बच्चों को स्मार्टफोन देना आज के समय में जरूरत बनता जा रहा है, लेकिन इसके साथ पैरेंट्स की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। फोन देने से पहले बच्चे की समझ, स्क्रीन टाइम, इंटरनेट सेफ्टी और प्राइवेसी को लेकर कुछ जरूरी नियम तय करना बेहद जरूरी है।
आज के समय में स्मार्टफोन बच्चों की जिंदगी का भी हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई के लिए ऑनलाइन क्लास, एजुकेशनल वीडियो, दोस्तों से बातचीत या किसी जरूरी जानकारी के लिए मोबाइल काफी उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन यही फोन अगर बिना किसी नियम और निगरानी के बच्चे के हाथ में दे दिया जाए, तो इसके कुछ नुकसान भी हो सकते हैं।
बच्चे को स्मार्टफोन खरीदकर देना ही पर्याप्त नहीं है। उसे यह समझाना भी जरूरी है कि फोन का इस्तेमाल कब, कितना और किस तरह करना है। इंटरनेट पर अपनी निजी जानकारी सुरक्षित रखने से लेकर अनजान लोगों से सावधान रहने तक, बच्चों को डिजिटल दुनिया के जरूरी नियम कम उम्र से ही समझाए जाने चाहिए।
1. उम्र से ज्यादा बच्चे की समझदारी पर दें ध्यान

बच्चे को स्मार्टफोन कब देना चाहिए, इसका कोई एक तय जवाब नहीं हो सकता। सिर्फ उम्र देखकर फैसला करने के बजाय यह देखें कि बच्चा जिम्मेदारी से फोन इस्तेमाल करने की स्थिति में है या नहीं।
क्या वह घर के बनाए नियमों का पालन करता है? क्या वह अपनी चीजों का ध्यान रखता है? क्या वह समझता है कि इंटरनेट पर हर जानकारी सही नहीं होती? इन सवालों के जवाब से आपको फैसला लेने में मदद मिल सकती है।
अगर बच्चा अभी नियमों को समझने और उनका पालन करने के लिए तैयार नहीं है, तो उसे फोन देने से पहले डिजिटल सेफ्टी की बेसिक बातें समझाना बेहतर रहेगा।
2. स्मार्टफोन देने से पहले पैरेंटल कंट्रोल करें सेट
बच्चे को फोन देने से पहले जरूरी पैरेंटल कंट्रोल और सुरक्षा सेटिंग्स को सक्रिय करना एक अच्छा कदम हो सकता है। इससे माता-पिता को बच्चे के डिजिटल इस्तेमाल को उम्र और जरूरत के हिसाब से सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
स्क्रीन टाइम की सीमा तय की जा सकती है। साथ ही ऐप डाउनलोड करने की अनुमति, कंटेंट फिल्टर और दूसरी प्राइवेसी सेटिंग्स भी चेक करें।
इसका मकसद बच्चे की हर गतिविधि पर नजर रखना नहीं, बल्कि उसे ऐसी ऑनलाइन सामग्री से बचाना है, जो उसकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं है।
3. घर में बनाएं कुछ साफ ‘नो-फोन जोन’
मोबाइल इस्तेमाल को लेकर घर में पहले से कुछ आसान और स्पष्ट नियम तय करना काफी मददगार हो सकता है।
मसलन, होमवर्क या पढ़ाई के दौरान फोन का इस्तेमाल नहीं होगा। खाने की टेबल पर मोबाइल नहीं आएगा और रात में सोते समय फोन बेडरूम में नहीं रखा जाएगा।
इसके अलावा यह भी तय किया जा सकता है कि बच्चा रोज कितनी देर मनोरंजन के लिए फोन इस्तेमाल करेगा। जब नियम पहले से स्पष्ट होंगे, तो बच्चे को यह समझने में आसानी होगी कि फोन का इस्तेमाल उसकी दिनचर्या को प्रभावित नहीं करना चाहिए।
4. बच्चों को प्राइवेसी का महत्व जरूर समझाएं
