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    # UP के सरकारी इंजीनियर ने खड़ा किया था खरबों का JP साम्राज्य, फिर कर्ज ने किया बर्बाद; अब अदाणी के हाथों में कंपनी की कमान **JP Associates Story:** उत्तर प्रदेश के एक सरकारी इंजीनियर ने अपनी नौकरी छोड़कर कारोबार की दुनिया में कदम रखा और देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया। यह कहानी है जयप्रकाश गौड़ और जयप्रकाश एसोसिएट्स (JP Associates) की। यमुना एक्सप्रेसवे, बड़े बांध, सीमेंट प्लांट, बिजली परियोजनाएं और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाला यह समूह कभी देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारियों में गिना जाता था। लेकिन जरूरत से ज्यादा कर्ज, आर्थिक मंदी और कारोबार में आई मुश्किलों ने इस साम्राज्य की नींव हिला दी। आखिरकार कंपनी दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच गई और अब इसका अधिग्रहण अदाणी समूह ने कर लिया है। **बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।** कारोबार की दुनिया में कई ऐसी कहानियां हैं, जहां एक छोटे से सफर की शुरुआत करने वाला व्यक्ति बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर देता है। लेकिन कभी-कभी यही साम्राज्य समय के साथ कर्ज और आर्थिक चुनौतियों के कारण ढह भी जाता है। जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय उत्तर भारत में जेपी समूह का नाम बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता था। कंपनी ने सड़क निर्माण से लेकर बिजली उत्पादन, सीमेंट, होटल और रियल एस्टेट तक कई क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बनाई। ग्रेटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यमुना एक्सप्रेसवे भी इसी समूह की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। जेपी समूह की पहचान केवल बड़े प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं थी। लाखों निवेशकों और कर्मचारियों का भी इस कंपनी से जुड़ाव था। लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज और कारोबार में आई गिरावट ने कंपनी को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां से वापसी मुश्किल हो गई। अब अदाणी समूह ने दिवालिया समाधान प्रक्रिया के जरिए जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ कर लिया है। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे एक सरकारी इंजीनियर ने यह कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया और फिर यह आर्थिक संकट में कैसे फंस गया। ## सरकारी इंजीनियर से कारोबारी बनने तक का सफर जयप्रकाश गौड़ का जन्म वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। सरकारी सेवा के दौरान उन्हें निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ी परियोजनाओं को समझने का मौका मिला। हालांकि, उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। करीब सात साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निर्माण कार्यों की ठेकेदारी शुरू कर दी। शुरुआत में उनके पास कारोबार के लिए बहुत ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपनी करीब 10 हजार रुपये की बचत से छोटे-मोटे निर्माण और सड़क निर्माण के ठेके लेने शुरू किए। धीरे-धीरे अनुभव और काम के आधार पर उन्हें बड़ी परियोजनाएं मिलने लगीं। वर्ष 1979 में उन्होंने जयप्रकाश एसोसिएट्स की स्थापना की। शुरुआत में कंपनी का मुख्य कारोबार निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ा था। समय के साथ कंपनी ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनाई और जेपी समूह का विस्तार होता चला गया। ## बांध से लेकर बिजली और सीमेंट तक फैला कारोबार जेपी समूह ने निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत करने के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की तरफ कदम बढ़ाया। टिहरी बांध और विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। इसके बाद समूह ने सीमेंट, बिजली उत्पादन, होटल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार शुरू किया। कंपनी का उद्देश्य केवल निर्माण ठेके लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विकास और संचालन तक पहुंच गया। इस विस्तार ने जयप्रकाश एसोसिएट्स को देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में शामिल कर दिया। कंपनी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार था और निवेशकों के बीच भी इसकी अच्छी पहचान बन गई थी। ## यमुना एक्सप्रेसवे ने दिलाई देशभर में पहचान जेपी समूह के इतिहास में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना को एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। वर्ष 2003 में ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच एक्सप्रेसवे बनाने की परियोजना जेपी समूह को मिली। करीब 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का निर्माण समूह की कंपनी जेपी इंफ्राटेक ने किया। इस परियोजना के तहत सड़क निर्माण के साथ-साथ एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट विकास के अधिकार भी मिले। इससे कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉपर्टी कारोबार दोनों में विस्तार का अवसर मिला। वर्ष 2012 में यमुना एक्सप्रेसवे को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच सड़क संपर्क बेहतर हुआ। इस परियोजना ने जेपी समूह को देशभर में पहचान दिलाई। इसी दौरान कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण भी किया। इस रेसिंग सर्किट पर वर्ष 2011 से 2013 तक फॉर्मूला-1 इंडियन ग्रां प्री का आयोजन हुआ। यह परियोजना भारत में मोटरस्पोर्ट्स के लिहाज से काफी चर्चित रही। ## 2008 की मंदी के बाद बिगड़ने लगे हालात तेजी से विस्तार कर रहे जेपी समूह के लिए वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी बड़ा झटका साबित हुई। मंदी के बाद रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती आने लगी। मकानों की बिक्री प्रभावित हुई और निर्माण परियोजनाओं से मिलने वाली रकम में देरी होने लगी। दूसरी तरफ बिजली और सीमेंट कारोबार में भी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही थी। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत थी, जबकि कारोबार से पर्याप्त नकदी नहीं आ रही थी। बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसी बड़ी परियोजनाओं पर हुआ निवेश भी कंपनी के वित्तीय दबाव को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रहा। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम उधार ली थी, लेकिन आमदनी और नकदी का प्रवाह कर्ज चुकाने की रफ्तार के अनुरूप नहीं रहा। कर्ज का बोझ बढ़ने के साथ कंपनी को अपनी कई संपत्तियां और कारोबारी हिस्सेदारियां बेचनी पड़ीं। इसके बावजूद वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे जेपी समूह का संकट गहराता चला गया। ## घर खरीदारों से लेकर बैंकों तक, हर कोई हुआ परेशान जेपी समूह का आर्थिक संकट केवल कंपनी और बैंकों तक सीमित नहीं रहा। इसका असर उन हजारों लोगों पर भी पड़ा, जिन्होंने कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में अपने घर बुक किए थे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जेपी विशटाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में घर खरीदारों का पैसा फंस गया। कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत लगाकर घर खरीदे थे, लेकिन उन्हें तय समय पर फ्लैट नहीं मिल पाए। इस स्थिति ने जेपी समूह की मुश्किलें और बढ़ा दीं। एक तरफ बैंक और वित्तीय संस्थान अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, वहीं दूसरी तरफ घर खरीदार अपने घरों का इंतजार कर रहे थे। ## 2017 में शुरू हुई दिवालिया प्रक्रिया जेपी समूह की मुश्किलें सबसे पहले उसकी सहायक कंपनी जेपी इंफ्राटेक के मामले में सामने आईं। अगस्त 2017 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में सुरक्षा समूह ने समाधान प्रक्रिया के तहत जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, इससे पूरे जेपी समूह की वित्तीय परेशानियां खत्म नहीं हुईं। समूह की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड भी भारी कर्ज के कारण संकट में फंस गई। 3 जून 2024 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। इस मामले में वित्तीय लेनदारों ने करीब 57,185 करोड़ रुपये के बकाये का दावा किया था। इसके बाद कंपनी के कारोबार और संपत्तियों के समाधान के लिए बोली प्रक्रिया शुरू हुई। कई बड़े कारोबारी समूहों ने कंपनी को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। ## वेदांता ने लगाई बड़ी बोली, लेकिन अदाणी ने मारी बाजी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण की प्रक्रिया में वेदांता समूह और अदाणी समूह समेत कई कंपनियों ने हिस्सा लिया। सितंबर 2025 में वेदांता समूह की 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली की खबर सामने आई थी। इससे माना जा रहा था कि कंपनी का नियंत्रण अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता समूह के पास जा सकता है। हालांकि, बाद में समाधान प्रक्रिया में स्थिति बदल गई। नवंबर 2025 में वित्तीय लेनदारों ने अदाणी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को कर्जदाताओं के करीब 89 फीसदी वोट मिले। इसके बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अदाणी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, वेदांता समूह ने इस फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी थी। मई 2026 में NCLAT ने वेदांता की अपील खारिज कर दी। इससे अदाणी समूह के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ने का रास्ता मिला। ## अब अदाणी समूह के नियंत्रण में जेपी की संपत्तियां जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान के बाद समूह की कई संपत्तियां और कारोबार अदाणी समूह की रणनीति का हिस्सा बन गए हैं। अदाणी समूह की अलग-अलग कंपनियां जेपी समूह की विभिन्न कारोबारी इकाइयों और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल कर रही हैं। इसी क्रम में अदाणी पावर ने जेपी पावर से जुड़ी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया। वहीं, जेपी समूह के कुछ सीमेंट प्लांटों को अदाणी समूह ने डालमिया भारत को बेचने का फैसला किया। इस तरह जिस जेपी समूह ने कभी उत्तर भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसका कारोबारी स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। जयप्रकाश गौड़ की कहानी कारोबार की दुनिया में बड़े सपने, तेजी से विस्तार और वित्तीय अनुशासन के महत्व को समझाती है। महज 10 हजार रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर देश के बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचा, लेकिन भारी कर्ज और नकदी की कमी ने अंततः इस साम्राज्य को दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचा दिया। **Source:** उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर आधारित। jp-associates-jayprakash-gaur-rise-fall-adani-takeover-story
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Safeguard Tariff: ट्रंप ने भारत को दिया एक और झटका, इन प्रोडक्ट्स पर लगाया 55% तक नया टैरिफ

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/18 at 11:20 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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Safeguard Tariff: अमेरिका ने भारतीय निर्यातकों को एक और झटका दिया है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स पर 15 अगस्त 2026 से 25% से 55% तक का नया सेफगार्ड टैरिफ लागू किया है। भारत ने इस फैसले के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन (WTO) का रुख किया है। भारत का कहना है कि इस मामले में उसके व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं और वह अमेरिकी फैसले पर बातचीत करना चाहता है।

Contents
भारत ने WTO में मांगा परामर्शअमेरिका भारतीय क्वार्ट्ज के लिए कितना बड़ा बाजार?क्या होते हैं Quartz Surface Products?कौन-कौन सी भारतीय कंपनियां करती हैं एक्सपोर्ट?चार साल तक लागू रहेगा नया सेफगार्ड टैरिफभारत और चीन पर लागू, कई देशों को छूटपहले से लगी ड्यूटी के ऊपर नया बोझभारत के सामने क्या विकल्प हैं?भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए क्यों अहम है यह मामला?

भारत ने WTO में मांगा परामर्श

भारत ने 14 अगस्त को WTO के सेफगार्ड्स समझौते के तहत अमेरिका के साथ परामर्श की मांग की। भारत ने कहा है कि क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स पर लगाए गए नए व्यापारिक उपाय में उसका पर्याप्त हित है।

भारत ने अमेरिका की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी तक पहुंच, सेफगार्ड कार्रवाई पर चर्चा का अवसर और WTO नियमों के तहत अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग की है। दोनों देशों के बीच बातचीत वर्चुअल माध्यम से आयोजित किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है, हालांकि अभी इसकी तारीख तय नहीं हुई है।

यह कदम फिलहाल औपचारिक WTO विवाद की शुरुआत नहीं माना जा रहा है। बातचीत के दौरान भारत अमेरिकी जांच में आयात बढ़ने, घरेलू उद्योग को गंभीर नुकसान और दोनों के बीच कारण-प्रभाव संबंध से जुड़े निष्कर्षों पर सवाल उठा सकता है।

अमेरिका भारतीय क्वार्ट्ज के लिए कितना बड़ा बाजार?

