Singapore Employment Case: सिंगापुर में एक महिला कर्मचारी को प्रोबेशन पीरियड के दौरान “खराब प्रदर्शन” का हवाला देकर नौकरी से निकालना कंपनी को भारी पड़ गया। एम्प्लॉयमेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (Employment Claims Tribunal) ने पाया कि कंपनी कर्मचारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को उचित तरीके से साबित नहीं कर सकी। इसके बाद ट्रिब्यूनल ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कंपनी को S$30,000 (करीब ₹19 लाख) का मुआवजा देने का आदेश दिया।
अप्रैल 2025 में जॉइन की थी नौकरी
महिला कर्मचारी ने अप्रैल 2025 में कंपनी में काम शुरू किया था। नियुक्ति के समय उसे छह महीने के प्रोबेशन पर रखा गया। प्रोबेशन खत्म होने से पहले कंपनी ने उसे सूचित किया कि उसका रोजगार आगे जारी नहीं रखा जाएगा क्योंकि उसका प्रदर्शन कंपनी की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा।
हालांकि, कर्मचारी ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। उसका कहना था कि नौकरी के दौरान उसे कभी भी न तो कोई लिखित चेतावनी दी गई और न ही मौखिक रूप से उसके प्रदर्शन को लेकर किसी तरह की गंभीर आपत्ति जताई गई।
महिला ने कंपनी पर लगाए कई आरोप
ट्रिब्यूनल में दायर अपने दावे में महिला ने कहा कि कंपनी ने जिन प्रदर्शन मानकों के आधार पर उसे अयोग्य बताया, उनकी जानकारी उसे कभी स्पष्ट रूप से नहीं दी गई।
उसने यह भी आरोप लगाया कि एक प्रोजेक्ट में व्हिसलब्लोअर की भूमिका निभाने के बाद उसके साथ अनुचित व्यवहार किया गया। इसके अलावा महिला ने भाषा के आधार पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि कोरियन भाषा न जानने की वजह से उसे अलग नजरिए से देखा गया।
ट्रिब्यूनल ने कंपनी की दलीलों को माना कमजोर
मामले की सुनवाई के दौरान एम्प्लॉयमेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल के मजिस्ट्रेट जोएल टैन ने कहा कि किसी भी कर्मचारी का मूल्यांकन उन मानकों के आधार पर नहीं किया जा सकता, जिनकी जानकारी उसे पहले कभी दी ही नहीं गई हो।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कंपनी कर्मचारियों से किसी खास स्तर के प्रदर्शन की अपेक्षा रखती है तो उन अपेक्षाओं और मूल्यांकन के मानकों को पहले से स्पष्ट करना उसकी जिम्मेदारी है। बाद में उन्हीं अस्पष्ट मानकों के आधार पर कर्मचारी को अयोग्य ठहराना उचित नहीं माना जा सकता।
प्रोबेशन प्रक्रिया में मिली बड़ी खामी
ट्रिब्यूनल ने माना कि कर्मचारी के काम में सुधार की संभावना हो सकती थी, लेकिन कंपनी यह साबित नहीं कर पाई कि उसने पहले से स्पष्ट प्रदर्शन लक्ष्य तय किए थे या कर्मचारी को सुधार का पर्याप्त अवसर दिया था।
फैसले में कहा गया कि यह मामला किसी गंभीर लापरवाही, अनुशासनहीनता या बड़ी गलती का नहीं था, बल्कि कंपनी की अस्पष्ट अपेक्षाओं और कमजोर मूल्यांकन प्रक्रिया का परिणाम था।
भेदभाव और व्हिसलब्लोअर वाले आरोप नहीं हुए साबित
हालांकि, ट्रिब्यूनल ने महिला के उन आरोपों को स्वीकार नहीं किया जिनमें उसने भाषा के आधार पर भेदभाव और व्हिसलब्लोअर बनने के कारण प्रताड़ित किए जाने की बात कही थी। इन आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर उन्हें खारिज कर दिया गया।
₹19 लाख का मुआवजा देने का आदेश
महिला ने तीन महीने के वेतन के बराबर S$34,500 के मुआवजे की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने माना कि वह इस दावे की पात्र थी, लेकिन कानूनी सीमा के कारण अधिकतम S$30,000 (करीब ₹19 लाख) का ही मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
कंपनियों के लिए क्या है सीख?
यह फैसला कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि किसी कर्मचारी को केवल “खराब प्रदर्शन” का हवाला देकर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। यदि कर्मचारी के प्रदर्शन को आधार बनाकर कार्रवाई करनी है तो:
- प्रदर्शन के मानक पहले से स्पष्ट होने चाहिए।
- कर्मचारी को नियमित फीडबैक और चेतावनी दी जानी चाहिए।
- सुधार का उचित अवसर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
- मूल्यांकन प्रक्रिया पारदर्शी और दस्तावेजों के साथ होनी चाहिए।
यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता, तो कंपनी के फैसले को अदालत या ट्रिब्यूनल में चुनौती दी जा सकती है और मुआवजा भी देना पड़ सकता है.


