ऐप बंद कर विरोध जताएंगे लाखों गिग वर्कर्स, बढ़ती महंगाई और कम कमाई बना बड़ा मुद्दा
नई दिल्ली: देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी अब केवल आम उपभोक्ताओं तक सीमित मुद्दा नहीं रह गई है। इसका सीधा असर उन लाखों गिग वर्कर्स की कमाई पर भी पड़ रहा है जो रोजाना ऐप आधारित प्लेटफॉर्म पर काम करके अपना घर चला रहे हैं। इसी बढ़ती आर्थिक परेशानी के खिलाफ अब गिग वर्कर्स ने बड़ा कदम उठाया है।
गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (GIPSWU) ने 16 मई को राष्ट्रव्यापी अस्थायी हड़ताल का आह्वान किया है। यूनियन ने देशभर के डिलीवरी पार्टनर्स, बाइक टैक्सी ड्राइवर्स, कैब ड्राइवर्स और अन्य ऐप-आधारित वर्कर्स से दोपहर 12 बजे से शाम 5 बजे तक सेवाएं बंद रखने की अपील की है।
यूनियन का कहना है कि लगातार बढ़ रही ईंधन कीमतों ने उनकी कमाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। कंपनियां अब भी पुराने रेट स्ट्रक्चर पर भुगतान कर रही हैं जबकि पेट्रोल-डीजल की लागत तेजी से बढ़ चुकी है। ऐसे में लंबे समय तक काम करने के बावजूद उनकी “टेक-होम इनकम” लगातार घटती जा रही है।
क्यों बढ़ा गिग वर्कर्स का गुस्सा?
भारत में पिछले कुछ महीनों से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, सप्लाई चेन दबाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा हुआ है। इसका असर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ा है।
हाल ही में तेल कंपनियों ने ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी की थी। इसके बाद से बाइक आधारित डिलीवरी एजेंट, राइड-हेलिंग ड्राइवर्स और लॉजिस्टिक्स वर्कर्स की लागत अचानक बढ़ गई।
गिग वर्कर्स का कहना है कि हर दिन ईंधन पर खर्च बढ़ रहा है, कंपनियां प्रति किलोमीटर भुगतान नहीं बढ़ा रहीं, इंसेंटिव मॉडल लगातार कमजोर हुआ है वाहन मेंटेनेंस और EMI का बोझ भी बढ़ गया है यही वजह है कि अब यह मुद्दा केवल वेतन नहीं बल्कि “जीविका संकट” का रूप ले चुका है।
क्या है गिग वर्कर्स की मुख्य मांग?
गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (GIPSWU) ने सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों के सामने कई मांगें रखी हैं। इनमें सबसे प्रमुख मांग प्रति किलोमीटर सर्विस रेट बढ़ाने की है।
यूनियन का कहना है कि जब ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, तब फ्यूल कॉस्ट के हिसाब से पेमेंट स्ट्रक्चर भी अपडेट होना चाहिए।
वर्कर्स की प्रमुख मांगें:
- प्रति किलोमीटर बेस रेट में तुरंत बढ़ोतरी
- फ्यूल प्राइस लिंक्ड पेमेंट सिस्टम
- न्यूनतम आय की गारंटी
- गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा कानून
- बीमा और मेडिकल सुरक्षा
- प्लेटफॉर्म कंपनियों की पारदर्शी पेमेंट नीति
यूनियन का आरोप है कि कई कंपनियां एल्गोरिदम आधारित पेमेंट सिस्टम के जरिए वर्कर्स की वास्तविक कमाई कम कर रही हैं जबकि काम का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
1.2 करोड़ गिग वर्कर्स पर असर
भारत में गिग इकॉनमी तेजी से बढ़ रही है। सरकारी और उद्योग रिपोर्ट्स के मुताबिक देश में लगभग 1.2 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में गिग या प्लेटफॉर्म आधारित काम से जुड़े हुए हैं।
इनमें शामिल हैं फूड डिलीवरी एजेंट, बाइक टैक्सी राइडर्स, कैब ड्राइवर्स, ई-कॉमर्स डिलीवरी पार्टनर्स, लॉजिस्टिक्स और हाइपरलोकल सर्विस वर्कर्स
इनमें से अधिकांश लोग अपने निजी वाहन का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए पेट्रोल और डीजल की कीमत बढ़ने का सबसे बड़ा असर इन्हीं पर पड़ता है।
कई वर्कर्स का कहना है कि पहले जहां एक दिन में ईंधन खर्च निकालने के बाद ठीक-ठाक बचत हो जाती थी, अब वही कमाई आधी रह गई है।
सोशल मीडिया पर भी तेज हुआ अभियान
GIPSWU ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी इस हड़ताल को लेकर अभियान चलाया है। यूनियन ने पोस्ट जारी कर देशभर के गिग वर्कर्स से विरोध में शामिल होने की अपील की।
यूनियन ने अपने संदेश में कहा:
“बढ़ती ईंधन कीमतें और कम पेमेंट रेट्स गिग वर्कर्स की जिंदगी को अस्थिर बना रहे हैं। अब आवाज उठाने का समय आ गया है।”
सोशल मीडिया पर कई डिलीवरी पार्टनर्स और ड्राइवर्स ने अपनी कमाई से जुड़े स्क्रीनशॉट और अनुभव भी साझा किए हैं। कई लोगों का कहना है कि 10-12 घंटे काम करने के बाद भी बचत बेहद कम रह गई है।
क्या सेवाओं पर पड़ेगा असर?
