मांग उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी, तो उद्योग में दबाव और प्रतिस्पर्धा दोनों बढ़ सकते हैं।
Also Read:


