तमिलनाडु की राजनीति में बड़ी जीत दर्ज करने के बाद अभिनेता से नेता बने थलपति विजय ने मुख्यमंत्री के तौर पर अपना कामकाज शुरू कर दिया है। शपथ लेने के तुरंत बाद उन्होंने पिछली DMK सरकार पर राज्य को भारी कर्ज में छोड़ने का आरोप लगाया।
विजय का दावा है कि तमिलनाडु पर करीब ₹10 लाख करोड़ का कर्ज छोड़ दिया गया है और सरकारी खजाना गंभीर दबाव में है। हालांकि अब सवाल यह उठ रहा है कि खुद विजय की चुनावी घोषणाएं राज्य के वित्तीय संतुलन पर कितना असर डाल सकती हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि TVK के कई बड़े वादों को लागू करने में भारी खर्च आ सकता है, जिससे आने वाले वर्षों में राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर कर्ज तेजी से बढ़ता है, तो आने वाले वर्षों में राज्य का Debt-to-GSDP अनुपात भी दबाव में आ सकता है।
विजय ने क्या-क्या वादे किए हैं?
चुनाव प्रचार के दौरान थलपति विजय ने कई बड़ी वेलफेयर योजनाओं का वादा किया था। इनमें महिलाओं को हर महीने ₹2500 सहायता, बेरोजगार स्नातकों को ₹4000 मासिक सहायता, डिप्लोमा धारकों को ₹2500 सहायता, साल में 6 मुफ्त LPG सिलेंडर और बिजली पर अतिरिक्त सब्सिडी जैसी घोषणाएं शामिल हैं।
इसके अलावा स्कूल छोड़ने की दर कम करने के लिए ₹15,000 शिक्षा सहायता, शादी के लिए सोना और साड़ी सहायता, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को सस्ती दर पर लोन और नवजात शिशुओं के लिए विशेष सहायता पैकेज देने का भी वादा किया गया है।
विजय ने स्टार्टअप और छोटे कारोबार के लिए रियायती लोन देने की बात भी कही है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर राजस्व का बड़ा हिस्सा वेलफेयर योजनाओं में खर्च होता है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक निवेश पर असर पड़ सकता है।
कितना आ सकता है कुल खर्च?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार इन योजनाओं का सालाना खर्च ₹1 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। कुछ अनुमानों के मुताबिक अगले 5 सालों में कुल खर्च ₹4.5 लाख करोड़ से ज्यादा हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह राशि तमिलनाडु के मौजूदा टैक्स राजस्व का बड़ा हिस्सा हो सकती है।
तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति कैसी है?
रिपोर्ट्स के अनुसार 2024-25 में तमिलनाडु का कुल टैक्स राजस्व करीब ₹2.1 लाख करोड़ रहा। ऐसे में केवल नई वेलफेयर योजनाओं पर ही राजस्व का बड़ा हिस्सा खर्च हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खर्च तेजी से बढ़ा और राजस्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ा, तो राज्य को अधिक कर्ज लेना पड़ सकता है।
अर्थशास्त्रियों ने क्या कहा?
मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (MSE) के डायरेक्टर एन.आर. भानुमूर्ति ने कहा कि यह केवल किसी एक पार्टी का मामला नहीं है, बल्कि राज्यों के वित्तीय प्रबंधन में आ रहे संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्यों की वित्तीय स्थिति पर White Paper जारी किया जाना चाहिए ताकि वास्तविक आर्थिक स्थिति स्पष्ट हो सके।
भानुमूर्ति के अनुसार नई योजनाओं को लागू करने से पहले लाभार्थियों की सही पहचान, मौजूदा योजनाओं का ऑडिट और खर्च का तर्कसंगत आकलन जरूरी है।
क्या सभी योजनाएं जरूरी हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु का वेलफेयर मॉडल पहले से ही मजबूत माना जाता है।
हालांकि कुछ योजनाओं की समीक्षा करना जरूरी हो सकता है ताकि योजनाओं में दोहराव रोका जा सके, अनावश्यक खर्च कम हो और पूंजीगत निवेश के लिए संसाधन बचाए जा सकें।
DBT मॉडल क्यों अहम माना जा रहा?
भानुमूर्ति ने Direct Benefit Transfer (DBT) मॉडल को ज्यादा प्रभावी बताया। उनके अनुसार DBT के जरिए लीकेज कम किया जा सकता है, भ्रष्टाचार घटाया जा सकता है और लक्षित लोगों तक सीधे पैसा पहुंचाया जा सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अंतिम लाभार्थियों की संख्या तय होने से पहले केवल मोटे अनुमानों पर भरोसा करना सही नहीं होगा।
विजय सरकार के सामने कितनी वित्तीय गुंजाइश?
MSE के पूर्व डायरेक्टर के. षणमुगम के अनुसार तमिलनाडु पहले से ही सीमित वित्तीय दायरे में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि Fiscal Deficit पहले ही GSDP के 2.8% से 3% के करीब पहुंच चुका है।
वित्त आयोग के नियमों के अनुसार राज्यों के लिए घाटे की सीमा सीमित होती है। ऐसे में अतिरिक्त खर्च के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है।
केवल कैश ट्रांसफर पर कितना खर्च?
विशेषज्ञों के अनुसार केवल बढ़ी हुई कैश ट्रांसफर योजनाओं पर ही ₹18,000-20,000 करोड़ का अतिरिक्त सालाना खर्च आ सकता है।
वहीं राज्य के बड़े हिस्से का खर्च पहले से वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में बंधा हुआ है।
ज्यादा कर्ज लेने का खतरा
षणमुगम ने चेतावनी दी कि अगर राजस्व नहीं बढ़ता, तो सरकार के पास ज्यादा उधार लेने के अलावा बहुत कम विकल्प बचेंगे। उन्होंने कहा कि 2024-25 में तमिलनाडु का पूंजीगत व्यय करीब ₹52,000 करोड़ था।
अगर राजस्व का बड़ा हिस्सा वेलफेयर योजनाओं में चला जाता है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है।
क्या वेलफेयर योजनाएं गलत हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि अच्छी तरह डिजाइन की गई सामाजिक योजनाएं उपभोग बढ़ा सकती हैं, गरीबी कम कर सकती हैं और महिलाओं की भागीदारी बढ़ा सकती हैं।
लेकिन अगर योजनाओं का विस्तार लगातार बढ़ता रहा और राजस्व उसी अनुपात में नहीं बढ़ा, तो राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।
शपथ लेते ही विजय ने क्या फैसले किए?
रिपोर्ट्स के अनुसार शपथ लेने के कुछ घंटों के भीतर विजय ने घरेलू बिजली उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त बिजली योजना, महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष यूनिट और नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों पर कार्रवाई जैसे प्रस्तावों को मंजूरी दे दी।
आगे सबसे बड़ी चुनौती क्या?
विशेषज्ञों के अनुसार विजय सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती वेलफेयर योजनाओं और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी।
अगर राज्य को विकास, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक योजनाओं सभी मोर्चों पर आगे बढ़ना है, तो राजस्व बढ़ाने और खर्च को संतुलित रखने की रणनीति बेहद अहम होगी। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले कुछ साल तमिलनाडु के लिए यह तय करेंगे कि राज्य वेलफेयर मॉडल और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बना पाता है या नहीं।
Also Read:


