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Reading: US Tariff on India: रूस से तेल खरीदने पर 100% टैरिफ का खतरा, जानिए ट्रंप के फैसले का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर
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US Tariff on India: रूस से तेल खरीदने पर 100% टैरिफ का खतरा, जानिए ट्रंप के फैसले का भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर

Namam Sharma
Last updated: 2026/09/17 at 10:14 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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13 Min Read
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US Russia Sanctions Bill: अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने रूस और ईरान पर नए प्रतिबंधों से जुड़े ‘Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026’ को 262-159 वोटों से पारित कर दिया है। यह विधेयक पहले ही अमेरिकी सीनेट से मंजूर हो चुका है और अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए जाएगा। इसके कानून बनने के बाद ट्रंप प्रशासन के पास रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ बड़े देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार होगा।

Contents
क्या भारत पर तुरंत 100% टैरिफ लग जाएगा?भारत के लिए यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?रूस से भारत कितना तेल खरीद रहा है?अगर ट्रंप 100% टैरिफ लगाते हैं तो भारत पर क्या असर होगा?1. अमेरिका को भारतीय निर्यात महंगा हो सकता है2. भारतीय निर्यातकों के मार्जिन पर दबावभारत-अमेरिका ट्रेड डील पर भी बढ़ सकती है अनिश्चितताक्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा?पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा?रुपये और महंगाई पर भी पड़ सकता है असरक्या भारत के निर्यात पर सबसे ज्यादा असर होगा?अब आगे क्या होगा?

भारत और चीन जैसे देश इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं, क्योंकि दोनों रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100% टैरिफ उसी समय से लागू हो जाएगा। असल में यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति और प्रशासन को टैरिफ लगाने की शक्ति देता है और उसकी दर 100% तक हो सकती है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत पर सच में 100% अमेरिकी टैरिफ लगने जा रहा है? अगर ऐसा हुआ तो भारतीय अर्थव्यवस्था, निर्यात, रुपये और तेल की कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है?

क्या भारत पर तुरंत 100% टैरिफ लग जाएगा?

नहीं।

इस बिल के पास होने और भारत पर वास्तव में 100% टैरिफ लगने के बीच अंतर है। कानून बनने के बाद अमेरिकी प्रशासन को यह अधिकार मिलेगा कि वह रूस से तेल या गैस खरीदने वाले पात्र देशों से अमेरिका में आने वाले सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगा सके।

बिल के प्रावधानों के मुताबिक रूस से कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल देशों पर 100% तक सेकेंडरी टैरिफ लगाया जा सकता है। इसके अलावा रूस से जुड़े प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले कुछ देशों को भी इस प्रावधान के तहत निशाना बनाया जा सकता है।

इसका अर्थ है कि 100% अधिकतम सीमा है, तय टैरिफ दर नहीं। अमेरिकी प्रशासन परिस्थितियों के आधार पर इससे कम दर भी निर्धारित कर सकता है।

विधेयक में टैरिफ की दर को बदलने और कुछ परिस्थितियों में राहत या छूट देने से जुड़े प्रावधान भी हैं। इसलिए फिलहाल भारत के लिए इसे एक टैरिफ का वास्तविक खतरा कहना ज्यादा सही है, न कि पहले से लागू 100% शुल्क।

भारत के लिए यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की कच्चे तेल की आयात निर्भरता करीब 88% रही है।

ऐसे में भारत के लिए तेल की कीमत और सप्लाई दोनों आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव परिवहन लागत, उत्पादन लागत, महंगाई, चालू खाते और रुपये की विनिमय दर तक पहुंच सकता है।

इसी वजह से भारत पिछले कुछ वर्षों में रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी दाम वाले कच्चे तेल का बड़ा खरीदार बना है।

रूस से भारत कितना तेल खरीद रहा है?

