वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच भारत अपने निर्यात बाजारों को diversify करने की दिशा में लगातार कदम उठा रहा है। इसी कड़ी में India और रूस के नेतृत्व वाले Eurasian Economic Union (EAEU) के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत का अगला दौर जून में मॉस्को में होने की संभावना है।
यह बातचीत सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि भारत की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह पारंपरिक बाजारों पर निर्भरता कम करके नए क्षेत्रों में अपनी पहुंच मजबूत करना चाहता है। खासकर ऐसे समय में, जब पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक माहौल कई बार भू-राजनीतिक कारणों से प्रभावित होता रहा है।
बातचीत का फोकस: “नॉन-ट्रेड” मुद्दे क्यों अहम हैं?
आने वाले दौर की बातचीत में जिन मुद्दों पर खास जोर रहने की उम्मीद है, उनमें “नॉन-ट्रेड मेजर्स” प्रमुख हैं। यह शब्द सुनने में तकनीकी लग सकता है, लेकिन इसका असर सीधे व्यापार पर पड़ता है।
नॉन-ट्रेड मेजर्स में शामिल होते हैं:
- क्वालिटी स्टैंडर्ड्स
- कस्टम प्रक्रियाएं
- सर्टिफिकेशन और रेगुलेशन
- लॉजिस्टिक्स और बॉर्डर क्लियरेंस
सरल भाषा में कहें तो, अगर ये बाधाएं कम होती हैं, तो व्यापार अपने आप आसान और सस्ता हो जाता है—even अगर टैरिफ (ड्यूटी) में ज्यादा बदलाव न भी हो।
यही वजह है कि जून की बैठक को इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है।
अब तक क्या हुआ है?
India और Eurasian Economic Union के बीच इस समझौते की नींव अगस्त 2025 में रखी गई थी, जब दोनों पक्षों ने “Terms of Reference” (ToR) पर हस्ताक्षर किए थे।
यह दस्तावेज़ एक तरह का रोडमैप होता है, जिसमें यह तय किया जाता है कि बातचीत किन मुद्दों पर होगी और कितने समय में पूरी की जाएगी। इस मामले में 18 महीनों का एक कार्य-योजना तय की गई है।
इसके बाद नवंबर 2025 में पहली औपचारिक बातचीत का दौर आयोजित किया गया, जिसमें दोनों पक्षों ने शुरुआती मुद्दों पर चर्चा की।
EAEU क्या है और इसमें कौन-कौन से देश शामिल हैं?
Eurasian Economic Union एक क्षेत्रीय आर्थिक समूह है, जिसमें पांच देश शामिल हैं:
- Russia
- Armenia
- Belarus
- Kazakhstan
- Kyrgyzstan
यह समूह अपने सदस्य देशों के बीच मुक्त व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता है, और बाहरी देशों के साथ भी ट्रेड एग्रीमेंट्स करने की दिशा में काम करता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह डील?
भारत के लिए यह समझौता सिर्फ एक और FTA नहीं है, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
पहला कारण है—एक्सपोर्ट डाइवर्सिफिकेशन। अभी भारत का बड़ा हिस्सा यूरोप और अमेरिका जैसे बाजारों पर निर्भर है। अगर वहां कोई आर्थिक मंदी या राजनीतिक तनाव होता है, तो इसका असर सीधे भारत के निर्यात पर पड़ता है।
दूसरा कारण है—ऊर्जा और संसाधन। Russia पहले ही भारत का एक प्रमुख ऊर्जा सप्लायर बन चुका है, खासकर कच्चे तेल के मामले में। ऐसे में व्यापारिक समझौता दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत कर सकता है।
तीसरा कारण है—MSMEs और कृषि क्षेत्र। सरकार का मानना है कि इस तरह के समझौते से छोटे उद्योगों, किसानों और मछुआरों को नए बाजार मिल सकते हैं।
ट्रेड डेटा क्या कहता है?
अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो Russia EAEU समूह में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
- 2024-25 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार करीब 68.72 अरब डॉलर रहा
- इसमें भारत का निर्यात सिर्फ 4.88 अरब डॉलर था
- जबकि आयात 63.84 अरब डॉलर तक पहुंच गया
यह असंतुलन मुख्य रूप से कच्चे तेल के आयात के कारण है।
बाकी देशों के साथ व्यापार अपेक्षाकृत छोटा है:
- Armenia: ~$315 मिलियन
- Belarus: ~$106 मिलियन
- Kazakhstan: ~$349 मिलियन
- Kyrgyzstan: ~$56 मिलियन
यानी यहां भारत के लिए growth की काफी गुंजाइश है।
क्या यह डील गेम-चेंजर हो सकती है?
यह सवाल सबसे अहम है।
अगर यह FTA सफल होता है, तो:
- भारत के एक्सपोर्टर्स को नए बाजार मिल सकते हैं
- लॉजिस्टिक्स और रेगुलेटरी बाधाएं कम हो सकती हैं
- और व्यापार लागत घट सकती है
लेकिन चुनौतियां भी हैं:
- जियोपॉलिटिकल तनाव
- पेमेंट मैकेनिज्म (खासकर रूस के साथ)
- और लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी
इन सभी मुद्दों का समाधान आसान नहीं है।
ओमान के साथ भी बढ़ रही गतिविधि
दिलचस्प बात यह है कि इसी बीच Oman के साथ हुए ट्रेड एग्रीमेंट पर भी काम आगे बढ़ रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, ओमान की टीम अगले महीने भारत आ सकती है, जहां समझौते के implementation से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी।
यह दिखाता है कि भारत एक साथ कई मोर्चों पर अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
निष्कर्ष: बदलती रणनीति, नए बाजार
India और Eurasian Economic Union के बीच प्रस्तावित यह समझौता सिर्फ एक ट्रेड डील नहीं, बल्कि भारत की बदलती आर्थिक रणनीति का हिस्सा है।
दुनिया में जब सप्लाई चेन और व्यापारिक रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं, तब भारत का नए बाजारों की ओर देखना एक जरूरी कदम बन जाता है।
अब नजर जून की बैठक पर रहेगी—क्योंकि वहीं से तय होगा कि यह बातचीत कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी और क्या यह वास्तव में भारत के एक्सपोर्ट मैप को बदल सकती है।
Also Read:


