पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार ने राज्य कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग (7th Pay Commission) के गठन को मंजूरी देकर एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। लंबे समय से छठे वेतन आयोग के तहत काम कर रहे लाखों कर्मचारियों के लिए यह राहत भरी खबर मानी जा रही है। हालांकि, इसी बीच आठवें वेतन आयोग (8th Pay Commission) को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अगर केंद्र सरकार 2026 से आठवां वेतन आयोग लागू करती है, तो पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों और केंद्रीय कर्मचारियों के बीच वेतन और पेंशन में भारी अंतर पैदा हो सकता है।
नई सरकार की पहली बड़ी कैबिनेट बैठक के बाद मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने सातवें वेतन आयोग के गठन का ऐलान किया। इसके साथ ही राज्य सरकार ने डीए, महिलाओं के लिए नई आर्थिक सहायता योजना, ओबीसी सूची और धार्मिक आधार पर दी जाने वाली आर्थिक सहायता जैसे कई बड़े फैसले भी लिए।
पश्चिम बंगाल की नवनियुक्त सरकार ने आज अपने कर्मचारियों के लिए सातवें वेतनमान आयोग के गठन की मंजूरी दे दी है। अब पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों को सातवें वेतनमान आयोग के अनुसार सैलरी और पेंशन मिलने की संभावना बन गई है। हालांकि अभी कुछ ही साल पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने… pic.twitter.com/ZILNeSkryP
— Dr Manjeet Singh Patel (@ManjeetIMOPS) May 18, 2026 लंबे समय से छठे वेतन आयोग में अटके थे कर्मचारी
पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारी लंबे समय से केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर वेतन और महंगाई भत्ते (DA) की मांग कर रहे थे। केंद्र के कर्मचारियों को पहले से सातवें वेतन आयोग का लाभ मिल रहा है, जबकि बंगाल में अब तक छठे वेतन आयोग के आधार पर वेतन दिया जा रहा था।
राज्य सरकार ने इस साल अंतरिम बजट में डीए में 4% की बढ़ोतरी जरूर की थी, लेकिन इसके बावजूद कर्मचारियों में नाराजगी बनी हुई थी। फिलहाल राज्य कर्मचारियों को लगभग 22% महंगाई भत्ता मिल रहा है, जबकि केंद्रीय कर्मचारियों का डीए इससे काफी अधिक है।
सरकारी कर्मचारियों के संगठनों का कहना था कि महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन वेतन संरचना पुरानी होने के कारण उनकी वास्तविक आय प्रभावित हो रही है। ऐसे में सातवें वेतन आयोग की मंजूरी को चुनावी वादों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
8th Pay Commission ने बढ़ाई नई चिंता
हालांकि सातवें वेतन आयोग की घोषणा के साथ ही नया विवाद भी खड़ा हो गया है। ऑल इंडिया एनपीएस इंप्लॉई फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह पटेल ने कहा कि यह फैसला कर्मचारियों को तत्काल राहत तो देगा, लेकिन भविष्य में बड़ी असमानता पैदा कर सकता है।
उनका कहना है कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 1 जनवरी 2026 से आठवां वेतन आयोग लागू होने की संभावना है और इस दिशा में तैयारी भी शुरू हो चुकी है। ऐसे में पश्चिम बंगाल के कर्मचारी अभी सातवें वेतन आयोग में जाएंगे, जबकि केंद्र के कर्मचारी अगले चरण में पहुंच जाएंगे।
डॉ. पटेल के मुताबिक, इससे राज्य और केंद्र कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और भत्तों में बड़ा अंतर दिखाई देगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में “वन नेशन, वन फ्रेमवर्क” जैसी बातें हो रही हैं, तो कर्मचारियों के लिए समान वेतन संरचना क्यों नहीं बनाई जा सकती।
उन्होंने यह भी कहा कि आज भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग वेतन आयोग लागू हैं। पंजाब में छठा वेतन आयोग, केरल में 11वां वेतन ढांचा और पूर्वोत्तर राज्यों में अलग पे-मैट्रिक्स चल रहा है। इससे कर्मचारियों के बीच असमानता बढ़ती है।
