पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब केवल वैश्विक राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है। इसका सीधा प्रभाव दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आम लोगों की जेब पर भी पड़ने लगा है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह संकट आने वाले समय में बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है।
एशियाई विकास बैंक (एडीबी) के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क के अनुसार यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है, तो कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। इससे भारत की आर्थिक वृद्धि दर घट सकती है और महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत फिलहाल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन महंगा कच्चा तेल इस रफ्तार पर दबाव डाल सकता है।
लंबे समय तक महंगा रह सकता है कच्चा तेल
अल्बर्ट पार्क के अनुसार नए अनुमान में वर्ष 2026 के दौरान कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 96 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। वहीं वर्ष 2027 में भी इसकी कीमत लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बने रहने का अनुमान है।
उन्होंने कहा कि वायदा बाजार में भी तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह वैश्विक आपूर्ति को लेकर बढ़ती अनिश्चितता और पश्चिम एशिया में जारी तनाव है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर तेल उत्पादक क्षेत्रों में संकट और गहराता है, तो दुनिया भर में ईंधन कीमतों पर दबाव और बढ़ सकता है।
भारत की विकास दर पर कितना असर पड़ सकता है?
एडीबी के अनुसार महंगे कच्चे तेल का असर भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर भी दिखाई दे सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक पश्चिम एशिया संकट के चलते भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर में करीब 0.6 प्रतिशत की कमी आ सकती है।
इस स्थिति में चालू वित्त वर्ष के लिए अनुमानित 6.9 प्रतिशत वृद्धि दर घटकर लगभग 6.3 प्रतिशत तक रह सकती है। हालांकि एडीबी का मानना है कि अगले वित्त वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था दोबारा तेजी पकड़ सकती है।
अल्बर्ट पार्क ने कहा कि मौजूदा स्थिति आदर्श नहीं है, लेकिन भारत की घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है और यही देश की सबसे बड़ी ताकत है।
क्यों बढ़ सकती है महंगाई?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयातित तेल और गैस से पूरा करता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का असर सीधे भारतीय बाजार पर दिखाई देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो:
- पेट्रोल-डीजल की लागत बढ़ती है
- परिवहन खर्च बढ़ता है
- उद्योगों की लागत बढ़ती है
- बिजली और ऊर्जा खर्च बढ़ते हैं
इन सभी का असर आखिरकार रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है।
एडीबी के अनुसार चालू वित्त वर्ष में महंगाई दर 6.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जो पहले के अनुमान से काफी अधिक है।
आम आदमी की जेब पर क्या होगा असर?
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर सीधे आम लोगों के बजट पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार:
- पेट्रोल और डीजल महंगे हो सकते हैं
- रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है
- परिवहन महंगा हो सकता है
- खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं
यानी आने वाले महीनों में घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने की आशंका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक पर ब्याज दरों को लेकर दबाव बढ़ सकता है।
खाद्य महंगाई भी बन सकती है बड़ी समस्या
एडीबी ने केवल तेल संकट ही नहीं बल्कि एल नीनो और बढ़ती उर्वरक कीमतों को भी चिंता का बड़ा कारण बताया है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि उर्वरक महंगे होते हैं, तो किसान कम खाद का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे फसलों की पैदावार घट सकती है और बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता कम हो सकती है।
भारत वैश्विक चावल व्यापार में बड़ी भूमिका निभाता है। ऐसे में भारत में फसल उत्पादन प्रभावित होने का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है।
तेल और गैस पर निर्भरता क्यों बन रही है जोखिम?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश माना जाता है। देश की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, परिवहन क्षेत्र और औद्योगिक मांग की वजह से ऊर्जा खपत लगातार बढ़ रही है।
हालांकि भारत:
- इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम
- सौर ऊर्जा
- हरित ऊर्जा
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार
जैसे विकल्पों पर तेजी से काम कर रहा है, लेकिन फिलहाल आयातित ईंधन पर निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
यही वजह है कि वैश्विक तेल संकट का असर भारत पर जल्दी दिखाई देता है। कच्चा तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ सकती है, जिससे रुपये पर भी दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर भी बढ़ा दबाव
एडीबी ने अपनी अद्यतन रिपोर्ट में वर्ष 2026 के लिए एशिया-प्रशांत क्षेत्र की विकास दर के अनुमान को 5.1 प्रतिशत से घटाकर 4.7 प्रतिशत कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया संकट केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशियाई क्षेत्र के लिए आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है।
क्या भारत इस चुनौती से उबर पाएगा?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी मजबूत घरेलू मांग, बढ़ता विनिर्माण क्षेत्र, बुनियादी ढांचा निवेश और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था है। यही कारण है कि कई वैश्विक संस्थाएं अब भी भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल मानती हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर वैश्विक तेल संकट लंबा चलता है, तो भारत को ऊर्जा विविधीकरण और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर और तेजी से काम करना होगा।
केवल तेल संकट नहीं, बड़ी आर्थिक चुनौती
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब केवल भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है। यह भारत जैसे देशों के लिए आर्थिक वृद्धि, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में इसका असर भारत की विकास दर, महंगाई और आम आदमी के खर्च तीनों पर साफ दिखाई दे सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर पश्चिम एशिया संकट जल्दी नहीं सुलझता, तो आने वाले महीनों में भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर इसका असर और गहरा हो सकता है।
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