Lakhpati Didi Dilmati Success Story: छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले की रहने वाली दिलमति ने यह साबित कर दिया है कि सही योजना, मेहनत और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर ग्रामीण महिलाएं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं। कभी पारंपरिक खेती से परिवार का गुजारा करने वाली दिलमति आज सफल सुअर पालन व्यवसाय के जरिए हर साल ₹7 से ₹8 लाख तक की कमाई कर रही हैं। उनकी सफलता ने न केवल उनके परिवार की तस्वीर बदली है, बल्कि पूरे गांव की महिलाओं के लिए भी नई प्रेरणा बन गई है।
खेती से गुजर-बसर, फिर आया जिंदगी का बड़ा मोड़
#WATCH | Balrampur, Chhattisgarh: On earning a livelihood through pig farming and agriculture, Lakhpati Didi, Dilmati, says, “Before joining the group, my situation was very bad. But once I joined and started saving, attending meetings, a few of us women would get together and… pic.twitter.com/Dv9ML6wRw2
— ANI (@ANI) July 17, 2026 छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बलरामपुर जिले के लादुवा गांव की रहने वाली दिलमति पहले अपने परिवार के साथ पारंपरिक खेती पर निर्भर थीं। सीमित खेती और कम आय के कारण परिवार को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था। खेती से मिलने वाली आमदनी घर का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
उनकी जिंदगी में बदलाव तब आया जब वे ‘मां दुर्गा महिला स्वयं सहायता समूह (SHG)’ से जुड़ीं। यहां उन्हें सरकारी आजीविका योजनाओं, बैंक लोन और स्वरोजगार के अवसरों की जानकारी मिली। इसी दौरान उन्होंने सुअर पालन व्यवसाय शुरू करने का फैसला किया, जिसने उनकी किस्मत बदल दी।
₹1 लाख के लोन से शुरू किया कारोबार
दिलमति ने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से ₹1 लाख का लोन लिया। इस पूंजी से उन्होंने पड़ोसी राज्य झारखंड से 10 सुअर खरीदे और छोटे स्तर पर सुअर पालन शुरू किया।
शुरुआत में कई चुनौतियां आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उचित देखभाल, पशु चिकित्सा सलाह और आधुनिक तरीकों को अपनाकर उन्होंने धीरे-धीरे अपने व्यवसाय का विस्तार किया।
आज उनके पास 9 मादा सुअर हैं। प्रत्येक मादा सुअर एक बार में 9 से 10 पिगलेट्स (बच्चों) को जन्म देती है और एक पिगलेट की बाजार में कीमत करीब ₹5,000 तक मिल जाती है। इसी वजह से उनका व्यवसाय लगातार बढ़ता गया और आज उनकी सालाना आय ₹7 लाख से ₹8 लाख तक पहुंच चुकी है।
कमाई को दोबारा निवेश कर बढ़ाया कारोबार
#WATCH | Balrampur, Chhattisgarh: On earning a livelihood through pig farming and agriculture, Lakhpati Didi, Dilmati, says, “Before joining the group, my situation was very bad. But once I joined and started saving, attending meetings, a few of us women would get together and… pic.twitter.com/60A51F87Hz
— ANI MP/CG/Rajasthan (@ANI_MP_CG_RJ) July 17, 2026 दिलमति ने सिर्फ कमाई करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि अपनी आय को नए व्यवसायों और सुविधाओं में निवेश किया।
उन्होंने अपनी कमाई से कई महत्वपूर्ण काम किए—
- सुअरों के लिए पक्का और आधुनिक शेड बनवाया।
- धान और मक्का की थ्रेशिंग (मिसाई) मशीन खरीदी।
- खेतों में ड्रिप इरिगेशन तकनीक अपनाई।
- जैविक सब्जियों की खेती शुरू की।
- खेती और पशुपालन दोनों से नियमित आय का मजबूत मॉडल तैयार किया।
इस रणनीति ने उनके परिवार की आय के कई स्रोत तैयार कर दिए, जिससे आर्थिक सुरक्षा भी बढ़ी।
गांव की दूसरी महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा
दिलमति की सफलता का असर पूरे लादुवा गांव में दिखाई देने लगा है। उनकी कामयाबी से प्रेरित होकर करीब 10 से 15 परिवारों ने भी सुअर पालन व्यवसाय शुरू किया है।
अब दिलमति गांव की महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने, नियमित बचत करने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और स्वरोजगार शुरू करने के लिए प्रेरित करती हैं। वे बताती हैं कि यदि सही योजना और मेहनत के साथ काम किया जाए तो गांव में रहकर भी अच्छी आय अर्जित की जा सकती है।
प्रशासन भी करेगा आजीविका मॉडल का विस्तार
दिलमति की सफलता को देखते हुए बलरामपुर जिला प्रशासन भी ऐसे मॉडल को बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी कर रहा है।
जिला कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी के अनुसार प्रशासन अब ‘गोट क्लस्टर प्रोजेक्ट’ पर काम कर रहा है। इस योजना के तहत ग्रामीण महिलाओं को उन्नत नस्ल की बकरियां उपलब्ध कराई जाएंगी ताकि अधिक से अधिक महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें और “लखपति दीदी” बनने का सपना पूरा कर सकें।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए मिसाल बनी दिलमति
दिलमति की कहानी यह बताती है कि स्वयं सहायता समूह, सरकारी योजनाएं और सही मार्गदर्शन ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति बदलने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने ₹1 लाख के छोटे से लोन को अवसर में बदलकर न केवल अपना व्यवसाय खड़ा किया, बल्कि अपने गांव में रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई मिसाल भी कायम की।
यदि इसी तरह अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार तक पहुंच मिले, तो देश के हजारों गांवों में ऐसी कई नई “लखपति दीदी” तैयार हो सकती हैं।


