खेती में बदलाव की ऐसी कहानी, जिसने पूरे इलाके को कर दिया हैरान
आज भी देश के कई हिस्सों में किसान छोटी जमीन, खराब मिट्टी और पानी की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में खेती को अक्सर घाटे का सौदा माना जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के एक किसान ने यह साबित कर दिया कि अगर खेती को पारंपरिक तरीके की बजाय वैज्ञानिक और आधुनिक सोच के साथ किया जाए, तो बंजर जमीन भी सोना उगल सकती है।
कोरबा जिले के करतला ब्लॉक के धिनारा गांव के किसान कन्हैया राठिया आज आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। कभी उनकी 2 एकड़ जमीन पथरीली और लगभग बंजर मानी जाती थी। खेती से साल भर में मुश्किल से 15 हजार रुपये की कमाई होती थी। परिवार चलाना भी मुश्किल था। लेकिन आज वही जमीन हर साल उन्हें 2 लाख रुपये से ज्यादा की कमाई दे रही है।
सबसे खास बात यह है कि उन्होंने यह बदलाव किसी बड़ी मशीनरी या भारी निवेश से नहीं, बल्कि मल्टी लेयर फार्मिंग, जैविक खेती और इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल से किया है।
बारिश के भरोसे थी खेती, मुश्किल से चलता था घर
कुछ साल पहले तक कन्हैया राठिया की स्थिति बेहद कमजोर थी। उनकी जमीन पूरी तरह समतल नहीं थी और उसमें बड़े पैमाने पर पत्थर मौजूद थे। सिंचाई की व्यवस्था भी नहीं थी। खेती केवल मानसून पर निर्भर थी। बारिश अच्छी हो जाए तो थोड़ी बहुत फसल मिल जाती थी, लेकिन मौसम खराब होने पर पूरा साल संकट में गुजरता था।
कम उत्पादन और बढ़ती लागत की वजह से खेती से मुनाफा लगभग खत्म हो चुका था। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर खर्च लगातार बढ़ रहा था। ऐसे में खेती छोड़ने की नौबत तक आ गई थी।
लेकिन कन्हैया ने हार नहीं मानी। उन्होंने खेती को नए तरीके से समझने और प्रयोग करने का फैसला किया।
मल्टी लेयर फार्मिंग ने बदल दी किस्मत
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, कन्हैया राठिया ने अपनी जमीन पर मल्टी लेयर फार्मिंग मॉडल अपनाया। यह ऐसी तकनीक है जिसमें एक ही जमीन पर अलग-अलग ऊंचाई और समय वाली कई फसलें एक साथ उगाई जाती हैं।
उन्होंने सबसे पहले अपनी जमीन पर आम और काजू के पौधे लगाए। शुरुआती वर्षों में इन पेड़ों से ज्यादा आय नहीं हुई, लेकिन उन्होंने पेड़ों के बीच की खाली जगह को बेकार नहीं छोड़ा।
इसी जगह पर उन्होंने धान और मूंगफली की खेती शुरू कर दी। इससे उनकी जमीन का हर हिस्सा उपयोग में आने लगा।
इस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि:
- एक फसल खराब होने पर दूसरी फसल से कमाई बनी रही
- जमीन की नमी बनी रही
- मिट्टी की गुणवत्ता सुधरी
- उत्पादन कई गुना बढ़ गया
धीरे-धीरे उनकी जमीन उपजाऊ होने लगी और खेती से स्थायी आमदनी शुरू हो गई।
आम और काजू से बड़ी कमाई, धान और मूंगफली से नियमित आय
कन्हैया का मॉडल केवल एक फसल पर निर्भर नहीं है। यही उनकी सफलता की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। आम और काजू के पेड़ों से उन्हें साल में एक बार अच्छी आय मिलती है। वहीं धान और मूंगफली जैसी फसलें उन्हें हर सीजन में नकद कमाई देती हैं।
खेती विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे किसानों के लिए यही मॉडल भविष्य बन सकता है, क्योंकि इससे जोखिम काफी कम हो जाता है। अगर बाजार में किसी एक फसल का भाव गिर जाए, तब भी किसान पूरी तरह नुकसान में नहीं जाता।
रासायनिक खाद बंद, घर में तैयार करते हैं जैविक खाद