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 72.5% थी।

इस अवधि में भारत ने अमेरिका को लगभग 23.33 करोड़ डॉलर के एग्लोमरेटेड क्वार्ट्ज स्लैब और कुछ क्वार्ट्ज एवं ग्लास सरफेस प्रोडक्ट्स का निर्यात किया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारतीय क्वार्ट्ज इंडस्ट्री अमेरिकी बाजार पर कितनी निर्भर है।

नए टैरिफ के कारण इस सेक्टर की भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में अपने उत्पादों को प्रतिस्पर्धी कीमत पर बेच पाना मुश्किल हो सकता है।

क्या होते हैं Quartz Surface Products?

क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स इंजीनियर्ड स्टोन से बने उत्पाद होते हैं। इन्हें आमतौर पर कुचले हुए क्वार्ट्ज या सिलिका को रेजिन, पिगमेंट और दूसरी सामग्रियों के साथ मिलाकर तैयार किया जाता है।

इस मिश्रण को दबाकर और पॉलिश करके मजबूत एवं नॉन-पोरस स्लैब बनाया जाता है। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से:

  • किचन काउंटरटॉप
  • बाथरूम वैनिटी
  • फर्श
  • दीवारों की क्लैडिंग
  • होम रेनोवेशन प्रोजेक्ट्स

में किया जाता है।

भारत में इनका उत्पादन मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और तेलंगाना में होता है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी इस क्षेत्र में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मौजूद है।

कौन-कौन सी भारतीय कंपनियां करती हैं एक्सपोर्ट?

GTRI के अनुसार, भारत से क्वार्ट्ज सरफेस प्रोडक्ट्स का निर्यात करने वाली प्रमुख कंपनियों में पोकरना इंजीनियर्ड स्टोन, मारुधर क्वार्ट्ज सरफेसेस, कलिंगास्टोन से जुड़ी कंपनियां, ARO ग्रेनाइट इंडस्ट्रीज, पैसिफिक क्वार्ट्ज सरफेसेस, कैमरोला क्वार्ट्ज, एस्प्रिट स्टोन्स, माही ग्रेनाइट्स, केरोस स्टोन और क्वार्ट्जक्राफ्ट शामिल हैं।

GTRI के मुताबिक, भारतीय निर्माताओं ने अमेरिकी बाजार की जरूरतों के अनुसार अपने स्लैब के आकार, डिजाइन, पैटर्न, सर्टिफिकेशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को विकसित किया है। ऐसे में अचानक दूसरे देशों के बाजारों में शिफ्ट करना कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा।

चार साल तक लागू रहेगा नया सेफगार्ड टैरिफ

अमेरिका का यह सेफगार्ड उपाय 15 अगस्त 2026 से 14 अगस्त 2030 तक लागू रहेगा। यानी इसकी अवधि चार साल होगी।

पहले साल में कुल 13.006 मिलियन वर्ग मीटर का ग्लोबल कोटा निर्धारित किया गया है। इस मात्रा को चार तिमाही हिस्सों में बांटा जाएगा। भारत के लिए अलग से कोई विशेष कोटा तय नहीं किया गया है।

कोटे के भीतर आने वाले आयात पर अतिरिक्त 25% ड्यूटी लगेगी, जबकि कोटे से अधिक आयात पर 50% टैरिफ लागू होगा।

इसका मतलब है कि जिन क्वार्ट्ज काउंटरटॉप स्लैब पर पहले अमेरिका में अतिरिक्त सेफगार्ड ड्यूटी नहीं थी, उन पर अब 25% से 50% तक अतिरिक्त शुल्क का असर पड़ सकता है।

