भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई संकट की आशंकाओं के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की सरकारी तेल कंपनी ADNOC ने भारत में अपने कच्चे तेल के भंडारण को बढ़ाने पर सहमति जताई है। इस फैसले से भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve) करीब 70% तक बढ़ सकता है।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया के कई हिस्सों में जियो-पॉलिटिकल संकट गहराता जा रहा है और तेल सप्लाई चेन पर लगातार दबाव बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ऊर्जा सुरक्षा सरकार के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो चुकी है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह समझौता?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। देश की अर्थव्यवस्था, ट्रांसपोर्ट सिस्टम, इंडस्ट्री और बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा तेल और गैस पर निर्भर करता है। ऐसे में यदि किसी वजह से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई बाधित होती है तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
ADNOC के साथ हुआ नया समझौता भारत को भविष्य के किसी भी तेल संकट से निपटने में बड़ी राहत दे सकता है। वर्तमान में भारत के पास लगभग 5.3 मिलियन टन का रणनीतिक तेल भंडार है। यह रिजर्व विशाखापत्तनम, मैंगलोर और पादुर स्थित भूमिगत स्टोरेज सुविधाओं में रखा गया है।
नई योजना के तहत UAE की कंपनी भारत में अपने कच्चे तेल का स्टोरेज बढ़ाकर लगभग 30 मिलियन बैरल तक कर सकती है। इससे भारत के कुल रणनीतिक तेल भंडार में करीब 40 लाख टन अतिरिक्त कच्चा तेल जुड़ सकता है।
मैंगलोर में पहले से मौजूद है UAE का स्टोरेज
UAE की सरकारी कंपनी ADNOC फिलहाल मैंगलोर स्थित रणनीतिक भंडारण सुविधा में लगभग 60 लाख बैरल कच्चा तेल रखती है। भारत सरकार ने कुछ वर्षों पहले विदेशी तेल कंपनियों को अपने रणनीतिक रिजर्व में तेल रखने की अनुमति दी थी ताकि जरूरत पड़ने पर भारत इस तेल का उपयोग कर सके।
नई डील के बाद मैंगलोर और अन्य संभावित लोकेशनों पर UAE की स्टोरेज क्षमता कई गुना बढ़ सकती है। इससे भारत को दो बड़े फायदे मिलेंगे:
- संकट के समय तुरंत तेल उपलब्ध रहेगा
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने पर भारत को राहत मिलेगी
पश्चिम एशिया संकट के बीच बढ़ी चिंता
पिछले कुछ महीनों से पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है। कई देशों के बीच संघर्ष और समुद्री मार्गों पर खतरे के कारण दुनिया भर में तेल सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है।
भारत के लिए यह चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि देश का बड़ा हिस्सा तेल आयात पश्चिम एशियाई देशों से आता है। यदि किसी वजह से सप्लाई बाधित होती है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
इसी जोखिम को कम करने के लिए भारत रणनीतिक तेल भंडार को तेजी से बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है।
भारत सरकार पहले ही बना चुकी है बड़ा प्लान
केंद्र सरकार ने साल 2021 में ओडिशा के चांदीखोल और कर्नाटक के पादुर में नए रणनीतिक तेल रिजर्व बनाने को मंजूरी दी थी। इनकी कुल क्षमता करीब 6.5 मिलियन टन होगी।
यह परियोजना PPP मॉडल यानी Public Private Partnership के तहत विकसित की जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि भारत के पास इतना रणनीतिक भंडार हो कि आपातकाल की स्थिति में कई दिनों तक देश की जरूरत पूरी की जा सके।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को चीन और अमेरिका की तरह अपने रणनीतिक तेल भंडार को और तेजी से बढ़ाने की जरूरत है। अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व है।
LPG भंडारण पर भी फोकस
सिर्फ कच्चे तेल ही नहीं बल्कि LPG यानी रसोई गैस के रणनीतिक भंडारण पर भी सरकार तेजी से काम कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत 20 से 30 दिनों की जरूरत के बराबर LPG रिजर्व बनाने पर विचार कर रहा है।
ADNOC और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के बीच LPG सप्लाई बढ़ाने को लेकर भी समझौता हुआ है। इससे भविष्य में घरेलू गैस सप्लाई को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होने का असर सीधे आम लोगों पर पड़ सकता है। यदि भारत के पास पर्याप्त तेल भंडार मौजूद रहेगा तो:
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक भारी बढ़ोतरी का खतरा कम होगा
- सप्लाई संकट के दौरान बाजार स्थिर रहेगा
- ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को राहत मिलेगी
- महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल भंडार मजबूत होने से सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर मोलभाव की ताकत भी मिलती है।
भारत-UAE ऊर्जा साझेदारी लगातार मजबूत
UAE पहले से ही भारत को कच्चा तेल सप्लाई करने वाले शीर्ष देशों में शामिल है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच LNG और प्राकृतिक गैस को लेकर भी लंबे समय के समझौते हैं।
UAE आने वाले वर्षों में अपना तेल उत्पादन बढ़ाकर 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक ले जाने की योजना बना रहा है। इसका फायदा भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों को मिल सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मौजूदगी में हुए इन समझौतों को दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
भविष्य के लिए क्यों जरूरी है मजबूत ऑयल रिजर्व?
कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया तनाव जैसे घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा अब केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत बन चुकी है।
यदि किसी देश के पास पर्याप्त तेल भंडार नहीं होता तो वैश्विक संकट के समय उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। भारत तेजी से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, इसलिए आने वाले वर्षों में ऊर्जा की मांग और भी तेज होगी।
ऐसे में UAE के साथ हुआ यह समझौता भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक डील नहीं बल्कि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने वाला बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
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