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लेंसकार्ट बिंदी-तिलक विवाद: CEO की माफी, “पुराना दस्तावेज” बताकर दी सफाई—क्या सच में खत्म हो गया विवाद?

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/26 at 6:37 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
lenskart-bindi-tilak-controversy-ceo-piyush-bansal-apology-policy-clarification
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भारत में कॉर्पोरेट कल्चर और व्यक्तिगत आस्था के बीच संतुलन हमेशा से एक संवेदनशील विषय रहा है। हाल ही में eyewear कंपनी Lenskart इसी मुद्दे को लेकर बड़े विवाद के केंद्र में आ गई। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक कथित “स्टाइल गाइड” ने यह आरोप खड़ा किया कि कंपनी अपने कर्मचारियों को बिंदी, तिलक और कलावा जैसे धार्मिक प्रतीकों से रोक रही है, जबकि अन्य धार्मिक पहनावे की अनुमति दी जा रही है।

Contents
विवाद की शुरुआत: एक पोस्ट और देशभर में बहससोशल मीडिया ट्रायल: कैसे बढ़ा मुद्दाCEO की सफाई: “यह पुराना दस्तावेज था”माफी और जिम्मेदारी: एक अहम कदमक्या यह केवल “पुरानी गलती” थी या सिस्टम की खामी?कॉर्पोरेट कल्चर बनाम व्यक्तिगत आस्थाब्रांड इमेज पर असर: नुकसान कितना बड़ा?कानूनी और HR नजरिया: POSH और समानता कानूनइस विवाद से क्या सीख मिलती है?निष्कर्ष: क्या मामला खत्म हो गया?

मामला इतना बढ़ा कि कंपनी के सह-संस्थापक और CEO Peyush Bansal को सामने आकर माफी मांगनी पड़ी। लेकिन सवाल यह है—क्या यह केवल एक “पुराना दस्तावेज” था, या फिर कॉर्पोरेट नीतियों में गहराई से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा?

इस लेख में हम इस पूरे विवाद को विस्तार से समझेंगे—कैसे शुरू हुआ, कंपनी ने क्या सफाई दी, और इससे भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर को क्या सीख मिलती है।


विवाद की शुरुआत: एक पोस्ट और देशभर में बहस

इस पूरे विवाद की शुरुआत फिल्म निर्माता Ashoke Pandit के एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई। उन्होंने कथित तौर पर लेंसकार्ट के “स्टाइल गाइड” का एक पन्ना साझा किया, जिसमें यह लिखा था कि कर्मचारी बिंदी, तिलक या सिंदूर नहीं लगा सकते।

यह पोस्ट देखते ही देखते वायरल हो गया और लोगों ने इसे धार्मिक भेदभाव के रूप में देखना शुरू कर दिया। कई यूजर्स ने इसे “कॉर्पोरेट डबल स्टैंडर्ड” बताया, तो कुछ ने कंपनी के खिलाफ बहिष्कार (boycott) की मांग भी उठा दी।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत जैसे देश में जहां धार्मिक पहचान दैनिक जीवन का हिस्सा है, वहां इस तरह की नीति—चाहे वास्तविक हो या गलतफहमी—सीधे लोगों की भावनाओं को प्रभावित करती है।


सोशल मीडिया ट्रायल: कैसे बढ़ा मुद्दा

I have listened to your concerns and I understand your sentiment around this. I want to add more context to my earlier post.

The document currently circulating is an outdated internal training document. It is not an HR policy.

That said, it contained an incorrect line about…

— Peyush Bansal (@peyushbansal) April 16, 2026

विवाद के बढ़ने में सोशल मीडिया की भूमिका बेहद अहम रही। ट्विटर (अब X), इंस्टाग्राम और फेसबुक पर हजारों पोस्ट सामने आए, जिनमें कंपनी पर आरोप लगाए गए कि वह “चयनात्मक धार्मिक स्वतंत्रता” दे रही है।

कुछ यूजर्स ने यह भी कहा कि अगर एक धर्म के प्रतीकों पर रोक है, तो सभी पर होनी चाहिए—या फिर किसी पर भी नहीं। यह बहस केवल लेंसकार्ट तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे कॉर्पोरेट सेक्टर में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता पर चर्चा शुरू हो गई।


CEO की सफाई: “यह पुराना दस्तावेज था”

विवाद बढ़ने के बाद Peyush Bansal ने खुद सामने आकर सफाई दी। उन्होंने कहा कि जो दस्तावेज वायरल हो रहा है, वह पुराना ट्रेनिंग मैटेरियल है और वर्तमान कंपनी पॉलिसी का हिस्सा नहीं है।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उस दस्तावेज में बिंदी और तिलक को लेकर जो बातें लिखी गई थीं, वे गलत थीं और ऐसा नहीं होना चाहिए था। कंपनी ने इसे पहले ही फरवरी 2026 में हटा दिया था—यानी विवाद शुरू होने से पहले ही।

CEO ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि:

  • लेंसकार्ट किसी भी धार्मिक प्रतीक पर रोक नहीं लगाता
  • कर्मचारी अपनी आस्था के अनुसार पहनावा अपना सकते हैं
  • कंपनी सभी धर्मों और परंपराओं का सम्मान करती है

माफी और जिम्मेदारी: एक अहम कदम

Peyush Bansal ने केवल सफाई ही नहीं दी, बल्कि इस गलती की जिम्मेदारी भी खुद ली। उन्होंने कहा कि एक संस्थापक और CEO होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी है कि ऐसी गलतियां न हों।

उन्होंने अपनी टीम को निर्देश दिए कि भविष्य में किसी भी ट्रेनिंग या HR कंटेंट को जारी करने से पहले उसकी गहराई से जांच की जाए। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ज्यादातर कंपनियां ऐसे मामलों में सीधे जिम्मेदारी लेने से बचती हैं।


क्या यह केवल “पुरानी गलती” थी या सिस्टम की खामी?

