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    # UP के सरकारी इंजीनियर ने खड़ा किया था खरबों का JP साम्राज्य, फिर कर्ज ने किया बर्बाद; अब अदाणी के हाथों में कंपनी की कमान **JP Associates Story:** उत्तर प्रदेश के एक सरकारी इंजीनियर ने अपनी नौकरी छोड़कर कारोबार की दुनिया में कदम रखा और देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया। यह कहानी है जयप्रकाश गौड़ और जयप्रकाश एसोसिएट्स (JP Associates) की। यमुना एक्सप्रेसवे, बड़े बांध, सीमेंट प्लांट, बिजली परियोजनाएं और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाला यह समूह कभी देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारियों में गिना जाता था। लेकिन जरूरत से ज्यादा कर्ज, आर्थिक मंदी और कारोबार में आई मुश्किलों ने इस साम्राज्य की नींव हिला दी। आखिरकार कंपनी दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच गई और अब इसका अधिग्रहण अदाणी समूह ने कर लिया है। **बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।** कारोबार की दुनिया में कई ऐसी कहानियां हैं, जहां एक छोटे से सफर की शुरुआत करने वाला व्यक्ति बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर देता है। लेकिन कभी-कभी यही साम्राज्य समय के साथ कर्ज और आर्थिक चुनौतियों के कारण ढह भी जाता है। जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय उत्तर भारत में जेपी समूह का नाम बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता था। कंपनी ने सड़क निर्माण से लेकर बिजली उत्पादन, सीमेंट, होटल और रियल एस्टेट तक कई क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बनाई। ग्रेटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यमुना एक्सप्रेसवे भी इसी समूह की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। जेपी समूह की पहचान केवल बड़े प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं थी। लाखों निवेशकों और कर्मचारियों का भी इस कंपनी से जुड़ाव था। लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज और कारोबार में आई गिरावट ने कंपनी को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां से वापसी मुश्किल हो गई। अब अदाणी समूह ने दिवालिया समाधान प्रक्रिया के जरिए जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ कर लिया है। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे एक सरकारी इंजीनियर ने यह कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया और फिर यह आर्थिक संकट में कैसे फंस गया। ## सरकारी इंजीनियर से कारोबारी बनने तक का सफर जयप्रकाश गौड़ का जन्म वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। सरकारी सेवा के दौरान उन्हें निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ी परियोजनाओं को समझने का मौका मिला। हालांकि, उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। करीब सात साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निर्माण कार्यों की ठेकेदारी शुरू कर दी। शुरुआत में उनके पास कारोबार के लिए बहुत ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपनी करीब 10 हजार रुपये की बचत से छोटे-मोटे निर्माण और सड़क निर्माण के ठेके लेने शुरू किए। धीरे-धीरे अनुभव और काम के आधार पर उन्हें बड़ी परियोजनाएं मिलने लगीं। वर्ष 1979 में उन्होंने जयप्रकाश एसोसिएट्स की स्थापना की। शुरुआत में कंपनी का मुख्य कारोबार निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ा था। समय के साथ कंपनी ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनाई और जेपी समूह का विस्तार होता चला गया। ## बांध से लेकर बिजली और सीमेंट तक फैला कारोबार जेपी समूह ने निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत करने के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की तरफ कदम बढ़ाया। टिहरी बांध और विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। इसके बाद समूह ने सीमेंट, बिजली उत्पादन, होटल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार शुरू किया। कंपनी का उद्देश्य केवल निर्माण ठेके लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विकास और संचालन तक पहुंच गया। इस विस्तार ने जयप्रकाश एसोसिएट्स को देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में शामिल कर दिया। कंपनी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार था और निवेशकों के बीच भी इसकी अच्छी पहचान बन गई थी। ## यमुना एक्सप्रेसवे ने दिलाई देशभर में पहचान जेपी समूह के इतिहास में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना को एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। वर्ष 2003 में ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच एक्सप्रेसवे बनाने की परियोजना जेपी समूह को मिली। करीब 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का निर्माण समूह की कंपनी जेपी इंफ्राटेक ने किया। इस परियोजना के तहत सड़क निर्माण के साथ-साथ एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट विकास के अधिकार भी मिले। इससे कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉपर्टी कारोबार दोनों में विस्तार का अवसर मिला। वर्ष 2012 में यमुना एक्सप्रेसवे को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच सड़क संपर्क बेहतर हुआ। इस परियोजना ने जेपी समूह को देशभर में पहचान दिलाई। इसी दौरान कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण भी किया। इस रेसिंग सर्किट पर वर्ष 2011 से 2013 तक फॉर्मूला-1 इंडियन ग्रां प्री का आयोजन हुआ। यह परियोजना भारत में मोटरस्पोर्ट्स के लिहाज से काफी चर्चित रही। ## 2008 की मंदी के बाद बिगड़ने लगे हालात तेजी से विस्तार कर रहे जेपी समूह के लिए वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी बड़ा झटका साबित हुई। मंदी के बाद रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती आने लगी। मकानों की बिक्री प्रभावित हुई और निर्माण परियोजनाओं से मिलने वाली रकम में देरी होने लगी। दूसरी तरफ बिजली और सीमेंट कारोबार में भी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही थी। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत थी, जबकि कारोबार से पर्याप्त नकदी नहीं आ रही थी। बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसी बड़ी परियोजनाओं पर हुआ निवेश भी कंपनी के वित्तीय दबाव को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रहा। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम उधार ली थी, लेकिन आमदनी और नकदी का प्रवाह कर्ज चुकाने की रफ्तार के अनुरूप नहीं रहा। कर्ज का बोझ बढ़ने के साथ कंपनी को अपनी कई संपत्तियां और कारोबारी हिस्सेदारियां बेचनी पड़ीं। इसके बावजूद वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे जेपी समूह का संकट गहराता चला गया। ## घर खरीदारों से लेकर बैंकों तक, हर कोई हुआ परेशान जेपी समूह का आर्थिक संकट केवल कंपनी और बैंकों तक सीमित नहीं रहा। इसका असर उन हजारों लोगों पर भी पड़ा, जिन्होंने कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में अपने घर बुक किए थे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जेपी विशटाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में घर खरीदारों का पैसा फंस गया। कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत लगाकर घर खरीदे थे, लेकिन उन्हें तय समय पर फ्लैट नहीं मिल पाए। इस स्थिति ने जेपी समूह की मुश्किलें और बढ़ा दीं। एक तरफ बैंक और वित्तीय संस्थान अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, वहीं दूसरी तरफ घर खरीदार अपने घरों का इंतजार कर रहे थे। ## 2017 में शुरू हुई दिवालिया प्रक्रिया जेपी समूह की मुश्किलें सबसे पहले उसकी सहायक कंपनी जेपी इंफ्राटेक के मामले में सामने आईं। अगस्त 2017 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में सुरक्षा समूह ने समाधान प्रक्रिया के तहत जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, इससे पूरे जेपी समूह की वित्तीय परेशानियां खत्म नहीं हुईं। समूह की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड भी भारी कर्ज के कारण संकट में फंस गई। 3 जून 2024 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। इस मामले में वित्तीय लेनदारों ने करीब 57,185 करोड़ रुपये के बकाये का दावा किया था। इसके बाद कंपनी के कारोबार और संपत्तियों के समाधान के लिए बोली प्रक्रिया शुरू हुई। कई बड़े कारोबारी समूहों ने कंपनी को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। ## वेदांता ने लगाई बड़ी बोली, लेकिन अदाणी ने मारी बाजी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण की प्रक्रिया में वेदांता समूह और अदाणी समूह समेत कई कंपनियों ने हिस्सा लिया। सितंबर 2025 में वेदांता समूह की 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली की खबर सामने आई थी। इससे माना जा रहा था कि कंपनी का नियंत्रण अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता समूह के पास जा सकता है। हालांकि, बाद में समाधान प्रक्रिया में स्थिति बदल गई। नवंबर 2025 में वित्तीय लेनदारों ने अदाणी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को कर्जदाताओं के करीब 89 फीसदी वोट मिले। इसके बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अदाणी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, वेदांता समूह ने इस फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी थी। मई 2026 में NCLAT ने वेदांता की अपील खारिज कर दी। इससे अदाणी समूह के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ने का रास्ता मिला। ## अब अदाणी समूह के नियंत्रण में जेपी की संपत्तियां जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान के बाद समूह की कई संपत्तियां और कारोबार अदाणी समूह की रणनीति का हिस्सा बन गए हैं। अदाणी समूह की अलग-अलग कंपनियां जेपी समूह की विभिन्न कारोबारी इकाइयों और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल कर रही हैं। इसी क्रम में अदाणी पावर ने जेपी पावर से जुड़ी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया। वहीं, जेपी समूह के कुछ सीमेंट प्लांटों को अदाणी समूह ने डालमिया भारत को बेचने का फैसला किया। इस तरह जिस जेपी समूह ने कभी उत्तर भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसका कारोबारी स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। जयप्रकाश गौड़ की कहानी कारोबार की दुनिया में बड़े सपने, तेजी से विस्तार और वित्तीय अनुशासन के महत्व को समझाती है। महज 10 हजार रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर देश के बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचा, लेकिन भारी कर्ज और नकदी की कमी ने अंततः इस साम्राज्य को दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचा दिया। **Source:** उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर आधारित। jp-associates-jayprakash-gaur-rise-fall-adani-takeover-story
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US Tariff on India: 15 देशों में ₹19 लाख करोड़ का नया बाजार तैयार, अमेरिका की 100% टैरिफ धमकी से नहीं डरेगा भारत