रूसी तेल की भारत के आयात में हिस्सेदारी लगातार बदलती रही है। जुलाई 2026 में रूस की हिस्सेदारी भारत के क्रूड बास्केट में 50% से अधिक के स्तर पर पहुंची थी। हालांकि अगस्त में रूसी कच्चे तेल का आयात घटकर करीब 2.08 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया और कुल क्रूड आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 45% रही।

इससे साफ है कि भारत रूस पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। भारत सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, वेनेजुएला और अन्य देशों से भी कच्चा तेल खरीदता है।

लेकिन रूस अब भी भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। इसलिए अचानक रूसी तेल की खरीद कम करने या पूरी तरह रोकने का फैसला भारत की रिफाइनिंग कंपनियों और ऊर्जा लागत पर असर डाल सकता है।

अगर ट्रंप 100% टैरिफ लगाते हैं तो भारत पर क्या असर होगा?

यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। अमेरिकी टैरिफ भारत के रूस से खरीदे जाने वाले तेल पर सीधे नहीं लगेगा। इस प्रावधान का असर अमेरिका में आयात होने वाले भारतीय सामान पर अतिरिक्त शुल्क के रूप में हो सकता है।

यानी भारत रूस से तेल खरीदता है, जबकि अमेरिका भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त ड्यूटी लगाता है।

1. अमेरिका को भारतीय निर्यात महंगा हो सकता है

अगर अमेरिकी प्रशासन भारत पर 100% टैरिफ लागू करता है, तो अमेरिका में पहुंचने वाले भारतीय उत्पादों की लागत काफी बढ़ सकती है।

इसका असर उन क्षेत्रों पर पड़ सकता है जिनका अमेरिकी बाजार में महत्वपूर्ण कारोबार है, जैसे:

  • टेक्सटाइल और कपड़ा उद्योग
  • जेम्स एंड ज्वेलरी
  • इंजीनियरिंग सामान
  • केमिकल और कुछ औद्योगिक उत्पाद
  • ऑटो कंपोनेंट्स
  • फार्मास्यूटिकल्स से जुड़े उत्पाद
  • अन्य मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर

हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि टैरिफ किन उत्पादों पर और किस दर से लागू होता है तथा अमेरिकी खरीदार और भारतीय निर्यातक अतिरिक्त लागत को किस तरह बांटते हैं।

2. भारतीय निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव

टैरिफ बढ़ने के बाद अमेरिकी आयातकों के लिए भारतीय सामान महंगा हो सकता है। ऐसी स्थिति में कुछ कंपनियां कीमत कम करके अतिरिक्त शुल्क का हिस्सा खुद वहन करने की कोशिश कर सकती हैं।

इससे निर्यातकों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर, यदि पूरी अतिरिक्त लागत अमेरिकी खरीदार पर चली जाती है तो भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए इसका असर केवल निर्यात की मात्रा पर नहीं, बल्कि कंपनियों की कमाई पर भी पड़ सकता है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर भी बढ़ सकती है अनिश्चितता

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध पहले से ही महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत भी चलती रही है।

ऐसे समय में रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिकी टैरिफ का नया अधिकार आने से व्यापार वार्ता में एक अतिरिक्त संवेदनशील मुद्दा जुड़ सकता है।

यदि दोनों पक्ष किसी समझौते के जरिए टैरिफ का जोखिम कम करने में सफल होते हैं, तो भारतीय निर्यातकों के लिए अनिश्चितता घट सकती है। लेकिन अगर रूस से तेल खरीदने का मुद्दा व्यापार वार्ता में बाधा बनता है, तो दोनों देशों के बीच कारोबारी संबंधों पर दबाव बढ़ सकता है।

क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा?

यह आसान फैसला नहीं होगा।

भारत के लिए तेल खरीदने का फैसला केवल भू-राजनीति से नहीं बल्कि कीमत, उपलब्धता, रिफाइनरी की जरूरत और ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा है।

भारत की कच्चे तेल की आयात निर्भरता करीब 88% होने के कारण देश को लगातार अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना पड़ता है।

अगर भारत रूस से तेल की खरीद अचानक कम करता है, तो उसे दूसरे स्रोतों से ज्यादा तेल खरीदना पड़ सकता है। यदि वैकल्पिक तेल महंगा पड़ता है तो इसका असर भारतीय रिफाइनरों की लागत पर आ सकता है।

हालांकि भारत के पास सप्लायर बदलने की क्षमता है और हाल के महीनों में रूस के अलावा अन्य देशों से भी आयात में बदलाव देखने को मिला है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारत के पास कोई विकल्प नहीं है। लेकिन बड़े पैमाने पर और तेजी से सप्लायर बदलने की आर्थिक लागत अलग सवाल है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा?