अब यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है—अगर यह दस्तावेज पुराना था, तो यह इतना समय तक सिस्टम में कैसे बना रहा?

कॉर्पोरेट सेक्टर में HR पॉलिसी और ट्रेनिंग कंटेंट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अगर उनमें कोई गलती होती है, तो उसका असर हजारों कर्मचारियों पर पड़ सकता है।

इस मामले में तीन संभावनाएं सामने आती हैं:

पहली, यह वास्तव में एक पुरानी गलती थी जिसे समय पर अपडेट नहीं किया गया।
दूसरी, आंतरिक सिस्टम में कंटेंट मॉनिटरिंग कमजोर थी।
तीसरी, कर्मचारियों तक स्पष्ट और अपडेटेड जानकारी पहुंचाने में कमी रही।

इन तीनों ही स्थितियों में यह एक सिस्टम-लेवल समस्या को दर्शाता है, जिसे सुधारना जरूरी है।


कॉर्पोरेट कल्चर बनाम व्यक्तिगत आस्था

So I confirmed, this is genuine. This is what @peyushbansal tells his employees, hijab is okay, but bindi/tilak/Kalawa is not, for @Lenskart_com, a company that exists in Hindu majority Bharat, where most of the employees and consumers are Hindu! What do you say to this? This is… https://t.co/jQ2EPdWPJM pic.twitter.com/SWfOajOjpo

— Shefali Vaidya. 🇮🇳 (@ShefVaidya) April 15, 2026

भारत में कॉर्पोरेट सेक्टर तेजी से ग्लोबल हो रहा है, जहां कंपनियां एक “न्यूट्रल” वर्क एनवायरनमेंट बनाने की कोशिश करती हैं। लेकिन भारतीय समाज की विविधता को देखते हुए यह इतना आसान नहीं है।

धार्मिक प्रतीक—जैसे बिंदी, तिलक, हिजाब, पगड़ी—सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में किसी भी एक समूह पर रोक लगाना असमानता का संकेत देता है।

लेंसकार्ट विवाद ने इस बात को फिर से सामने ला दिया कि कंपनियों को “इंक्लूसिविटी” (Inclusivity) का मतलब सिर्फ नीतियों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखाना होगा।


ब्रांड इमेज पर असर: नुकसान कितना बड़ा?

आज के डिजिटल दौर में ब्रांड की छवि (Brand Image) बहुत जल्दी बनती और बिगड़ती है। लेंसकार्ट जैसे बड़े ब्रांड के लिए यह विवाद एक बड़ा झटका हो सकता था।

हालांकि, कंपनी की त्वरित प्रतिक्रिया और CEO की माफी ने स्थिति को कुछ हद तक संभाल लिया। लेकिन यह भी सच है कि:

  • एक बार विश्वास टूटे, तो उसे दोबारा बनाना मुश्किल होता है
  • ग्राहक अब सिर्फ प्रोडक्ट नहीं, कंपनी के मूल्यों को भी देखते हैं
  • सोशल मीडिया का असर लंबे समय तक रहता है

कानूनी और HR नजरिया: POSH और समानता कानून

भारत में कार्यस्थल पर समानता और सुरक्षा को लेकर कई कानून हैं, जैसे:

  • POSH Act (Prevention of Sexual Harassment)
  • Equal Opportunity Policies
  • Anti-Discrimination Guidelines

हालांकि यह मामला सीधे POSH से जुड़ा नहीं है, लेकिन यह “वर्कप्लेस फेयरनेस” और “डिस्क्रिमिनेशन” के दायरे में जरूर आता है।

कंपनियों के लिए यह जरूरी है कि उनकी नीतियां न सिर्फ कानून के अनुरूप हों, बल्कि सामाजिक रूप से भी संवेदनशील हों।


इस विवाद से क्या सीख मिलती है?

यह मामला केवल लेंसकार्ट का नहीं है, बल्कि पूरे कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए एक सीख है।

सबसे पहली बात—HR पॉलिसी को नियमित रूप से अपडेट करना जरूरी है।
दूसरी—कर्मचारियों के साथ पारदर्शिता बनाए रखना बेहद अहम है।
तीसरी—किसी भी विवाद पर त्वरित और स्पष्ट प्रतिक्रिया देना ब्रांड को बचा सकता है।

और सबसे महत्वपूर्ण—इंक्लूसिविटी सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है।


निष्कर्ष: क्या मामला खत्म हो गया?

Lenskart के CEO की माफी और स्पष्टीकरण के बाद यह विवाद फिलहाल शांत होता दिख रहा है। लेकिन यह कहना गलत होगा कि मामला पूरी तरह खत्म हो गया है।

इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर सच में सभी के लिए समान और सम्मानजनक कार्यस्थल बना पा रहा है?

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां इस तरह के विवादों से क्या सीख लेती हैं और अपनी नीतियों में क्या बदलाव करती हैं।

क्योंकि आज के दौर में, सिर्फ अच्छा प्रोडक्ट ही नहीं—बल्कि सही मूल्य (values) भी उतने ही जरूरी हैं।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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