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/10 at 7:57 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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US Tariff on India: रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से 100% तक टैरिफ लगाने की धमकी ने भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर अमेरिका भारतीय उत्पादों पर भारी आयात शुल्क लगाता भी है, तो भारत के पास अपने निर्यात को दूसरे बड़े बाजारों की ओर मोड़ने का विकल्प मौजूद है। विशेषज्ञों के मुताबिक, करीब 15 देशों में 200 अरब डॉलर यानी लगभग 19 लाख करोड़ रुपये का संभावित बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए उपलब्ध हो सकता है।

Contents
अमेरिका की टैरिफ धमकी के बीच भारत के पास बड़ा विकल्प15 देशों में 200 अरब डॉलर का बाजारअमेरिका के मुकाबले दूसरे बाजारों में तेज एक्सपोर्ट ग्रोथकिन भारतीय उत्पादों को मिल सकता है फायदा?UAE और सऊदी अरब जैसे बाजार क्यों अहम हैं?यूरोप में भी बढ़ाया जा सकता है एक्सपोर्टअमेरिका को 100% टैरिफ लगाने से क्या नुकसान होगा?भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ेगा असरभारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए क्या है आगे की रणनीति?भारत के लिए चुनौती से ज्यादा अवसर?

अमेरिका की टैरिफ धमकी के बीच भारत के पास बड़ा विकल्प

अमेरिका लंबे समय से भारत के साथ व्यापार और टैरिफ को लेकर बातचीत करता रहा है। अब रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की संभावित कार्रवाई ने भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत के लिए अमेरिका एक महत्वपूर्ण एक्सपोर्ट मार्केट है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत से अमेरिका को मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट करीब 87.3 अरब डॉलर रहा, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा करीब 86.5 अरब डॉलर था।

ऐसे में अगर अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर बहुत ज्यादा शुल्क लगाया जाता है, तो कुछ सेक्टरों पर दबाव बढ़ सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय कंपनियों के पास दूसरे विकल्प नहीं हैं।

15 देशों में 200 अरब डॉलर का बाजार

प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. एसपी शर्मा के मुताबिक, अमेरिका के अलावा करीब 15 देशों में ऐसे बाजार मौजूद हैं जहां भारत अपने उत्पादों का निर्यात बढ़ा सकता है। इन बाजारों में भारत के लिए लगभग 200 अरब डॉलर का अवसर उपलब्ध हो सकता है।

इन संभावित बाजारों में नीदरलैंड्स, फ्रांस, ब्रिटेन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), नेपाल और लैटिन अमेरिका के कई देश शामिल हैं।

इसका मतलब यह है कि भारतीय निर्यातक सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपने कारोबार को अलग-अलग देशों में फैला सकते हैं। अगर सही रणनीति अपनाई जाती है तो अमेरिका में संभावित टैरिफ के असर को कुछ हद तक दूसरे बाजारों में बढ़ी बिक्री से संतुलित किया जा सकता है।

अमेरिका के मुकाबले दूसरे बाजारों में तेज एक्सपोर्ट ग्रोथ

डॉ. एसपी शर्मा के अनुसार, भारत के निर्यात में सिर्फ अमेरिकी बाजार की ही भूमिका नहीं है। अमेरिका को भारत का एक्सपोर्ट करीब 10-15% की दर से बढ़ रहा है, जबकि कई वैकल्पिक बाजारों में भारतीय निर्यात की वृद्धि दर करीब 20-25% तक देखी गई है।

यह आंकड़ा भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां पहले से ही अमेरिका के बाहर अपने बाजार का विस्तार कर रही हैं।

अगर इन देशों में भारतीय उत्पादों की मांग इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले समय में भारत के कुल एक्सपोर्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी को संतुलित किया जा सकता है।

किन भारतीय उत्पादों को मिल सकता है फायदा?

भारत का एक्सपोर्ट पोर्टफोलियो काफी विविध है। भारतीय कंपनियां टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कई अन्य उत्पादों का निर्यात करती हैं।

इनमें से कई उत्पादों में भारत की सबसे बड़ी ताकत कम लागत और प्रतिस्पर्धी कीमत है। श्रम-केंद्रित उद्योगों में भारत की बड़ी क्षमता है और इसी वजह से वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बनी हुई है।

यदि अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगा होता है, तो निर्यातकों के लिए यूरोप, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर पैदा हो सकता है।

UAE और सऊदी अरब जैसे बाजार क्यों अहम हैं?

भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र पहले से ही एक महत्वपूर्ण व्यापारिक क्षेत्र है। UAE और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ भारत के मजबूत कारोबारी संबंध हैं।

UAE भारत के लिए सिर्फ एक बड़ा बाजार ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों तक पहुंच बनाने का महत्वपूर्ण कारोबारी केंद्र भी है। वहीं सऊदी अरब में बुनियादी ढांचे, निर्माण, खाद्य उत्पादों, इंजीनियरिंग और कई अन्य क्षेत्रों में मांग बढ़ रही है।

अगर भारतीय कंपनियां इन बाजारों में अपनी सप्लाई बढ़ाती हैं, तो अमेरिका पर किसी एक सेक्टर या उत्पाद की निर्भरता को कम किया जा सकता है।

यूरोप में भी बढ़ाया जा सकता है एक्सपोर्ट

नीदरलैंड्स, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय बाजार भी भारत के लिए महत्वपूर्ण विकल्प हैं। यूरोप में भारतीय उत्पादों की पहले से मौजूद मांग को देखते हुए निर्यातकों के पास कारोबार बढ़ाने का आधार मौजूद है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत को अब अपनी एक्सपोर्ट रणनीति में मार्केट डायवर्सिफिकेशन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। इसका मतलब है कि किसी एक देश में बिक्री पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय कई देशों में ग्राहक और सप्लाई नेटवर्क तैयार करना।

यह रणनीति सिर्फ अमेरिकी टैरिफ के जोखिम को कम नहीं करेगी, बल्कि भारतीय कंपनियों को वैश्विक व्यापार में ज्यादा मजबूत स्थिति भी दे सकती है।

अमेरिका को 100% टैरिफ लगाने से क्या नुकसान होगा?

अगर भारतीय उत्पादों पर 100% तक टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर सिर्फ भारत पर नहीं पड़ेगा। इसका एक हिस्सा अमेरिकी बाजार और वहां के उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।

आयात शुल्क बढ़ने के बाद अमेरिकी आयातकों के लिए भारतीय सामान की लागत बढ़ सकती है। कंपनियां इस अतिरिक्त लागत को अपने ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं। ऐसी स्थिति में अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं।

इससे कुछ उत्पादों की कीमत बढ़ने और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना हो सकती है।

भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ेगा असर

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते काफी महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का बड़ा व्यापार होता है और दोनों अर्थव्यवस्थाओं की कंपनियों के बीच कारोबारी संबंध भी गहरे हैं।

इसके अलावा दोनों देश व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करते रहे हैं। ऐसे में अगर टैरिफ को लेकर बड़ा टकराव होता है, तो इसका असर दोनों देशों के कारोबारी हितों पर पड़ सकता है।

डॉ. एसपी शर्मा का मानना है कि व्यापार को टकराव का माध्यम बनाने के बजाय दोनों देशों के आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए समाधान तलाशना ज्यादा फायदेमंद होगा।

भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए क्या है आगे की रणनीति?

अमेरिकी टैरिफ का जोखिम भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती जरूर है, लेकिन यह उनके लिए बाजारों में विविधता लाने का अवसर भी बन सकता है।

कंपनियां तीन स्तरों पर अपनी रणनीति मजबूत कर सकती हैं। पहला, अमेरिका के अलावा नए देशों में ग्राहक आधार बढ़ाना। दूसरा, उत्पादों की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी कीमत बनाए रखना। तीसरा, यूरोप, पश्चिम एशिया, लैटिन अमेरिका और एशिया के उभरते बाजारों में स्थानीय कारोबारी साझेदारों के साथ नेटवर्क मजबूत करना।

अगर भारत इन बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में सफल रहता है, तो अमेरिकी टैरिफ का संभावित असर काफी हद तक कम किया जा सकता है।

भारत के लिए चुनौती से ज्यादा अवसर?

अमेरिका की 100% टैरिफ की धमकी निश्चित रूप से भारतीय निर्यातकों के लिए गंभीर चुनौती है। खासकर उन कंपनियों पर इसका असर पड़ सकता है जिनका कारोबार अमेरिकी बाजार पर ज्यादा निर्भर है।

लेकिन दूसरी तरफ, 15 देशों में करीब 200 अरब डॉलर यानी लगभग 19 लाख करोड़ रुपये के संभावित बाजार का अवसर भारत के लिए महत्वपूर्ण है। यदि भारतीय कंपनियां इन बाजारों में तेजी से विस्तार करती हैं तो एक्सपोर्ट सेक्टर को लंबे समय में फायदा हो सकता है।

इसलिए मौजूदा स्थिति को सिर्फ अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के रूप में देखने के बजाय भारत के लिए वैश्विक निर्यात बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के अवसर के तौर पर भी देखा जा सकता है।

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TAGGED: 15 Countries Export Market, 200 Billion Dollar Market, India Export, India US Tariff, Indian Exporters, US 100% Tariff, US Tariff on India, अमेरिका टैरिफ, भारत का एक्सपोर्ट, भारत पर अमेरिकी टैरिफ
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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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