हर माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए पूरी जिंदगी मेहनत करते हैं। वे अपनी इच्छाओं से ज्यादा बच्चों के सपनों को महत्व देते हैं। लेकिन कई बार जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर ऐसे हालात बन जाते हैं, जो रिश्तों को लेकर कई सवाल खड़े कर देते हैं। हरियाणा के सोनीपत से सामने आया एक ऐसा ही मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, जहां एक बुजुर्ग पिता की अंतिम विदाई उनकी बेटियों की गैरमौजूदगी में हुई। तीनों बेटियां अलग-अलग शहरों और देशों में होने के कारण अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच सकीं और उन्होंने वीडियो कॉल के जरिए अपने पिता को आखिरी विदाई दी।
लंबी बीमारी के बाद हुआ निधन
📍हरियाणा, सोनीपत
एक पिता की आखिरी इच्छा अपनी बेटियों से मिलने की थी, लेकिन किस्मत ने उन्हें यह पल भी नसीब नहीं होने दिया। बेटियां पिता के अंतिम संस्कार को सिर्फ वीडियो कॉल के जरिए देखा।
बड़ी बेटी अनिता ने ऑनलाइन 5100 रुपये भेजे और एक संस्था से अंतिम संस्कार करवाने के लिए कहा pic.twitter.com/c7ewIkfXhz
— Journalist Ravendra kumar (@Chhotukingoffi1) August 5, 2026 मृतक की पहचान शिवचरण राम रतन गुप्ता के रूप में हुई है। वह मूल रूप से मुंबई के रहने वाले थे और कपड़ा कारोबार से जुड़े थे। बढ़ती उम्र के साथ वह अपनी पत्नी मीना के साथ हरियाणा के सोनीपत स्थित वेस्ट राम नगर में समाज कल्याण शिक्षा समिति द्वारा संचालित एक वृद्धाश्रम में रहने लगे थे। करीब डेढ़ साल पहले दोनों यहां आए थे, लेकिन कुछ समय पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। इसके बाद शिवचरण अकेले ही वृद्धाश्रम में रह रहे थे।
वृद्धाश्रम प्रशासन के मुताबिक, शिवचरण लंबे समय से बीमार थे। मंगलवार सुबह करीब 3:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी मौत के तुरंत बाद प्रशासन ने उनकी तीनों बेटियों को सूचना दी।
पहले भी दी गई थी पिता की बिगड़ती तबीयत की जानकारी
वृद्धाश्रम प्रबंधन का कहना है कि करीब 20 दिन पहले भी तीनों बेटियों को उनके पिता की गंभीर तबीयत की जानकारी दी गई थी और उनसे मिलने आने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, कोई भी बेटी उनसे मिलने नहीं पहुंच सकी।
शिवचरण अपनी बेटियों का इंतजार करते रहे, लेकिन बीमारी के दौरान भी उन्हें उनसे मुलाकात नसीब नहीं हुई।
वीडियो कॉल पर देखी पिता की अंतिम विदाई
निधन के बाद वृद्धाश्रम प्रशासन ने तीनों बेटियों से अंतिम संस्कार में शामिल होने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने अलग-अलग कारणों से सोनीपत आने में असमर्थता जताई। इसके बाद अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया वीडियो कॉल के जरिए दिखाई गई।
वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने मिलकर शिवचरण का अंतिम संस्कार कराया, जबकि उनकी बेटियां नेपाल, उत्तर प्रदेश और मुंबई से ऑनलाइन जुड़ी रहीं और वीडियो कॉल पर पूरी प्रक्रिया देखती रहीं।
अंतिम संस्कार के लिए भेजे 5,100 रुपये
नेपाल में रहने वाली बड़ी बेटी अनीता, जो पेशे से शिक्षिका हैं, उन्होंने ऑनलाइन 5,100 रुपये भेजकर पिता का अंतिम संस्कार विधिपूर्वक कराने का अनुरोध किया। अंतिम संस्कार पूरा होने के बाद बेटियों ने उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी मांगी।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में एक बेटी यह कहते हुए भी सुनाई देती है कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में कितना समय लगेगा, क्योंकि उन्हें खाना खाना और नहाना है। हालांकि, इस वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
बेटियों की पढ़ाई के लिए लगा दी थी पूरी जिंदगी
वृद्धाश्रम के अनुसार, शिवचरण ने अपनी तीनों बेटियों की शिक्षा और बेहतर भविष्य के लिए पूरी जिंदगी मेहनत की। उन्हें अपनी बेटियों की उपलब्धियों पर गर्व था। उनकी दो बेटियां शिक्षिका बनीं।
- बड़ी बेटी अनीता नेपाल में रहती हैं।
- दूसरी बेटी निशा उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में रहती हैं।
- सबसे छोटी बेटी प्रिया मुंबई में अपने परिवार के साथ रहती हैं।
अस्थियां लेने भी नहीं पहुंचा परिवार
शुरुआत में परिवार ने शिवचरण की अस्थियां सुरक्षित रखने के लिए कहा था, लेकिन बाद में उन्होंने सोनीपत आने में असमर्थता जताई। इसके बाद उन्होंने वृद्धाश्रम प्रबंधन से अनुरोध किया कि उनकी अस्थियों का गंगा में विसर्जन भी वहीं से करा दिया जाए।
मृत्यु के बाद भी दे गए नई रोशनी
शिवचरण की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनके निधन के बाद उनकी आंखें दान कर दी गईं। इससे जरूरतमंद लोगों को दृष्टि मिलने की उम्मीद है। इस तरह वह अपनी अंतिम सांस के बाद भी किसी के जीवन में उजाला छोड़ गए।
रिश्तों पर खड़े हुए कई सवाल
सोनीपत की यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि बदलती पारिवारिक परिस्थितियों, बढ़ती दूरियों और बुजुर्गों की देखभाल को लेकर समाज में नई चर्चा छेड़ रही है। हालांकि, बेटियों के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाने के पीछे उनके अपने व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे मामलों में सभी परिस्थितियों को समझना भी उतना ही आवश्यक है जितना भावनात्मक पहलू पर विचार करना।


