चीनी उद्योग ने सरकार से चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) बढ़ाने की मांग तेज कर दी है। ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) ने मौजूदा MSP ₹31 प्रति किलो से बढ़ाकर ₹42 प्रति किलो करने का प्रस्ताव रखा है। संगठन का कहना है कि लंबे समय से कीमतों में बदलाव नहीं होने के कारण चीनी मिलों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। इसके साथ ही एसोसिएशन ने गन्ना किसानों को भुगतान के लिए दो विकल्प देने और एथनॉल उत्पादन से जुड़े प्रोजेक्ट को कर्ज में राहत देने की मांग भी की है।
AISTA ने ये प्रस्ताव पूर्व नीति आयोग सदस्य रमेश चंद की अध्यक्षता वाली चार सदस्यीय समिति के सामने रखे। इस समिति का गठन 13 अक्टूबर को किया गया था। इसका प्रमुख उद्देश्य महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना किसानों की ओर से उठाई जा रही समस्याओं और शिकायतों का समाधान करना है। समिति ने 4 नवंबर को पहले बेंगलुरु और फिर पुणे में गन्ना किसानों के साथ बैठक की। पुणे में हुई चर्चा में AISTA का प्रतिनिधिमंडल भी शामिल हुआ।
चीनी का MSP ₹31 से बढ़ाकर ₹42 करने की मांग
ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रफुल्ल विठलानी के मुताबिक, चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य फरवरी 2019 से नहीं बढ़ाया गया है। इस दौरान उत्पादन लागत और उद्योग से जुड़े दूसरे खर्चों में बदलाव हुआ है। ऐसे में चीनी मिलों के लिए मौजूदा कीमत पर कारोबार करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
एसोसिएशन ने मांग की है कि चीनी का MSP बढ़ाकर कम से कम ₹4,200 प्रति क्विंटल किया जाए। यानी मौजूदा ₹3,100 प्रति क्विंटल के मुकाबले इसमें ₹1,100 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी होनी चाहिए। संगठन का तर्क है कि MSP में संशोधन से चीनी मिलों को उत्पादन लागत के अनुरूप कीमत मिलेगी और उन्हें कम कीमत पर चीनी बेचने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
यह मांग ऐसे समय आई है, जब चीनी उद्योग में गन्ने की कीमतों और मिलों की आर्थिक स्थिति को लेकर चर्चा तेज है। AISTA ने यह भी कहा है कि भारत में गन्ने की कीमतें दुनिया के सबसे ऊंचे स्तरों में शामिल हैं।
गन्ने के FRP का समर्थन कर रहा है AISTA
चीनी का MSP बढ़ाने की मांग के साथ AISTA ने केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) का समर्थन भी किया है। सरकार ने 5 मई को 2026-27 के चीनी सीजन के लिए गन्ने का FRP ₹365 प्रति क्विंटल तय किया था।
यह दर 10.25 प्रतिशत की बुनियादी चीनी रिकवरी दर पर आधारित है। इसका मतलब है कि गन्ने से चीनी निकालने की निर्धारित रिकवरी के आधार पर किसानों को भुगतान किया जाता है। रिकवरी दर में बदलाव होने पर FRP भुगतान में भी निर्धारित नियमों के अनुसार बदलाव होता है।
AISTA अध्यक्ष प्रफुल्ल विठलानी ने कहा कि FRP तय किए जाने के समय सभी संबंधित पक्षों ने इस कीमत को व्यापक रूप से स्वीकार किया था। इसलिए संगठन को फिलहाल इस मुद्दे पर दोबारा आंदोलन करने का कोई कारण नजर नहीं आता।
गन्ना किसानों को भुगतान के लिए मिलेंगे 2 विकल्प
AISTA ने गन्ना किसानों के भुगतान की व्यवस्था में बदलाव का प्रस्ताव भी समिति के सामने रखा है। संगठन ने गुजरात में लागू भुगतान मॉडल की समीक्षा करने का सुझाव दिया है। इसके तहत किसानों को भुगतान के दो विकल्प दिए जा सकते हैं।
पहले विकल्प में किसानों को गन्ने की सप्लाई के 7 से 14 दिनों के भीतर पूरा FRP भुगतान मिल सकता है। इससे किसानों को अपनी फसल की आपूर्ति के बाद जल्दी पैसा प्राप्त होगा और खेती से जुड़े खर्चों को पूरा करने में मदद मिलेगी।
