HighLights
- अमेरिकी वित्त सचिव ने टैरिफ दोबारा लागू होने के संकेत दिए।
- धारा 301 की जांच पूरी होने के बाद पुराने शुल्क लौट सकते हैं।
- भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त की शर्त पर अड़ा भारत।
- 24 जुलाई को खत्म हो रही है धारा 122 के तहत लागू 10% वैश्विक टैरिफ की अवधि।
नई दिल्ली: ईरान-अमेरिका तनाव के बीच कुछ दिनों तक वैश्विक व्यापार में टैरिफ को लेकर शांति बनी रही, लेकिन अब एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति चर्चा में आ गई है। अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट के हालिया बयान से संकेत मिला है कि अमेरिका पहले हटाए गए टैरिफ को एक नए कानूनी रास्ते के जरिए फिर से लागू करने की तैयारी कर रहा है।
बेसेंट ने कहा कि फिलहाल अमेरिका ने व्यापार अधिनियम की धारा 122 (Section 122) के तहत 10% का अस्थायी वैश्विक टैरिफ लागू किया है। यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) धारा 301 के तहत अपनी जांच पूरी नहीं कर लेता। यदि जांच सरकार के पक्ष में जाती है तो पहले लागू किए गए टैरिफ फिर से उसी स्तर पर बहाल किए जा सकते हैं।
अभी 10% अस्थायी टैरिफ लागू
स्कॉट बेसेंट के अनुसार, फिलहाल अमेरिका धारा 122 के तहत 10% वैश्विक टैरिफ वसूल रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय धारा 301 के तहत विस्तृत अध्ययन कर रहा है और यदि इस प्रक्रिया से सरकार को कानूनी आधार मिल जाता है तो पुराने टैरिफ दोबारा लागू कर दिए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था केवल अस्थायी है और इसका उद्देश्य व्यापारिक हितों की सुरक्षा करना है।
24 जुलाई के बाद क्या होगा?
अमेरिकी कानून के अनुसार धारा 122 के तहत लगाया गया कोई भी टैरिफ अधिकतम 150 दिनों तक ही लागू रह सकता है। मौजूदा व्यवस्था की अवधि 24 जुलाई को समाप्त होने वाली है। ऐसे में बाजार की नजर इस बात पर टिकी है कि धारा 301 की जांच तब तक पूरी होती है या नहीं।
यदि जांच समय पर पूरी हो जाती है तो अमेरिका पुराने शुल्कों को फिर से लागू कर सकता है। अन्यथा सरकार को कोई नया कानूनी विकल्प तलाशना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बदली रणनीति
इस साल अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) राष्ट्रपति को मनमाने तरीके से आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं देता। इसी फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन ने अस्थायी राहत के रूप में धारा 122 का इस्तेमाल किया।
अब प्रशासन दीर्घकालिक समाधान के लिए धारा 301 के तहत कानूनी प्रक्रिया अपना रहा है। धारा 301 के अंतर्गत शुल्क लगाने से पहले लिखित आपत्तियां, सार्वजनिक सुनवाई और विस्तृत जांच जैसी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं।
2026 में टैरिफ से राजस्व पर क्या असर पड़ेगा?
स्कॉट बेसेंट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पारस्परिक (Reciprocal) टैरिफ का इस्तेमाल व्यापारिक साझेदार देशों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए किया था। उनका मानना है कि धारा 301 की प्रक्रिया भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच सफल रहती है तो अमेरिकी सरकार को 2026 में टैरिफ राजस्व में केवल मामूली गिरावट आने की उम्मीद है।
भारत समेत 50 से अधिक देशों पर अतिरिक्त शुल्क का प्रस्ताव
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने अपने अंतरिम निष्कर्षों में भारत सहित 50 से अधिक देशों से आयात होने वाले कुछ उत्पादों पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। आरोप है कि ये देश जबरन श्रम (Forced Labour) से बने उत्पादों के आयात को रोकने में पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं।
इसके अलावा भारत सहित 15 देशों को लेकर संरचनात्मक अतिरिक्त क्षमता (Structural Overcapacity) से जुड़ी एक अलग धारा 301 जांच भी जारी है, जिसकी अंतिम रिपोर्ट अभी आना बाकी है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर भारत का स्पष्ट रुख
इसी बीच भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) पर बातचीत जारी है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने साफ कहा कि भारत किसी भी समझौते पर तभी आगे बढ़ेगा जब उसे अपने प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में स्पष्ट व्यापारिक लाभ मिलेगा।
गोयल ने कहा कि भारत ऐसा समझौता नहीं करेगा जिससे वियतनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका या अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारतीय उद्योगों की स्थिति कमजोर हो जाए।
उनके अनुसार, जब तक भारत को समान उत्पादन लागत वाले देशों पर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त सुनिश्चित नहीं होती, तब तक अमेरिका के साथ किसी भी व्यापार समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जाएगा।
वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है असर
यदि अमेरिका धारा 301 के तहत पुराने टैरिफ दोबारा लागू करता है तो इसका असर केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहेगा। भारत सहित कई निर्यातक देशों के लिए अमेरिकी बाजार में सामान भेजना महंगा हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, यदि भारत को प्रस्तावित व्यापार समझौते में बेहतर बाजार पहुंच और कम शुल्क का लाभ मिलता है तो भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर भी खुल सकते हैं।
ऐसे में अगले कुछ सप्ताह वैश्विक व्यापार और भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
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