कन्हैया राठिया की खेती का सबसे दिलचस्प हिस्सा उनकी जैविक खेती है। उन्होंने बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदना लगभग बंद कर दिया है। नाबार्ड के ‘जीवा कार्यक्रम’ से जुड़ने के बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती की तकनीक सीखी। अब वे खेत में गिरने वाले पत्तों, गोमूत्र, गुड़ और बेसन की मदद से जीवामृत तैयार करते हैं। यह प्राकृतिक खाद मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद करती है। साथ ही फसल की लागत भी बेहद कम हो जाती है। इसके अलावा वे प्राकृतिक कीटनाशक भी खुद बनाते हैं। कड़वे पत्तों और गोमूत्र से तैयार घोल फसलों को कीटों और बीमारियों से बचाता है।
इससे दो बड़े फायदे हुए खेती की लागत लगभग शून्य हो गई, मिट्टी की गुणवत्ता पहले से बेहतर हो गई आज उनकी जमीन पहले की तुलना में ज्यादा उपजाऊ मानी जाती है।
तालाब बनाकर शुरू किया मछली पालन
कन्हैया ने केवल फसलों तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपनी 50 डिसमिल जमीन पर एक छोटा तालाब भी खुदवाया। इस तालाब में अब मछली पालन किया जा रहा है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय मिल रही है। साथ ही तालाब की वजह से खेतों को सालभर पानी उपलब्ध रहता है।
तालाब के किनारों पर उन्होंने दलहन और तिलहन की खेती भी शुरू कर दी है। यानी उन्होंने अपनी जमीन के लगभग हर हिस्से का उपयोग आय बढ़ाने के लिए किया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल में यही सबसे बड़ा फायदा होता है। किसान एक ही जगह पर:
- खेती
- बागवानी
- पशुपालन
- मछली पालन
जैसी गतिविधियां कर सकता है।
₹15 हजार से ₹2 लाख पहुंची सालाना कमाई
कभी सालभर में 15 हजार रुपये कमाने वाले कन्हैया राठिया की आज सालाना आय 2 लाख रुपये से ज्यादा हो चुकी है। उनकी आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर हो गई है। अब वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पा रहे हैं और परिवार का जीवन स्तर भी सुधर चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने यह बदलाव केवल मेहनत और सही तकनीक के दम पर किया है।
दूसरे किसानों के लिए बन गया मॉडल
आज कन्हैया राठिया का खेत आसपास के किसानों के लिए प्रशिक्षण केंद्र जैसा बन गया है। दूर-दूर से किसान उनके मॉडल को देखने आ रहे हैं। कई किसान अब उनकी तरह मल्टी लेयर फार्मिंग और जैविक खेती अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में छोटे और सीमांत किसानों की संख्या बहुत ज्यादा है। ऐसे में कम जमीन से ज्यादा कमाई के लिए इसी तरह के मॉडल सबसे ज्यादा उपयोगी साबित हो सकते हैं।
खेती का भविष्य बदल सकती है ऐसी तकनीक
भारत में खेती लगातार महंगी होती जा रही है। रासायनिक खाद, डीजल, बीज और मजदूरी की लागत तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में छोटे किसानों के लिए पारंपरिक खेती से मुनाफा निकालना मुश्किल हो रहा है। लेकिन कन्हैया राठिया जैसे किसान यह दिखा रहे हैं कि अगर:
- प्राकृतिक खेती अपनाई जाए
- एक साथ कई फसलें उगाई जाएं
- पानी का सही उपयोग हो
- जैविक खाद तैयार की जाए
तो कम जमीन से भी अच्छी कमाई की जा सकती है। यह मॉडल केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि किसानों की आर्थिक मजबूती के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कन्हैया राठिया ने किसानों को दिया बड़ा संदेश
कन्हैया का कहना है कि अगर किसान प्रकृति के साथ मिलकर खेती करें, तो खेती कभी घाटे का सौदा नहीं बनेगी।
उनके मुताबिक:
“अगर हम मिट्टी और प्रकृति की सही देखभाल करेंगे, तो वही प्रकृति हमें कई गुना ज्यादा लौटाकर देगी।”
उनकी सफलता यह दिखाती है कि आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती और सही योजना के जरिए खेती को फिर से फायदे का व्यवसाय बनाया जा सकता है।
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