इंटरनेट की दुनिया में निजी जानकारी की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चे को शुरुआत से ही बताएं कि अपनी पर्सनल जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ शेयर नहीं करनी चाहिए।
घर का पता, फोन नंबर, स्कूल की जानकारी, पासवर्ड, लाइव लोकेशन या निजी तस्वीरें ऑनलाइन शेयर करने से बचना चाहिए।
अगर सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम या किसी चैट प्लेटफॉर्म पर कोई अनजान व्यक्ति निजी जानकारी मांगता है, तो बच्चे को जवाब देने के बजाय तुरंत माता-पिता को बताने के लिए प्रोत्साहित करें।
5. साइबर बुलिंग को लेकर बच्चों से खुलकर बात करें
साइबर बुलिंग भी बच्चों के लिए एक गंभीर ऑनलाइन समस्या बन सकती है। किसी बच्चे को ऑनलाइन परेशान करना, अपमानित करना, धमकाना या लगातार गलत मैसेज भेजना साइबर बुलिंग का हिस्सा हो सकता है।
बच्चे को समझाएं कि अगर कोई ऑनलाइन उसे परेशान कर रहा है, तो उसे बात छिपाने या अकेले समस्या सुलझाने की जरूरत नहीं है।
ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को ब्लॉक करना, जरूरत पड़ने पर रिपोर्ट करना और स्क्रीनशॉट जैसे सबूत सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है। सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चा ऐसी स्थिति में माता-पिता से खुलकर बात करने में डर महसूस न करे।
6. स्मार्टफोन सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है
बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि स्मार्टफोन का इस्तेमाल केवल गेम खेलने या वीडियो देखने के लिए नहीं होता। इसका इस्तेमाल पढ़ाई, नई चीजें सीखने और जरूरी कामों के लिए भी किया जा सकता है।
अगर बच्चा जिम्मेदारी से फोन इस्तेमाल करता है और तय नियमों का पालन करता है, तो समय के साथ उसे थोड़ी ज्यादा स्वतंत्रता दी जा सकती है।
बच्चे की उम्र और समझ बढ़ने के साथ फोन से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया जा सकता है।
7. बच्चों के साथ डिजिटल दुनिया पर बातचीत करते रहें
सिर्फ नियम बना देना पर्याप्त नहीं है। माता-पिता को समय-समय पर बच्चे से उसके ऑनलाइन अनुभवों के बारे में भी बात करनी चाहिए।
पूछें कि वह किन ऐप्स का इस्तेमाल करता है, इंटरनेट पर क्या देखना पसंद करता है और क्या किसी ने उसे ऑनलाइन परेशान करने की कोशिश की है।
हालांकि बातचीत का तरीका ऐसा होना चाहिए कि बच्चे को यह महसूस न हो कि उससे लगातार पूछताछ की जा रही है। उसे यह भरोसा देना ज्यादा जरूरी है कि इंटरनेट पर कोई परेशानी होने पर वह बिना डरे माता-पिता से बात कर सकता है।
स्मार्टफोन के साथ बच्चों को डिजिटल जिम्मेदारी भी सिखाएं
स्मार्टफोन बच्चों के लिए पढ़ाई और सीखने का उपयोगी माध्यम बन सकता है, लेकिन इसका सुरक्षित इस्तेमाल सिखाना उतना ही जरूरी है। केवल स्क्रीन टाइम कम करना ही समाधान नहीं है। बच्चों को ऑनलाइन प्राइवेसी, साइबर बुलिंग, अनजान लोगों से सावधानी और डिजिटल व्यवहार के बारे में भी समझाना चाहिए।
पैरेंट्स अगर स्पष्ट नियमों के साथ बच्चे को भरोसा और सही गाइडेंस दें, तो वह धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ज्यादा जिम्मेदारी और समझदारी से करना सीख सकता है।