दूसरे विकल्प में किसान तीन किस्तों में भुगतान स्वीकार कर सकते हैं। इसके बदले उन्हें निर्धारित FRP के अलावा 10 प्रतिशत अतिरिक्त प्रीमियम देने का प्रस्ताव है। इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को भुगतान के समय और रकम के मामले में विकल्प उपलब्ध कराना है।
हालांकि, ये AISTA की ओर से समिति के सामने रखे गए प्रस्ताव हैं। इन्हें देशभर में लागू करने के लिए सरकार की मंजूरी और संबंधित नीतिगत फैसले जरूरी होंगे।
एथनॉल उत्पादन में कमी की आशंका, चीनी मिलों की बढ़ सकती है परेशानी
चीनी उद्योग के सामने एक और बड़ी चुनौती एथनॉल उत्पादन को लेकर सामने आ रही है। AISTA ने आशंका जताई है कि खराब मौसम के कारण मौजूदा और अगले चीनी सीजन में अतिरिक्त सुक्रोज की उपलब्धता सीमित रह सकती है।
सुक्रोज गन्ने में मौजूद वह प्राकृतिक शर्करा है, जिसका इस्तेमाल चीनी और एथनॉल उत्पादन की प्रक्रिया में किया जाता है। यदि इसकी उपलब्धता कम होती है तो चीनी मिलों के पास एथनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की मात्रा भी प्रभावित हो सकती है।
इसका असर सरकार के 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण (E20) के लक्ष्य पर भी पड़ सकता है। सरकार पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की मात्रा बढ़ाकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।
चीनी मिलों ने इस लक्ष्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए अपनी डिस्टिलरी क्षमता बढ़ाने में निवेश किया है। इसके लिए कई कंपनियों ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों से कर्ज भी लिया है। अब यदि एथनॉल उत्पादन घटता है तो इन परियोजनाओं से होने वाली कमाई प्रभावित हो सकती है। इससे मिलों के लिए कर्ज की किस्तें चुकाना मुश्किल हो सकता है।
एथनॉल प्रोजेक्ट के कर्ज पर 2 साल की राहत की मांग
AISTA ने सरकार से चीनी आधारित एथनॉल परियोजनाओं को आर्थिक राहत देने का आग्रह किया है। संगठन ने प्रभावित परियोजनाओं के कर्ज पर मूलधन और ब्याज के भुगतान में दो साल की मोहलत देने का प्रस्ताव रखा है।
इसके अलावा एसोसिएशन ने मांग की है कि इस दो साल की अवधि के दौरान सरकार की ओर से मिलने वाली ब्याज सब्सिडी को मौजूदा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत किया जाए।
संगठन का मानना है कि इससे एथनॉल डिस्टिलरी स्थापित करने के लिए कर्ज लेने वाली चीनी मिलों को राहत मिलेगी। साथ ही, उनके कर्ज के गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) में बदलने का जोखिम भी कम किया जा सकेगा।
चीनी उद्योग और किसानों के लिए क्यों अहम हैं ये मांगें?
AISTA की मांगें चीनी उद्योग के दो प्रमुख पक्षों को प्रभावित करती हैं। एक तरफ चीनी मिलें बढ़ती उत्पादन लागत के बीच MSP में संशोधन चाहती हैं, ताकि उन्हें चीनी की बिक्री से बेहतर कीमत मिल सके। दूसरी तरफ गन्ना किसानों के लिए समय पर भुगतान और अतिरिक्त प्रीमियम की व्यवस्था की मांग की गई है।
वहीं, एथनॉल उत्पादन से जुड़ी परियोजनाओं के लिए कर्ज राहत का प्रस्ताव उद्योग की वित्तीय स्थिति को संभालने की कोशिश है। यदि सरकार इन प्रस्तावों पर सकारात्मक फैसला लेती है तो इसका असर चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति, गन्ना किसानों के भुगतान और देश के एथनॉल उत्पादन कार्यक्रम पर पड़ सकता है।
फिलहाल इन मांगों पर सरकार और संबंधित समिति के फैसले का इंतजार है।


