जस्टिस विक्रम नाथ ने न्याय प्रक्रिया में AI के बढ़ते उपयोग पर चेतावनी दी। कहा—फैसले एल्गोरिद्म नहीं, बल्कि मानव विवेक से होने चाहिए।
भारत की न्याय प्रणाली एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। अदालतों में डिजिटल टूल्स, डेटा एनालिटिक्स और AI आधारित सिस्टम का इस्तेमाल अब सामान्य होता जा रहा है। ऐसे समय में Justice Vikram Nath का यह बयान बेहद अहम माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि न्यायाधीशों को अपने फैसले लेते समय एल्गोरिद्म नहीं, बल्कि अपने विवेक और मानवीय समझ को प्राथमिकता देनी चाहिए।
यह बात उन्होंने Gujarat Legal Services Authority द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कही, जहां उन्होंने न्याय प्रणाली में AI की भूमिका, उसकी सीमाओं और संभावित खतरों पर विस्तार से चर्चा की।
तकनीक का बढ़ता दखल और न्याय प्रणाली की चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में अदालतों में तकनीक का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। केस मैनेजमेंट, दस्तावेज़ों की जांच, पुराने फैसलों की खोज और डेटा विश्लेषण जैसे कई काम अब AI और डिजिटल टूल्स के जरिए आसान हो गए हैं।
भारत में भी ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट, वर्चुअल हियरिंग और डिजिटल फाइलिंग जैसी पहलें इस दिशा में बड़े कदम हैं। इनसे न्याय प्रक्रिया की गति बढ़ी है और पारदर्शिता भी आई है।
लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा हुआ है — क्या भविष्य में AI न्यायाधीशों की भूमिका को प्रभावित कर सकता है? क्या मशीन आधारित निर्णय मानव निर्णय की जगह ले सकते हैं?
इन्हीं सवालों के बीच जस्टिस विक्रम नाथ का बयान एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।
AI की भूमिका: सहायक, लेकिन निर्णायक नहीं
Justice Vikram Nath ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि AI का उपयोग न्यायिक प्रक्रिया में किया जा सकता है, लेकिन उसकी भूमिका सीमित होनी चाहिए।
उनका कहना था कि AI:
- जजों को डेटा और जानकारी उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है
- केस स्टडी और रिसर्च को आसान बना सकता है
- प्रक्रियात्मक कामों को तेज कर सकता है
लेकिन अंतिम निर्णय का अधिकार केवल और केवल न्यायाधीश के पास ही रहना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर न्यायिक फैसले एल्गोरिद्म के आधार पर होने लगें, तो न्याय प्रक्रिया एक यांत्रिक (mechanical) प्रणाली बन जाएगी, जिसमें मानवीय संवेदनशीलता और न्याय की आत्मा खो सकती है।
एल्गोरिद्मिक बायस: एक छिपा हुआ खतरा
AI के उपयोग से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता “algorithmic bias” है।
जस्टिस नाथ ने बताया कि AI सिस्टम जिस डेटा पर ट्रेन होते हैं, वही उनके निर्णयों को प्रभावित करता है। अगर उस डेटा में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह या असमानता है, तो AI भी उसी तरह के biased परिणाम दे सकता है।
उदाहरण के तौर पर:
- अगर डेटा में किसी वर्ग या समुदाय के खिलाफ पूर्वाग्रह मौजूद है
- तो AI उसी तरह के निर्णयों की सिफारिश कर सकता है
यह स्थिति न्याय के मूल सिद्धांत — निष्पक्षता — के खिलाफ जाती है।
इसलिए उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को पूरी तरह AI पर निर्भर करना खतरनाक हो सकता है।
न्याय केवल कानून नहीं, मानवीय समझ भी है
न्याय सिर्फ कानून की धाराओं का पालन नहीं होता, बल्कि उसमें मानवीय संवेदनाएं, परिस्थितियों की समझ और नैतिकता भी शामिल होती है।
एक ही तरह के मामलों में भी अलग-अलग परिस्थितियां हो सकती हैं, जिन्हें समझने के लिए इंसानी सोच जरूरी है।
AI इन जटिलताओं को पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं है।
इसीलिए जस्टिस नाथ ने कहा कि न्यायाधीशों का विवेक ही न्याय का असली आधार है, और इसे किसी मशीन से replace नहीं किया जा सकता।
केस पेंडेंसी: आंकड़ों से ज्यादा इंसानी समस्या
भारत में लंबित मामलों (case pendency) की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है।
इस पर बोलते हुए Justice Vikram Nath ने कहा कि इसे सिर्फ आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
हर लंबित केस के पीछे:
- एक व्यक्ति की उम्मीद
- एक परिवार की समस्या
- और न्याय पाने की प्रतीक्षा होती है
इसलिए इस समस्या का समाधान भी केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।
जिला न्यायपालिका: न्याय व्यवस्था की नींव
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि District Judiciary India न्याय प्रणाली की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
यही वह स्तर है जहां:
- आम नागरिक पहली बार न्याय व्यवस्था से जुड़ता है
- केस के तथ्य और साक्ष्य स्थापित होते हैं
अगर इस स्तर पर मजबूती होगी, तो पूरी न्याय व्यवस्था मजबूत होगी।
इसलिए जिला अदालतों को संसाधनों, स्टाफ और तकनीक से सशक्त करना जरूरी है।
ईमानदारी: न्यायाधीश का मूल आधार
अपने भाषण में जस्टिस नाथ ने एक और महत्वपूर्ण बात कही — ईमानदारी।
उन्होंने कहा कि:
- ईमानदारी कोई अतिरिक्त गुण नहीं है
- बल्कि यह न्यायाधीश के अस्तित्व की बुनियादी शर्त है
अगर न्यायाधीश ईमानदार और निष्पक्ष नहीं होगा, तो पूरी न्याय प्रणाली पर सवाल उठेंगे।
AI और न्याय का संतुलन: आगे का रास्ता
आज की दुनिया में AI को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। यह एक शक्तिशाली उपकरण है, जो न्याय प्रणाली को तेज और प्रभावी बना सकता है।
लेकिन इसका सही उपयोग ही सबसे बड़ी चुनौती है।
एक संतुलित मॉडल यह हो सकता है कि:
- AI का उपयोग केवल सहायक कार्यों तक सीमित रखा जाए
- अंतिम निर्णय मानव न्यायाधीश लें
- AI सिस्टम की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जाए
इस तरह तकनीक और मानवीय विवेक के बीच संतुलन बनाकर ही न्याय प्रणाली को बेहतर बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
Justice Vikram Nath का यह बयान एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि तकनीक चाहे कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, न्याय का मूल आधार हमेशा मानव विवेक ही रहेगा।
AI न्याय प्रणाली को मजबूत बनाने में मदद कर सकता है, लेकिन यह कभी भी न्यायाधीश की जगह नहीं ले सकता।
आज के डिजिटल युग में यह संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है, ताकि न्याय केवल तेज ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष और मानवीय भी बना रहे।
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