पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री मार्गों पर संकट ने भारत के समुद्री खाद्य निर्यात (Seafood Export) को बड़ा झटका दिया है। खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ हार्मुज, लाल सागर और स्वेज नहर के आसपास बढ़ते खतरे ने भारतीय निर्यातकों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। इसका असर केवल तेल और गैस सप्लाई तक सीमित नहीं है, बल्कि अब भारत का अरबों रुपये का सीफूड कारोबार भी इसकी चपेट में आ गया है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, खाड़ी देशों को होने वाला भारत का लगभग ₹2,000-2,500 करोड़ का समुद्री खाद्य निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। कई शिपमेंट अटक गए हैं, नए ऑर्डर धीमे पड़ गए हैं और निर्यातकों को भारी लॉजिस्टिक लागत का सामना करना पड़ रहा है।
खाड़ी देशों को होने वाला निर्यात लगभग ठप
भारत से यूएई, सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन जैसे देशों को बड़ी मात्रा में जमे हुए झींगे (Frozen Shrimp), मछली और अन्य समुद्री उत्पाद भेजे जाते हैं। लेकिन पश्चिम एशिया में युद्ध जैसी स्थिति बनने के बाद शिपिंग कंपनियां जोखिम लेने से बच रही हैं।
भारतीय समुद्री खाद्य निर्यातक संघ (Seafood Exporters Association of India) के उपाध्यक्ष एलेक्स के. निनन के मुताबिक खाड़ी देशों को होने वाले करीब 90 प्रतिशत निर्यात पर असर पड़ा है। कई कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं जबकि कुछ शिपमेंट को रोकना पड़ा है।
उन्होंने कहा कि समुद्री खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होने वाली वस्तुएं हैं। अगर डिलीवरी में देरी होती है तो माल खराब होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। यही वजह है कि कई निर्यातकों ने फिलहाल नई बुकिंग लेने में सावधानी बरतनी शुरू कर दी है।
कैसे बढ़ा संकट?
पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण सबसे बड़ा असर समुद्री व्यापार मार्गों पर पड़ा है। सामान्य तौर पर भारत से यूरोप और अमेरिका तक सामान लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते भेजा जाता है। लेकिन युद्ध और हमलों के खतरे के चलते कई जहाज कंपनियां इन मार्गों पर अतिरिक्त सावधानी बरत रही हैं।
हालांकि, वैकल्पिक मार्ग अपनाने से दूरी और समय दोनों बढ़ रहे हैं। इससे कंटेनर की उपलब्धता कम हो रही है, शिपमेंट में देरी हो रही है, ईंधन खर्च बढ़ रहा है, बीमा प्रीमियम महंगे हो रहे हैं, युद्ध-जोखिम अधिभार (War Risk Surcharge) लगाया जा रहा है इन सभी कारणों से निर्यात लागत तेजी से बढ़ रही है।
अमेरिका और यूरोप के ऑर्डर पर भी असर
हाल के महीनों में भारत के समुद्री खाद्य उद्योग के लिए सकारात्मक संकेत दिखाई दे रहे थे। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते पर प्रगति और अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार वार्ता से निर्यातकों को नई उम्मीद मिली थी।
बोस्टन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सीफूड शो के दौरान भारतीय कंपनियों को नए ऑर्डर मिलने की उम्मीद थी। अमेरिकी खरीदारों से बातचीत भी आगे बढ़ रही थी। लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इस रफ्तार पर अचानक ब्रेक लगा दिया।
निर्यातकों का कहना है कि विदेशी खरीदार अब डिलीवरी समय को लेकर आशंकित हैं। कई कंपनियां नए ऑर्डर देने से पहले स्थिति सामान्य होने का इंतजार कर रही हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बाजार?
पश्चिम एशिया भारत के समुद्री खाद्य निर्यात के प्रमुख बाजारों में शामिल है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया को 65,956 टन समुद्री उत्पाद निर्यात किए थे, जिनकी कुल कीमत ₹2,328 करोड़ (278 मिलियन डॉलर) रही।
खाड़ी देशों में भारतीय झींगे और मछली की मांग लगातार बढ़ रही थी। वहां बड़ी संख्या में भारतीय आबादी होने के कारण भारतीय खाद्य उत्पादों की खपत भी अधिक है।
तेल कीमतों ने बढ़ाई परेशानी
इस संकट का दूसरा बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों के जरिए देखने को मिल रहा है। पश्चिम एशिया तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा हुआ है। इसका सीधा असर शिपिंग और ट्रांसपोर्टेशन लागत पर पड़ रहा है।
सीफूड उद्योग में कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग और लंबी दूरी तक रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट की जरूरत होती है। ऐसे में ईंधन महंगा होने से उत्पादन लागत भी तेजी से बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो भारत के समुद्री खाद्य निर्यातकों के मार्जिन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
छोटे निर्यातकों पर सबसे ज्यादा दबाव
बड़ी कंपनियों के मुकाबले छोटे और मध्यम निर्यातकों के सामने ज्यादा मुश्किलें हैं। उनके पास लंबी अवधि तक स्टॉक संभालने या अतिरिक्त लॉजिस्टिक लागत उठाने की क्षमता सीमित होती है।
कई छोटे निर्यातक अब: नई खरीद कम कर रहे हैं, शिपमेंट टाल रहे हैं, विदेशी खरीदारों से भुगतान सुरक्षा मांग रहे हैं अगर स्थिति जल्दी नहीं सुधरी तो इसका असर मछली पालन और प्रोसेसिंग उद्योग से जुड़े लाखों लोगों की आय पर भी पड़ सकता है।
आगे क्या?
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्ट्रेट ऑफ हार्मुज और लाल सागर क्षेत्र में तनाव कम नहीं हुआ तो वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव और बढ़ सकता है। इसका असर केवल सीफूड ही नहीं बल्कि पेट्रोलियम, खाद्य तेल, केमिकल और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
भारत फिलहाल वैकल्पिक व्यापार मार्गों और नए बाजारों की तलाश पर जोर दे सकता है। हालांकि समुद्री व्यापार में स्थिरता आने तक निर्यातकों की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं।
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