FAO ने चेताया—खरीफ से पहले भारत में बढ़ सकती है महंगाई। जानिए उर्वरक संकट और Hormuz प्रभाव।
नई दिल्ली — भारत में आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई (food inflation) बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है, और यह चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब सरकार ने उर्वरक (fertilizer) पर भारी सब्सिडी देने का ऐलान किया है।
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी Food and Agriculture Organization के मुख्य अर्थशास्त्री Maximo Torero ने चेतावनी दी है कि वैश्विक सप्लाई में रुकावट और भू-राजनीतिक तनाव भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं, खासकर खरीफ सीजन से ठीक पहले।
क्या है मुख्य चिंता?
Maximo Torero के अनुसार, अगर मौजूदा संकट जारी रहता है—जिसमें पश्चिम एशिया में तनाव और कमजोर मानसून की संभावना शामिल है—तो भारत को तीन बड़े झटके लग सकते हैं:
- उर्वरक आयात महंगा हो जाएगा
- घरेलू उपलब्धता कम हो सकती है
- खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ेगा
इसका असर सीधे तौर पर गेहूं, चावल और सब्जियों जैसी जरूरी खाद्य वस्तुओं पर पड़ सकता है।
सब्सिडी के बावजूद खतरा क्यों?
भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए लगभग 18.6 अरब डॉलर (करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये) की उर्वरक सब्सिडी तय की है।
लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी सब्सिडी के बावजूद खतरा क्यों बना हुआ है?
इसका जवाब वैश्विक सप्लाई चेन में छिपा है। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरक की उपलब्धता ही कम हो जाती है, तो केवल सब्सिडी देकर समस्या पूरी तरह हल नहीं की जा सकती।
Hormuz संकट: भारत के लिए कितना बड़ा खतरा?
वर्तमान संकट का सबसे बड़ा केंद्र है Strait of Hormuz, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है।
इस रास्ते से:
- वैश्विक उर्वरक व्यापार का लगभग 30%
- समुद्री तेल का एक-चौथाई हिस्सा
- और बड़ी मात्रा में गैस व सल्फर गुजरता है
रिपोर्ट के अनुसार, इस मार्ग पर टैंकर ट्रैफिक 90-95% तक गिर चुका है, जिससे सप्लाई चेन लगभग ठप हो गई है।
भारत की निर्भरता: क्यों है स्थिति संवेदनशील?
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का लगभग 35% हिस्सा खाड़ी (Gulf) देशों से आयात करता है।
इसके अलावा, भारत में प्रति हेक्टेयर 120 किलोग्राम से ज्यादा नाइट्रोजन का उपयोग होता है, जो इसे उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भर बनाता है।
अगर सप्लाई बाधित होती है, तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ेगा।
घरेलू उत्पादन की स्थिति भी कमजोर
Maximo Torero ने यह भी बताया कि भारत के उर्वरक प्लांट्स पूरी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं।
- प्लांट्स सिर्फ 60% क्षमता पर चल रहे हैं
- गैस सप्लाई को 70% तक सीमित कर दिया गया है
इसका मतलब यह है कि घरेलू उत्पादन भी मांग को पूरी तरह पूरा करने में सक्षम नहीं है।
खरीफ सीजन: क्यों है यह समय सबसे अहम?
भारत में खरीफ सीजन मई से शुरू होता है और यह देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।
इस दौरान चावल, दालें और कई अन्य फसलें बोई जाती हैं।
अगर इसी समय उर्वरक की कमी हो जाती है, तो उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है, जिससे खाद्य महंगाई बढ़ना तय है।
महंगाई कैसे बढ़ेगी? (Simple Breakdown)
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए एक सीधी चेन देखें:
- उर्वरक महंगे → किसान कम उपयोग करेंगे
- कम उर्वरक → फसल उत्पादन घटेगा
- उत्पादन घटेगा → बाजार में सप्लाई कम होगी
- सप्लाई कम → कीमतें बढ़ेंगी
यही वह चक्र है जो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई को बढ़ा सकता है।
वैश्विक असर: सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया प्रभावित
Maximo Torero के अनुसार, यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है।
- वैश्विक अनाज बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं
- किसानों की आय में लगभग 5% की गिरावट हो सकती है
- अन्य खाद्य वस्तुओं पर भी कीमतों का असर पड़ सकता है
इससे “cross-commodity inflation” का खतरा बढ़ जाता है।
क्या हो सकता है worst-case scenario?
अगर यह संकट 60 दिनों से ज्यादा लंबा खिंचता है, तो स्थिति गंभीर हो सकती है:
- खाद्य कीमतों में तेज उछाल
- आर्थिक विकास में गिरावट
- महंगाई और धीमी ग्रोथ (stagflation) का खतरा
Food and Agriculture Organization के अनुसार, ऐसी स्थिति में वैश्विक आर्थिक विकास में 1.7% तक की गिरावट आ सकती है।
क्या अभी भी राहत की उम्मीद है?
अभी कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं:
- वैश्विक अनाज भंडार पर्याप्त हैं
- FAO का Food Price Index 2022 के शिखर से नीचे है
अगर Strait of Hormuz अगले 60 दिनों में फिर से खुल जाता है, तो बाजार 3-4 महीनों में स्थिति को संभाल सकता है।
भारत के लिए क्या हैं समाधान?
इस स्थिति से निपटने के लिए भारत को कई कदम उठाने पड़ सकते हैं:
- घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाना
- वैकल्पिक सप्लाई स्रोत तलाशना
- किसानों को समय पर सपोर्ट देना
- efficient fertilizer use को बढ़ावा देना
निष्कर्ष: अलर्ट रहने का समय
भारत के लिए आने वाले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
Food and Agriculture Organization की चेतावनी यह दिखाती है कि खतरा वास्तविक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि सरकार के पास नीतिगत विकल्प मौजूद हैं, लेकिन समय पर सही कदम उठाना ही इस संकट को टाल सकता है।
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