अगर अमेरिकी दबाव के कारण भारत रूसी तेल की खरीद कम करता है और इसकी जगह महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ता है, तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।

ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, रुपये की विनिमय दर और घरेलू मूल्य निर्धारण नीति के आधार पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बन सकता है।

हालांकि केवल अमेरिकी टैरिफ को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सीधे बढ़ोतरी का कारण मानना सही नहीं होगा। घरेलू ईंधन कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय क्रूड, रिफाइनिंग मार्जिन, टैक्स और कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति समेत कई कारकों का असर पड़ता है।

रुपये और महंगाई पर भी पड़ सकता है असर

अगर भारत को रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते तेल की जगह अधिक महंगा क्रूड खरीदना पड़ता है, तो देश का तेल आयात बिल बढ़ सकता है।

इससे व्यापार घाटे और चालू खाते पर दबाव बढ़ने की संभावना बन सकती है। ज्यादा डॉलर की जरूरत रुपये पर भी दबाव डाल सकती है।

इसके साथ ही महंगा ईंधन परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ा सकता है। इसका असर कई वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों तक पहुंच सकता है।

लेकिन यह प्रभाव तभी महत्वपूर्ण स्तर पर सामने आएगा जब टैरिफ के कारण भारत को रूसी तेल की खरीद में बड़ा और लंबे समय तक चलने वाला बदलाव करना पड़े।

क्या भारत के निर्यात पर सबसे ज्यादा असर होगा?

अगर 100% तक टैरिफ लागू होता है, तो अमेरिका पर निर्भर भारतीय एक्सपोर्ट सेक्टर सबसे सीधे प्रभावित हो सकते हैं।

लेकिन सभी कंपनियों पर एक जैसा असर नहीं होगा।

जिन कंपनियों का अमेरिकी बाजार पर ज्यादा निर्भरता है, उनके लिए जोखिम अधिक हो सकता है। वहीं जिन कंपनियों के पास यूरोप, एशिया, मध्य पूर्व या दूसरे बाजारों में मजबूत बिक्री नेटवर्क है, वे कुछ हद तक अपने निर्यात को दूसरे बाजारों की ओर मोड़ सकती हैं।

इसलिए वास्तविक आर्थिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि टैरिफ की दर कितनी है, किन उत्पादों पर लागू होती है, कितने समय तक रहती है और भारत-अमेरिका के बीच बातचीत किस दिशा में जाती है।

अब आगे क्या होगा?

अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से बिल पास होने के बाद अगला महत्वपूर्ण कदम राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर का है। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन को कानून के तहत मिलने वाली शक्तियों का इस्तेमाल करने का फैसला करना होगा।

भारत के लिए अभी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 100% टैरिफ की अधिकतम शक्ति मिलना और वास्तव में 100% टैरिफ लागू होना दो अलग बातें हैं।

आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन की ओर से भारत की रूसी तेल खरीद, संभावित टैरिफ दर और किसी संभावित छूट या बातचीत को लेकर संकेत महत्वपूर्ण होंगे।

भारत के सामने फिलहाल दो बड़े आर्थिक हित हैं—एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापार और निर्यात संबंध, दूसरी तरफ सस्ती और पर्याप्त ऊर्जा की उपलब्धता।

इसलिए आने वाले समय में भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा, तेल आयात लागत और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती रहेगी।

Source: यह रिपोर्ट Reuters, Financial Express, भारतीय सरकारी आंकड़ों और अमेरिकी विधायी दस्तावेजों में उपलब्ध जानकारी पर आधारित है।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल समाचार और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। टैरिफ, कच्चे तेल की कीमतों और संबंधित कंपनियों के शेयरों पर इसका वास्तविक प्रभाव भविष्य के नीतिगत फैसलों और बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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