वहीं, जिन ग्लास प्रोडक्ट्स पर पहले से करीब 5% टैरिफ लगता था, उन पर कुल ड्यूटी का बोझ 30% से 55% तक पहुंच सकता है। इसके अलावा कुछ मामलों में एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी भी लागू हो सकती हैं।

भारत और चीन पर लागू, कई देशों को छूट

अमेरिका ने कुछ देशों और अपने कई फ्री-ट्रेड पार्टनर्स को इस सेफगार्ड उपाय से बाहर रखा है। इनमें कनाडा, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देश शामिल हैं।

इसके विपरीत भारत और चीन इस उपाय के दायरे में बने हुए हैं। ऐसे में भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में उन देशों के सप्लायर्स से भी प्रतिस्पर्धा करनी होगी जिन्हें सेफगार्ड से छूट मिली है।

पहले से लगी ड्यूटी के ऊपर नया बोझ

GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिका में भारतीय क्वार्ट्ज उत्पादों के एक बड़े हिस्से पर पहले से ही एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी लागू है।

GTRI के मुताबिक, पोकरना, मरुधर और समीक्षा के दायरे में आई 44 अन्य भारतीय कंपनियों पर मौजूदा एंटी-डंपिंग रेट शून्य है। वहीं जिन सप्लायर्स की समीक्षा नहीं हुई है, उनके लिए सामान्य दर करीब 1.02% बताई गई है। काउंटरवेलिंग ड्यूटी अलग-अलग मामलों में 1.57% से 2.34% के बीच है, जबकि अन्य कंपनियों के लिए यह करीब 2.17% हो सकती है।

ऐसे में नया सेफगार्ड टैरिफ भारतीय कंपनियों पर पहले से मौजूद व्यापारिक शुल्कों के अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

भारत के सामने क्या विकल्प हैं?

भारत WTO में होने वाली बातचीत के दौरान अमेरिका से कई मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांग सकता है। इनमें यह सवाल प्रमुख होगा कि क्या अमेरिका ने आयात में बढ़ोतरी, घरेलू उद्योग को गंभीर नुकसान और दोनों के बीच स्पष्ट कारण-प्रभाव संबंध को WTO नियमों के मुताबिक साबित किया है।

इसके अलावा भारत:

  • सेफगार्ड उपाय की अवधि की समीक्षा की मांग कर सकता है।
  • ग्लोबल कोटा के आकार पर सवाल उठा सकता है।
  • भारत के लिए अलग या देश-विशिष्ट कोटा की मांग कर सकता है।
  • कोटा के प्रशासन को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग कर सकता है।
  • कुछ उत्पादों या कंपनियों के लिए छूट की मांग कर सकता है।
  • कुल टैरिफ बोझ कम करने के लिए बातचीत कर सकता है।

फिलहाल भारत का तत्काल लक्ष्य बातचीत के जरिए भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए राहत हासिल करना नजर आ रहा है। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकलता है, तो भारत WTO के तहत आगे उपलब्ध विकल्पों पर भी विचार कर सकता है।

भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए क्यों अहम है यह मामला?

अमेरिका भारतीय क्वार्ट्ज सरफेस इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा बाजार है। इसलिए 25% से 55% तक के टैरिफ का असर केवल निर्यात की लागत तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि कंपनियों की कीमत, मार्जिन और अमेरिकी ग्राहकों के साथ उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर भी पड़ सकता है।

भारतीय कंपनियों के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी कैसे बनाए रखें। वहीं भारत की WTO पहल से यह उम्मीद है कि बातचीत के जरिए टैरिफ, कोटा या देश-विशिष्ट व्यवस्था में कुछ राहत हासिल की जा सके।

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TAGGED: donald trump, India Export, India US trade, Quartz Export, Quartz Surface Products, Quartz Tariff, Safeguard Tariff, Trump Tariff, US Tariff on India, WTO, WTO India
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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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