पब्लिक सेक्टर बैंकिंग सिस्टम में बड़े डिफॉल्टर्स को लेकर चल रही बहस के बीच Union Bank of India की नई रिपोर्ट ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैंक की फरवरी 2026 की लिस्ट के मुताबिक, बड़े डिफॉल्टर्स की कुल देनदारी अचानक ₹9.96 लाख करोड़ से घटकर ₹4.93 लाख करोड़ रह गई है। यह कमी सिर्फ आंकड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि करीब 6,000 एंट्री हटने के कारण आई है।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट के अनुसार:
- जनवरी 2026 तक: ₹9.96 लाख करोड़ (18,197 केस)
- फरवरी 2026 तक: ₹4.93 लाख करोड़ (12,997 केस)
यानी एक महीने के भीतर:
- ₹5 लाख करोड़ से ज्यादा की कमी
- करीब 6,000 केस लिस्ट से हटाए गए
यही बदलाव अब चर्चा का विषय बन गया है।
सवाल क्यों उठ रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि:
- क्या इन कंपनियों ने पैसा चुका दिया?
- क्या वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) हुआ?
- या फिर लोन राइट-ऑफ कर दिए गए?
इन सवालों का अब तक बैंक की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है।
RBI का क्या नियम है?
Reserve Bank of India के नियमों के अनुसार:
- सभी बैंकों को हर महीने डिफॉल्टर लिस्ट जमा करनी होती है
- यह लिस्ट TransUnion CIBIL जैसी एजेंसियों को दी जाती है
- ₹1 करोड़ से ज्यादा बकाया वाले खातों को “Large Defaulters” में रखा जाता है
इसलिए इस तरह का बड़ा बदलाव और भी ज्यादा गंभीर माना जा रहा है।
कौन हैं बड़े डिफॉल्टर्स?
फरवरी 2026 की लिस्ट में कुछ प्रमुख नाम:
1. लैंको ग्रुप
- कुल बकाया: ₹50,088 करोड़
- प्रमुख: L Rajagopal
2. इंडियन टेक्नोमैक
- बकाया: ₹29,019 करोड़
- पहले ही insolvency में जा चुकी कंपनी
3. वीडियोकोन ग्रुप
- बकाया: ₹24,927 करोड़
- मालिक: Venugopal Dhoot
- CBI जांच में नाम आ चुका है
4. IVRCL लिमिटेड
- बकाया: ₹23,418 करोड़
5. मेहुल चोकसी – नीरव मोदी से जुड़ी कंपनियां
- बकाया: ₹18,309 करोड़
- Mehul Choksi
- Nirav Modi
अन्य बड़े नाम भी शामिल
इसके अलावा लिस्ट में शामिल:
- Essar Group – ₹10,161 करोड़
- Transstroy India – ₹10,355 करोड़
- PC Jewellery – ₹6,243 करोड़
- Simplex Infrastructure – ₹5,993 करोड़
- Supertech – ₹4,203 करोड़
- Reliance Group (Anil Ambani) – ₹3,587 करोड़
यह दिखाता है कि बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टर्स की संख्या अभी भी काफी ज्यादा है।
गायब नामों पर सबसे बड़ा सवाल
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर है कि:
- Era Infra Engineering (₹75,000 करोड़ से ज्यादा)
- जैसे बड़े नाम नई लिस्ट से गायब क्यों हैं?
क्या उन्होंने भुगतान किया, सेटलमेंट हुआ या उन्हें हटाया गया—यह स्पष्ट नहीं है।
रिकवरी में मुश्किल क्यों?
कई मामलों में:
- कंपनियां पहले ही दिवालिया (insolvency) हो चुकी हैं
- उनके पास कोई ठोस संपत्ति नहीं बची
- शेयरों की वैल्यू भी लगभग खत्म हो चुकी है
इस वजह से बैंकों के लिए पैसा वसूलना बेहद कठिन हो जाता है।
सिस्टम पर क्या असर?
इस पूरे मामले से कुछ बड़े सवाल सामने आते हैं:
- क्या बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता की कमी है?
- क्या बड़े कॉर्पोरेट्स को राहत मिल रही है?
- क्या आम लोगों के पैसों की सुरक्षा खतरे में है?
निष्कर्ष
Union Bank of India की डिफॉल्टर लिस्ट में अचानक आया यह बड़ा बदलाव कई सवाल खड़े करता है।
जहां एक ओर आंकड़े कम होना सकारात्मक दिख सकता है, वहीं दूसरी ओर यह समझना जरूरी है कि यह कमी कैसे आई।
जब तक बैंक इस पर स्पष्ट जवाब नहीं देता, तब तक यह मुद्दा बहस और जांच का विषय बना रहेगा।
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