भारत में बढ़ती महंगाई, कमजोर होता रुपया और पश्चिम एशिया संकट के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अगली मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक बेहद अहम मानी जा रही है। इसी बीच RBI के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव (D. Subbarao) का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा है कि सरकार और RBI को रुपये को कृत्रिम रूप से बचाने की कोशिश कम करनी चाहिए और बाजार के हिसाब से उसे एडजस्ट होने देना चाहिए।
सुब्बाराव का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव में है और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने भारत की आर्थिक चिंता बढ़ा दी है। अगले महीने 3 जून से 5 जून के बीच होने वाली MPC बैठक में महंगाई, ब्याज दर और रुपये की कमजोरी सबसे बड़ा मुद्दा रहने वाले हैं।
रुपये को लेकर क्या बोले डी सुब्बाराव?
पूर्व RBI गवर्नर डी सुब्बाराव ने कहा कि रुपया अगर कमजोर हो रहा है तो उसे पूरी तरह रोकने की कोशिश सही रणनीति नहीं हो सकती। उनके अनुसार, कमजोर रुपया कई बार बाहरी आर्थिक झटकों को सोखने का काम करता है। इसे अर्थशास्त्र की भाषा में “Natural Shock Absorber” कहा जाता है। उन्होंने साफ कहा कि अगर भारत के बाहरी संतुलन यानी Current Account और विदेशी मुद्रा दबाव में हैं, तो रुपया बाजार के अनुसार खुद को एडजस्ट करेगा। ऐसे में अत्यधिक डॉलर बेचकर रुपये को बचाने की कोशिश लंबे समय में नुकसानदायक हो सकती है।
सुब्बाराव ने यह भी कहा कि असली खतरा सिर्फ रुपये की कमजोरी नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे का टूटना होता है। अगर निवेशकों, कंपनियों और आम लोगों को लगने लगे कि रुपया लगातार कमजोर होगा, तो वे डॉलर खरीदना शुरू कर देते हैं। इससे रुपये पर और ज्यादा दबाव बनता है।
क्यों दबाव में है भारतीय रुपया?
भारतीय रुपये पर इस समय कई बड़े दबाव एक साथ काम कर रहे हैं।
1. कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज उछाल आया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
2. विदेशी निवेशकों की बिकवाली
वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। इससे डॉलर की डिमांड बढ़ रही है।
3. अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें
अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरें बनाए रखने से डॉलर मजबूत बना हुआ है। इसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ रहा है।
4. बढ़ता आयात बिल
तेल, गैस और इलेक्ट्रॉनिक सामान के आयात पर भारत का खर्च बढ़ा है। इससे व्यापार घाटा और Current Account Deficit बढ़ने का खतरा पैदा हो रहा है।
रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच चुका है रुपया
भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक दबावों के कारण रुपया हाल के महीनों में लगातार कमजोर हुआ है। इसी महीने रुपया डॉलर के मुकाबले 97.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद से रुपया करीब 5% टूट चुका है। साल 2026 की शुरुआत से अब तक रुपये में 6% से अधिक गिरावट आई है। पिछले एक साल में रुपया करीब 10% कमजोर हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है।
RBI के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
डी सुब्बाराव के अनुसार, RBI इस समय तीन बड़े लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
1. आर्थिक विकास बचाना
भारत की GDP ग्रोथ पहले ही वैश्विक सुस्ती और महंगे आयात के दबाव में है। ऐसे में ब्याज दरें बढ़ाने से आर्थिक गतिविधियां धीमी हो सकती हैं।
2. महंगाई को नियंत्रित रखना
अगर रुपया कमजोर होता है तो आयात महंगा हो जाता है। इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल, गैस, खाद्य तेल और अन्य जरूरी चीजों की कीमतों पर पड़ता है।
3. करेंसी स्थिरता बनाए रखना
RBI नहीं चाहता कि रुपये में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव हो क्योंकि इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि अगली MPC बैठक बेहद संवेदनशील मानी जा रही है।
क्या RBI ब्याज दर बढ़ा सकता है?
फिलहाल बाजार में इस बात पर बहस चल रही है कि RBI अगली बैठक में क्या कदम उठाएगा। पिछले साल से अब तक RBI आर्थिक विकास को सहारा देने के लिए रेपो रेट में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती कर चुका है। फिलहाल रेपो रेट 5.25% पर है। लेकिन अब चुनौती बदल चुकी है। अगर RBI ब्याज दरें और घटाता है रुपया और कमजोर हो सकता है, महंगाई बढ़ सकती है, विदेशी निवेशक पैसा निकाल सकते हैं
वहीं अगर ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं लोन महंगे हो जाएंगे, कंपनियों की लागत बढ़ेगी, GDP ग्रोथ प्रभावित हो सकती है यानी RBI के सामने “Growth vs Inflation vs Currency Stability” की तिहरी चुनौती खड़ी है।
कमजोर रुपये का आम आदमी पर क्या असर?
रुपये की गिरावट सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहती। इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
पेट्रोल-डीजल महंगा
भारत तेल आयात करता है, इसलिए कमजोर रुपया ईंधन को महंगा बनाता है।
महंगाई बढ़ती है
इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, लैपटॉप, खाद्य तेल और दवाइयों तक की कीमतें बढ़ सकती हैं।
विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी
डॉलर मजबूत होने से विदेश में पढ़ाई और यात्रा का खर्च बढ़ जाता है।
शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव
विदेशी निवेशक पैसा निकालते हैं तो बाजार में गिरावट आ सकती है।
क्या कमजोर रुपया हमेशा बुरा होता है?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार कमजोर रुपया पूरी तरह नकारात्मक नहीं होता। इसके कुछ फायदे भी होते हैं भारतीय एक्सपोर्ट सस्ते हो जाते हैं IT और फार्मा कंपनियों की कमाई बढ़ सकती हैविदेशी पर्यटकों के लिए भारत सस्ता पड़ता है लेकिन अगर गिरावट बहुत तेज हो जाए, तो नुकसान फायदे से ज्यादा हो सकता है।
आने वाले दिनों में क्या देखना होगा?
अगले कुछ हफ्तों में तीन चीजें सबसे अहम रहेंगी पश्चिम एशिया में तनाव कितना बढ़ता है, कच्चे तेल की कीमतें कहां तक जाती हैं, RBI की MPC बैठक में क्या फैसला लिया जाता है. अगर तेल कीमतों में राहत नहीं मिली, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।
निष्कर्ष
पूर्व RBI गवर्नर डी सुब्बाराव का बयान ऐसे समय आया है जब भारतीय अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। उनका मानना है कि रुपये को कृत्रिम तरीके से बचाने के बजाय बाजार के हिसाब से चलने देना ज्यादा व्यावहारिक रणनीति हो सकती है। हालांकि कमजोर रुपया महंगाई और आयात लागत बढ़ा सकता है, लेकिन यह बाहरी झटकों को सोखने का काम भी करता है। अब सबकी नजर RBI की अगली MPC बैठक पर टिकी है, जहां यह तय होगा कि केंद्रीय बैंक विकास को प्राथमिकता देता है या महंगाई और मुद्रा स्थिरता को।
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