Monetary Policy: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति को लेकर बड़ा संकेत सामने आया है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के एक्सटर्नल मेंबर सौगत भट्टाचार्य ने कहा है कि अगर महंगाई का दबाव लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार कर सकता है। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि अगला फैसला आने वाले महंगाई और आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
महंगाई बढ़ी तो सख्त हो सकती है RBI की पॉलिसी
सौगत भट्टाचार्य के मुताबिक, मौद्रिक नीति में अगला कदम क्या होगा, इसका संकेत MPC के हालिया महंगाई अनुमान और पॉलिसी स्टेटमेंट से मिल चुका है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ब्याज दरों में बदलाव की जरूरत कब पड़ेगी, यह अभी तय नहीं है।
उनका कहना है कि अगर कीमतों पर दबाव लगातार बढ़ता है तो RBI के सामने ब्याज दरों को बढ़ाने का विकल्प खुला रहेगा। वहीं, अगर महंगाई में नरमी आती है तो केंद्रीय बैंक मौजूदा स्थिति को बनाए रखते हुए आगे के आंकड़ों का इंतजार कर सकता है।
5% औसत महंगाई बनी तो बढ़ सकती है चिंता
भट्टाचार्य ने महंगाई के जोखिम को लेकर महत्वपूर्ण बात कही है। उनके अनुसार, अगर वित्त वर्ष 2026-27 में औसत महंगाई करीब 5% के आसपास बनी रहती है, तो मौजूदा 5.25% पॉलिसी रेट महंगाई को नियंत्रित करने के लिहाज से अपेक्षाकृत नरम यानी अकॉमोडेटिव साबित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में नीति निर्माताओं के सामने समय रहते कदम उठाने की चुनौती होगी। अगर महंगाई के खिलाफ कार्रवाई में देरी होती है, तो बाद में इसे नियंत्रित करने के लिए ज्यादा सख्त मौद्रिक कदम उठाने पड़ सकते हैं।
खाने-पीने की चीजों से लेकर कोर महंगाई तक पर नजर
MPC के लिए महंगाई का आकलन सिर्फ किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। खाद्य पदार्थों, ईंधन और कोर कंपोनेंट्स से आने वाले कीमतों के दबाव को भी देखा जाता है। हालांकि, भट्टाचार्य ने संकेत दिया कि MPC के लिए हेडलाइन महंगाई एक महत्वपूर्ण पैमाना बनी हुई है।
हालिया आंकड़ों में इनपुट लागत और आउटपुट कीमतों के बीच संबंध भी चिंता का विषय बन रहा है। कंपनियों की लागत बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंच सकता है। मजबूत कॉरपोरेट मार्जिन और क्रेडिट ग्रोथ भी इस पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।
कंपनियां ग्राहकों पर डाल सकती हैं बढ़ती लागत का बोझ
भट्टाचार्य ने यह भी संकेत दिया कि कंपनियां बढ़ती इनपुट लागत का बोझ धीरे-धीरे ग्राहकों पर डाल सकती हैं। अगर ऐसा व्यापक स्तर पर होता है, तो इसका असर खुदरा कीमतों पर दिखाई दे सकता है।
यही वजह है कि RBI के लिए आने वाले महीनों के महंगाई आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण होंगे। अगर लागत का दबाव लगातार अंतिम उत्पादों की कीमतों में दिखाई देता है, तो महंगाई के मोर्चे पर जोखिम बढ़ सकता है।
सिर्फ रियल इंटरेस्ट रेट से तय नहीं होती पॉलिसी
सौगत भट्टाचार्य ने यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक ब्याज दर यानी Real Interest Rate मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण संकेतक जरूर है, लेकिन यह ब्याज दर तय करने का कोई निश्चित फॉर्मूला या बेंचमार्क नहीं है।
MPC ब्याज दरों पर फैसला लेते समय महंगाई, आर्थिक विकास, क्रेडिट ग्रोथ और अन्य घरेलू आर्थिक परिस्थितियों समेत कई पहलुओं का आकलन करती है। इसलिए सिर्फ एक आर्थिक संकेतक के आधार पर ब्याज दरों का फैसला नहीं किया जाता।
US Fed के फैसलों पर भी रहती है नजर
RBI की मौद्रिक नीति सिर्फ घरेलू परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती। वैश्विक स्तर पर होने वाले बदलावों को भी नीति निर्धारण में ध्यान में रखा जाता है। इनमें अमेरिकी फेडरल रिजर्व और दुनिया के दूसरे प्रमुख केंद्रीय बैंकों के ब्याज दर संबंधी फैसले महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, भट्टाचार्य ने जोर दिया कि भारत की मौद्रिक नीति के लिए घरेलू महंगाई और आर्थिक विकास सबसे अहम कारक बने हुए हैं। वैश्विक घटनाओं का असर जरूर देखा जाता है, लेकिन अंतिम फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
अगली MPC बैठक में क्या होगा?
अब बाजार की नजर अगली MPC बैठक और उससे पहले जारी होने वाले महंगाई के आंकड़ों पर रहेगी। अगर महंगाई का दबाव और बढ़ता है और यह लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो RBI के सामने ब्याज दरों में बढ़ोतरी का विकल्प मजबूत हो सकता है।
वहीं, अगर महंगाई में नरमी आती है और आर्थिक विकास पर भी दबाव दिखाई देता है, तो RBI सख्त कदम उठाने से पहले इंतजार कर सकता है। ऐसे में आने वाले महंगाई, ग्रोथ और अन्य आर्थिक आंकड़े RBI की अगली रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
निष्कर्ष: सौगत भट्टाचार्य का बयान इस बात का संकेत देता है कि RBI महंगाई को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही के पक्ष में नहीं है। मौजूदा 5.25% पॉलिसी रेट के बावजूद अगर महंगाई का दबाव बढ़ता है, तो ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, अगला फैसला पूरी तरह आने वाले आर्थिक आंकड़ों और महंगाई के रुख पर निर्भर करेगा।


