नई दिल्ली: पिछले कई महीनों से लगातार दबाव झेल रहे भारतीय रुपये ने आखिरकार राहत की सांस ली है। शुक्रवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 14 पैसे मजबूत होकर 95.55 के स्तर पर खुला। यह मजबूती ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के संकेत मिले हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखी गई है। विदेशी मुद्रा बाजार के जानकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को आगे बढ़ाने तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य होने की संभावना ने निवेशकों की चिंता कम की है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा और तेल में गिरावट ने भारतीय रुपये को मजबूती देने का काम किया।
हालांकि विशेषज्ञ अभी इसे रुपये की स्थायी वापसी नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित नहीं रहतीं और विदेशी निवेशकों का भरोसा भारतीय बाजारों में नहीं लौटता, तब तक रुपये पर दबाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा।
आखिर क्यों मजबूत हुआ रुपया?
भारतीय रुपये की चाल पर सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों का पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। जब तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। पिछले कुछ दिनों में पश्चिम एशिया से आई सकारात्मक खबरों के बाद ब्रेंट क्रूड में गिरावट देखने को मिली। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और ईरान युद्धविराम को 60 दिनों तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों की आवाजाही जारी रहने की संभावना ने भी बाजार को राहत दी है।
इसी वजह से ब्रेंट क्रूड 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया। तेल की कीमतों में नरमी आते ही रुपये को भी समर्थन मिला और वह पिछले सत्र के 95.69 के मुकाबले 95.55 पर पहुंच गया।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
दुनिया के ऊर्जा बाजार की धड़कन कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों से निकलने वाला कच्चा तेल इसी रास्ते दुनिया भर के देशों तक पहुंचता है। भारत भी अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से प्राप्त करता है। जब भी इस समुद्री मार्ग में तनाव या अवरोध की आशंका पैदा होती है, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं। इसका असर सीधे भारत के आयात बिल, चालू खाते के घाटे और रुपये की कीमत पर पड़ता है।
यही कारण है कि होर्मुज से जुड़ी किसी भी सकारात्मक खबर को भारतीय बाजार काफी गंभीरता से लेते हैं।
तीन महीनों से दबाव में था रुपया
फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद भारतीय मुद्रा लगातार दबाव में रही। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, बढ़ती तेल कीमतें और वैश्विक अनिश्चितता ने रुपये को कमजोर कर दिया। विश्लेषकों के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद से रुपया लगभग 5 प्रतिशत तक टूट चुका है। इस दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजारों से बड़ी मात्रा में धन निकाला। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर और बॉन्ड बेचते हैं तो उन्हें डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर पड़ता है।
हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने समय-समय पर हस्तक्षेप करके रुपये की गिरावट को नियंत्रित रखने की कोशिश की। अगर आरबीआई बाजार में डॉलर नहीं बेचता तो गिरावट और अधिक तेज हो सकती थी।
क्या आम लोगों को मिलेगा फायदा?
रुपये की मजबूती का असर केवल विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। इसका फायदा आम लोगों तक भी पहुंच सकता है। अगर रुपया लगातार मजबूत होता है और कच्चे तेल की कीमतें नीचे आती हैं तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इससे परिवहन लागत में कमी आएगी और कई उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में राहत मिल सकती है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, लैपटॉप, चिकित्सा उपकरण और अन्य आयातित वस्तुओं की लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है। मजबूत रुपया आयात को सस्ता बनाता है, जिससे कंपनियों का खर्च घटता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल एक दिन की मजबूती से कीमतों में तुरंत कोई बदलाव नहीं आएगा। इसके लिए रुपये को लंबे समय तक स्थिर और मजबूत बने रहना होगा।
क्या अब खत्म हो जाएगी रुपये की कमजोरी?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अभी इस निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी कि रुपये की गिरावट पूरी तरह खत्म हो गई है।
रुपये की दिशा अगले कुछ हफ्तों में कई कारकों पर निर्भर करेगी—
- अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का परिणाम
- होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति
- कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें
- विदेशी निवेशकों का रुख
- अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति
- भारतीय रिजर्व बैंक की रणनीति
अगर पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है और तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आती हैं तो रुपये को और मजबूती मिल सकती है। लेकिन यदि तनाव दोबारा बढ़ता है तो डॉलर की मांग फिर बढ़ सकती है और रुपया दोबारा दबाव में आ सकता है।
NewsJagran Analysis
रुपये की 14 पैसे की मजबूती केवल एक मुद्रा बाजार की खबर नहीं है। यह संकेत है कि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएं भारत की अर्थव्यवस्था को कितनी गहराई से प्रभावित करती हैं। पिछले तीन महीनों में तेल की महंगाई और विदेशी निवेशकों की निकासी ने रुपये पर भारी दबाव बनाया था। यदि अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम स्थायी रूप लेता है और होर्मुज जलडमरूमध्य सामान्य रूप से संचालित होता रहता है, तो भारत को ऊर्जा आयात बिल में राहत मिल सकती है। इससे रुपये को मजबूती, महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिल सकता है।
फिलहाल बाजार की नजर पश्चिम एशिया की घटनाओं और कच्चे तेल की कीमतों पर बनी रहेगी। आने वाले दिनों में यही तय करेगा कि रुपये की यह मजबूती एक अस्थायी राहत है या फिर लंबे समय बाद वापसी की शुरुआत।
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