अगर बड़ी संख्या में गिग वर्कर्स इस हड़ताल में शामिल होते हैं, तो इसका असर कई ऐप आधारित सेवाओं पर दिखाई दे सकता है।
संभावित असर फूड डिलीवरी में देरी, कैब बुकिंग कठिन हो सकती है, बाइक टैक्सी सेवाएं प्रभावित, ई-कॉमर्स डिलीवरी स्लो हो सकती है हालांकि यह हड़ताल केवल पांच घंटे के लिए घोषित की गई है, लेकिन इससे कंपनियों और सरकार दोनों पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।
गिग इकॉनमी में कानून की कमी भी बड़ा मुद्दा
गिग वर्कर्स लंबे समय से कानूनी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। अभी तक भारत में गिग वर्कर्स के लिए कोई व्यापक केंद्रीय कानून लागू नहीं हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि गिग वर्कर्स कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आते, उन्हें पारंपरिक नौकरी जैसी सुरक्षा नहीं मिलती, PF, पेंशन और मेडिकल सुरक्षा सीमित है, कमाई पूरी तरह प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम पर निर्भर रहती है ऐसे में जब महंगाई बढ़ती है, तो सबसे ज्यादा दबाव इन्हीं वर्कर्स पर आता है।
कंपनियों के सामने बढ़ेगी चुनौती
देश में तेजी से बढ़ती गिग इकॉनमी ने लाखों युवाओं को रोजगार दिया है। लेकिन अब कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वर्कर्स की आय और टिकाऊ कमाई सुनिश्चित करना बनती जा रही है।
अगर ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है और भुगतान मॉडल में बदलाव नहीं होता, तो आने वाले समय में ऐसे विरोध और तेज हो सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि कंपनियों को अब:
- डायनामिक फ्यूल इंसेंटिव
- न्यूनतम कमाई मॉडल
- पारदर्शी कमिशन सिस्टम
जैसे कदमों पर विचार करना पड़ सकता है।
आम लोगों पर भी पड़ सकता है असर
गिग इकॉनमी आज शहरी जीवन का बड़ा हिस्सा बन चुकी है। खाने की डिलीवरी से लेकर ऑफिस आने-जाने तक करोड़ों लोग इन सेवाओं पर निर्भर हैं। यदि भविष्य में इस तरह के आंदोलन बढ़ते हैं, तो:
- डिलीवरी चार्ज बढ़ सकते हैं
- कैब किराया महंगा हो सकता है
- कंपनियां ग्राहकों पर अतिरिक्त लागत डाल सकती हैं
यानी पेट्रोल-डीजल की कीमतों का असर केवल ड्राइवर्स तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंचेगा।
निष्कर्ष
पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने अब गिग इकॉनमी की कमाई मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लाखों ऐप-आधारित वर्कर्स का कहना है कि बढ़ती लागत और घटती कमाई के बीच उनका गुजारा मुश्किल होता जा रहा है।
16 मई की यह राष्ट्रव्यापी हड़ताल केवल कुछ घंटों का विरोध नहीं, बल्कि तेजी से बदलती डिजिटल अर्थव्यवस्था में श्रमिक अधिकारों और आर्थिक सुरक्षा की बड़ी बहस का संकेत भी मानी जा रही है। अगर आने वाले समय में सरकार और प्लेटफॉर्म कंपनियां इस मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठातीं, तो गिग सेक्टर में असंतोष और बढ़ सकता है।
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