क्या होता है वेतन आयोग और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
वेतन आयोग का गठन सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन, भत्तों और पेंशन संरचना की समीक्षा के लिए किया जाता है। केंद्र सरकार लगभग हर 10 साल में नया वेतन आयोग लागू करती है।
सातवें वेतन आयोग को केंद्र सरकार ने 2016 में लागू किया था। इसके बाद सरकारी कर्मचारियों की बेसिक सैलरी, एचआरए और अन्य भत्तों में बड़ा बदलाव आया था। अब कर्मचारियों को आठवें वेतन आयोग का इंतजार है, जिससे सैलरी में फिर बड़ा इजाफा होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आठवां वेतन आयोग लागू होता है, तो फिटमेंट फैक्टर बढ़ने से कर्मचारियों की बेसिक सैलरी में 25% से 40% तक बढ़ोतरी संभव है। यही वजह है कि राज्य कर्मचारी भी केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर वेतन संरचना की मांग कर रहे हैं।
सुवेंदु सरकार के अन्य बड़े फैसले
सातवें वेतन आयोग के अलावा पश्चिम Bengal कैबिनेट ने कई बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण फैसले भी लिए।
महिलाओं के लिए अन्नपूर्णा योजना
सरकार 1 जून से अन्नपूर्णा योजना शुरू करेगी। इसके तहत महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। साथ ही सरकारी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा भी मिलेगी।
सरकार ने कहा कि सीएए (CAA) के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने वाले और वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए ट्रिब्यूनल जाने वाले लोग भी इस योजना का लाभ उठा सकेंगे।
धार्मिक आधार पर आर्थिक सहायता बंद
कैबिनेट ने फैसला लिया कि जून से धार्मिक वर्गीकरण के आधार पर दी जाने वाली सरकारी आर्थिक सहायता पूरी तरह बंद कर दी जाएगी। सरकार का कहना है कि सभी योजनाएं अब समान पात्रता के आधार पर लागू होंगी।
ओबीसी सूची रद्द
कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के बाद राज्य की मौजूदा ओबीसी सूची को रद्द कर दिया गया है। अब नई पात्रता तय करने के लिए एक जांच पैनल बनाया जाएगा। यह फैसला राज्य की राजनीति और आरक्षण व्यवस्था दोनों पर बड़ा असर डाल सकता है।
जनता दरबार की शुरुआत
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शपथ लेने के बाद कोलकाता के साल्ट लेक स्थित भाजपा कार्यालय में पहला ‘जनता दरबार’ लगाया। यहां लोगों की शिकायतें सुनी गईं और त्वरित समाधान का भरोसा दिया गया।
राजनीतिक संदेश भी देने की कोशिश
भाजपा ने इन फैसलों को “डबल इंजन सरकार” की तेज कार्यशैली से जोड़ते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किया। पार्टी ने दावा किया कि जो काम पिछली सरकार 15 साल में नहीं कर पाई, वह नई सरकार ने पहले ही हफ्ते में शुरू कर दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार शुरुआती फैसलों के जरिए कर्मचारियों, महिलाओं और मध्यवर्ग को बड़ा संदेश देना चाहती है। खासतौर पर सातवें वेतन आयोग और अन्नपूर्णा योजना को आगामी राजनीतिक रणनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
कर्मचारियों के लिए आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पश्चिम बंगाल में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें कब तक लागू होंगी और कर्मचारियों को वास्तविक लाभ कब मिलेगा। इसके साथ ही देशभर के सरकारी कर्मचारियों की नजर केंद्र सरकार के आठवें वेतन आयोग पर भी टिकी हुई है।
अगर केंद्र 2026 से नया वेतन आयोग लागू करता है, तो राज्यों पर भी अपने वेतन ढांचे में बदलाव का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले महीनों में वेतन, डीए और पेंशन को लेकर देशभर में नई बहस देखने को मिल सकती है।
Also Read:


