अगर आप बैंक में बड़ी मात्रा में नकदी जमा कर रहे हैं, तो उसके स्रोत का पूरा रिकॉर्ड और सबूत संभालकर रखना बेहद जरूरी है। वरना आपको भी आयकर विभाग की जांच का सामना करना पड़ सकता है। गुजरात के एक किसान के साथ ऐसा ही हुआ, जिसने नोटबंदी के दौरान बैंक में नकदी जमा की और बाद में मामला इनकम टैक्स विभाग से होते हुए आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) तक पहुंच गया।
हालांकि अंत में ITAT ने किसान को बड़ी राहत देते हुए आयकर विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठाए और पूरे मामले में संतुलित फैसला सुनाया।
विशेषज्ञों के अनुसार अब बैंकिंग लेनदेन, पैन और वार्षिक सूचना विवरण (AIS) के जरिए आयकर विभाग बड़ी नकद जमा पर आसानी से नजर रख सकता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला गुजरात के सूरत निवासी दिनेशभाई नागजीभाई विरडिया से जुड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार वित्तीय वर्ष 2016-17 में नोटबंदी के दौरान दिनेशभाई ने राजकोट जिला सहकारी बैंक के अपने दो खातों में कुल 11.50 लाख रुपये नकद जमा किए थे। बड़ी नकद जमा राशि को देखते हुए आयकर विभाग ने मामले की जांच शुरू कर दी।
इनकम टै्स विभाग ने क्यों उठाए सवाल?
जांच के दौरान निर्धारण अधिकारी (AO) ने माना कि किसान केवल 4.70 लाख रुपये की राशि का ही संतोषजनक स्रोत साबित कर पाए हैं। बाकी 6.80 लाख रुपये को आयकर अधिनियम की धारा 69A के तहत अघोषित आय मान लिया गया। इसके बाद विभाग ने टैक्स और जुर्माना लगाया तथा नकद जमा को संदिग्ध माना।
टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि नकद लेनदेन से जुड़े दस्तावेज कई वर्षों तक सुरक्षित रखने चाहिए, क्योंकि आयकर विभाग पुराने मामलों की भी जांच कर सकता है।
इसके खिलाफ किसान ने ITAT राजकोट में अपील दाखिल की।
किसान ने कोर्ट में क्या दलील दी?
ITAT में किसान की ओर से कहा गया कि जमा की गई रकम पूरी तरह वैध थी और इसका संबंध कृषि आय, पुरानी बचत, वेतन और बैंक से पहले निकाली गई नकदी से था।
वकील ने अदालत को बताया कि किसान के पास 28 बीघा कृषि भूमि है, जिससे अच्छी आय होती है। इसके समर्थन में भूमि दस्तावेज, फॉर्म 7/12 और 8A, कैश फ्लो स्टेटमेंट तथा बैंक स्टेटमेंट जैसे दस्तावेज भी पेश किए गए।
ITAT ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान ITAT ने माना कि किसान की ओर से पर्याप्त दस्तावेज पेश किए गए थे, लेकिन आयकर विभाग ने उनकी सही तरीके से जांच नहीं की।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि किसान के पास पर्याप्त कृषि भूमि मौजूद थी और वहां व्यावसायिक फसलें उगाई जा सकती थीं। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि कुछ दस्तावेज स्वयं के दावे पर आधारित हो सकते हैं, लेकिन केवल इसी आधार पर पूरी रकम को अघोषित आय मान लेना उचित नहीं था।
ITAT ने कैसे दिया राहत?
ITAT ने बीच का रास्ता अपनाते हुए 6.80 लाख रुपये की पूरी राशि को अघोषित आय मानने से इनकार कर दिया। इसके बजाय ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि इस रकम का केवल 10 प्रतिशत यानी 68,000 रुपये ही आय माना जाए और उसी पर सामान्य दर से टैक्स लगाया जाए।
यानी किसान को बड़ी राहत मिल गई।
देरी से अपील करने पर भी मिली राहत
रिपोर्ट्स के अनुसार किसान की अपील 47 दिन की देरी से दाखिल हुई थी। शुरुआत में आयकर विभाग ने इसका विरोध किया। हालांकि किसान द्वारा बीमारी से जुड़े दस्तावेज पेश करने पर ट्रिब्यूनल ने मानवीय आधार पर देरी को माफ कर दिया और मामले की सुनवाई की।
धारा 69A क्या है?
आयकर अधिनियम की धारा 69A तब लागू होती है, जब किसी व्यक्ति के पास ऐसी नकदी, संपत्ति या निवेश मिलता है जिसका वैध स्रोत वह साबित नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में आयकर विभाग उस रकम को अघोषित आय मानकर टैक्स और जुर्माना लगा सकता है।
नोटबंदी के बाद क्यों बढ़ी ऐसी जांच?
विशेषज्ञों के अनुसार नोटबंदी के बाद बड़ी मात्रा में जमा नकदी पर आयकर विभाग ने विशेष निगरानी शुरू की थी। खासतौर पर सहकारी बैंकों में जमा राशि, बड़ी नकद जमा और अचानक खाते में आई रकम जैसे मामलों की बड़े स्तर पर जांच की गई थी।
इसी दौरान हजारों लोगों को नोटिस भी भेजे गए थे।
आम लोगों को क्या सीख मिलती है?
टैक्स विशेषज्ञों के अनुसार अगर कोई व्यक्ति बैंक में बड़ी नकद राशि जमा करता है, तो उसे पैसों का स्रोत, बैंक रिकॉर्ड, आय के दस्तावेज और नकद निकासी का रिकॉर्ड जैसे सबूत सुरक्षित रखने चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मौखिक दावा पर्याप्त नहीं होता। अगर उचित दस्तावेज नहीं हों, तो मामला टैक्स विवाद में बदल सकता है।
केवल किसान का मामला नहीं, बड़ा संकेत भी
विशेषज्ञों के अनुसार ITAT का यह फैसला उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां आयकर विभाग बिना पर्याप्त जांच के पूरी रकम को अघोषित आय मान लेता है।
यह फैसला दिखाता है कि अदालतें केवल तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि परिस्थितियों, दस्तावेजों और वास्तविक आय स्रोत को भी महत्व देती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दिखाता है कि सही दस्तावेज और वैध आय स्रोत होने पर करदाता अदालत से राहत पा सकते हैं, लेकिन बिना रिकॉर्ड के बड़ी नकद जमा भविष्य में परेशानी बढ़ा सकती है।
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