भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर जारी बहस के बीच अभिनेत्री से नेता बनी Kangana Ranaut ने ‘नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक, 2026’ को ऐतिहासिक बताते हुए इसे “जश्न का पल” करार दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi की सोच की सराहना करते हुए कहा कि उनकी नेतृत्व शैली समानता (equality) पर आधारित है और यह बिल उसी दृष्टिकोण का विस्तार है।
नई दिल्ली में बातचीत के दौरान कंगना रनौत ने न केवल इस विधेयक का समर्थन किया, बल्कि महिलाओं की दशकों पुरानी सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक बाधाओं को भी खुलकर सामने रखा। उनका बयान ऐसे समय आया है जब संसद में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने की दिशा में राजनीतिक चर्चा तेज हो चुकी है।
“महिलाओं के लिए सबसे बड़ा अवसर” – कंगना रनौत
कंगना रनौत ने इस बिल को महिलाओं के लिए ऐतिहासिक अवसर बताते हुए कहा कि आज का समय महिलाओं के लिए सबसे बेहतर है। उन्होंने कहा कि देशभर की महिलाओं को इस बदलाव का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक ठोस कदम है।
उन्होंने हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हुए बताया कि 68 विधायकों में केवल एक महिला विधायक होना इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अभी भी बेहद कम है। ऐसे में यह विधेयक उस असंतुलन को ठीक करने की कोशिश है।
सामाजिक सच्चाई: आज भी महिलाओं को बराबरी नहीं
कंगना ने अपने बयान में उन कड़वी सच्चाइयों को भी सामने रखा जो आज भी समाज में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि आज भी कई जगहों पर महिलाओं को सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया जाता है क्योंकि वे महिलाएं हैं।
उन्होंने कहा कि अगर महिलाओं को पर्याप्त अवसर ही नहीं मिलेंगे, तो उनकी प्रतिभा (merit) कैसे सामने आएगी? यह सवाल सीधे उस सोच को चुनौती देता है जो महिलाओं की क्षमता पर सवाल उठाती है।
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी क्यों कम है?
कंगना रनौत ने एक बेहद अहम मुद्दा उठाया—राजनीति में महिलाओं की कम भागीदारी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ सिस्टम की समस्या नहीं है, बल्कि समाज की सोच भी इसके लिए जिम्मेदार है।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले जब कोई महिला रैली में जाती थी, तो उसे “बहादुर” कहा जाता था, जैसे कि वह कोई असामान्य काम कर रही हो। इससे यह साफ होता है कि समाज ने महिलाओं को लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन से दूर रखा।
उनके अनुसार, राजनीति को हमेशा “पुरुषों का क्षेत्र” माना गया, जिससे महिलाओं ने खुद भी इस दिशा में सोचने की हिम्मत कम ही की।
“महिला को नेता के रूप में देखना होगा”
कंगना ने एक अहम बात कही—जब हम किसी महिला को देखते हैं, तो उसे केवल महिला नहीं बल्कि एक नेता के रूप में देखना चाहिए। यह सोच बदलाव का सबसे बड़ा आधार हो सकती है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से नीति निर्माण में विविधता आएगी और समाज के हर वर्ग की आवाज बेहतर तरीके से सामने आएगी।
डिलिमिटेशन (सीमांकन) पर भी दिया समर्थन
कंगना रनौत ने इस बिल को डिलिमिटेशन प्रक्रिया से जोड़ने का भी समर्थन किया। उन्होंने इसे “संवैधानिक आवश्यकता” बताया और कहा कि सही प्रतिनिधित्व के लिए जनसंख्या और क्षेत्र के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण जरूरी है।
उनका मानना है कि जब तक सही आंकड़े और संतुलन नहीं होगा, तब तक महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा।
PM मोदी की सोच पर भरोसा
कंगना रनौत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का जिक्र करते हुए कहा कि उनका दृष्टिकोण हमेशा महिलाओं के अधिकारों और सम्मान को लेकर संवेदनशील रहा है। उन्होंने गुजरात के समय से ही बेटी बचाओ जैसे अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह सोच नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से उनकी नीति का हिस्सा रही है।
राजनीतिक बहस और विपक्ष की आपत्तियां
जहां एक ओर सरकार इस बिल को जल्द लागू करना चाहती है, वहीं विपक्ष ने डिलिमिटेशन और जनगणना से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि बिना सही डेटा और प्रक्रिया के इस बिल को लागू करना जल्दबाजी हो सकती है।
हालांकि कंगना रनौत ने विपक्ष के तर्कों को “अधूरा” बताया और कहा कि अगर महिलाओं को बराबरी देनी है, तो इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
बड़ा सवाल: क्या बदलेगी राजनीति की तस्वीर?
यह पूरा मुद्दा केवल एक बिल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की राजनीति के भविष्य से जुड़ा है। अगर यह विधेयक पूरी तरह लागू होता है, तो:
- संसद और विधानसभा में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी
- नीतियों में सामाजिक संतुलन आएगा
- महिलाओं से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता मिलेगी
लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि:
- महिलाओं को केवल “टोकन” के रूप में न देखा जाए
- उन्हें वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति मिले
- सामाजिक मानसिकता में बदलाव आए
निष्कर्ष: बदलाव की शुरुआत, मंजिल अभी बाकी
कंगना रनौत का बयान इस पूरे मुद्दे को एक नया दृष्टिकोण देता है। यह साफ है कि ‘नारी शक्ति वंदन संशोधन बिल’ केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत है।
लेकिन असली चुनौती इसके लागू होने के बाद शुरू होगी—क्या महिलाएं वास्तव में निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल होंगी? क्या समाज उन्हें बराबरी से स्वीकार करेगा?
अगर इन सवालों के जवाब सकारात्मक मिलते हैं, तो यह बिल भारत की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है।
Also Read:


