SEBI CAS Framework: क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में फिलहाल कोई बदलाव नहीं
शेयर बाजार में पिछले दो दिनों से क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, सेबी ने हाल ही में ब्रोकर्स के साथ हुई बैठक में साफ कहा कि CAS फ्रेमवर्क में तुरंत किसी तरह का बदलाव करने का उसका कोई इरादा नहीं है।
सेबी का मानना है कि मौजूदा सिस्टम या तकनीक में कोई खामी नहीं है। शुरुआती दौर में सामने आ रही समस्याएं मुख्य रूप से कम भागीदारी (Participation) की वजह से हैं, जो समय के साथ सामान्य हो जाएंगी।
ब्रोकर्स के साथ बैठक में क्या हुई चर्चा?
इकोनॉमिक पॉलिसी एडिटर लक्ष्मण राय के अनुसार, सेबी और ब्रोकर्स की बैठक में मुख्य रूप से CAS में बाजार सहभागिता बढ़ाने पर चर्चा हुई।
बैठक के दौरान सेबी ने कहा कि:
- CAS सिस्टम पर उसकी लगातार नजर बनी हुई है।
- फिलहाल नियमों या डिजाइन में बदलाव की कोई आवश्यकता नहीं है।
- इस फ्रेमवर्क को लागू करने से पहले व्यापक अध्ययन और परीक्षण किया गया था।
- बाजार को नए सिस्टम के अनुरूप ढलने के लिए थोड़ा समय देना जरूरी है।
सेबी का मानना है कि जैसे-जैसे अधिक निवेशक और संस्थागत प्रतिभागी क्लोजिंग ऑक्शन में शामिल होंगे, कीमतों में स्थिरता अपने आप बढ़ेगी।
CAS को लेकर बाजार में क्यों मचा था हंगामा?
क्लोजिंग ऑक्शन सेशन लागू होने के बाद शुरुआती दिनों में कुछ शेयरों की क्लोजिंग कीमतों में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिला। इसके बाद कई ब्रोकर्स और ट्रेडर्स ने आशंका जताई कि यदि इस सेशन में पर्याप्त ऑर्डर नहीं आए तो अंतिम क्लोजिंग प्राइस वास्तविक बाजार मूल्य को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं कर पाएगी।
इसी वजह से बाजार में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि सेबी जल्द ही CAS के नियमों में बदलाव कर सकती है। हालांकि अब सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है।
CAS क्या है और यह कैसे काम करता है?
CAS (Closing Auction Session) शेयर बाजार में ट्रेडिंग समाप्त होने के समय शेयरों की अंतिम और निष्पक्ष कीमत तय करने की प्रक्रिया है।
इस दौरान:
- निवेशकों के खरीद और बिक्री के ऑर्डर एक निश्चित समय तक एकत्र किए जाते हैं।
- उसके बाद ऐसी कीमत तय की जाती है जिस पर सबसे अधिक शेयरों का लेन-देन संभव हो।
- यही कीमत संबंधित शेयर की आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस बनती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य बाजार बंद होने के समय किसी शेयर की अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष कीमत तय करना है।
कम भागीदारी से क्यों बढ़ती है समस्या?
यदि क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान खरीद और बिक्री के ऑर्डर बहुत कम आते हैं तो:
- खरीद और बिक्री के बीच बड़ा अंतर बन सकता है।
- क्लोजिंग प्राइस सामान्य ट्रेडिंग कीमत से काफी ऊपर या नीचे जा सकती है।
- इससे निवेशकों को वास्तविक बाजार मूल्य का सही संकेत नहीं मिल पाता।
यही कारण है कि कुछ बाजार विशेषज्ञों ने शुरुआती चरण में CAS को लेकर चिंता व्यक्त की थी।
सेबी का क्या कहना है?
सूत्रों के मुताबिक, सेबी का स्पष्ट मानना है कि मौजूदा समस्या तकनीक या सिस्टम की नहीं बल्कि सीमित मार्केट पार्टिसिपेशन की है।
नियामक का कहना है कि:
- जैसे-जैसे अधिक निवेशक और संस्थागत प्रतिभागी CAS में शामिल होंगे, कीमतों में स्थिरता आएगी।
- यदि भविष्य में पर्याप्त भागीदारी के बावजूद असामान्य मूल्य उतार-चढ़ाव जारी रहता है, तभी डिजाइन या नियमों में बदलाव पर विचार किया जाएगा।
- फिलहाल प्राथमिकता बाजार सहभागियों को इस नई व्यवस्था के प्रति जागरूक करना और उनकी भागीदारी बढ़ाना है।
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
फिलहाल निवेशकों को यह समझना होगा कि CAS एक नया फ्रेमवर्क है और इसे पूरी तरह स्थिर होने में कुछ समय लग सकता है। सेबी फिलहाल किसी त्वरित बदलाव के बजाय इसके प्रदर्शन की लगातार निगरानी कर रही है। यदि आने वाले समय में बाजार सहभागिता बढ़ती है, तो क्लोजिंग प्राइस अधिक सटीक और स्थिर होने की संभावना है।


