भारतीय रिजर्व बैंक यानी Reserve Bank of India ने वित्त वर्ष 2025-26 में रुपये को गिरावट से बचाने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में रिकॉर्ड स्तर पर दखल दिया। लेकिन इस पूरी कवायद का एक बड़ा फायदा खुद केंद्रीय बैंक को भी हुआ। आरबीआई ने इस दौरान कुल 53.1 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की और इससे अनुमानित तौर पर करीब ₹50,000 करोड़ का फायदा हुआ।
डॉलर की इस भारी बिकवाली ने सिर्फ रुपये को सहारा नहीं दिया, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ती घबराहट को भी काफी हद तक नियंत्रित किया। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिका की ब्याज दरों और पश्चिम एशिया के तनाव का असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर साफ दिखाई दे रहा था।
क्यों करनी पड़ी डॉलर की भारी बिक्री?
वित्त वर्ष 2025-26 भारतीय मुद्रा के लिए काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा। एक तरफ अमेरिकी डॉलर लगातार मजबूत हो रहा था, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर दबाव बढ़ाया।
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। जब तेल महंगा होता है तो कंपनियों को ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है।
इसी दबाव को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई ने बाजार में अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचे। जब केंद्रीय बैंक डॉलर बेचता है तो बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ती है और रुपये पर दबाव कम होता है।
RBI को कैसे हुआ मुनाफा?
बैंकरों और बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक आरबीआई ने जिन डॉलर को FY26 में बेचा, उनमें से काफी हिस्सा उस समय खरीदा गया था जब रुपया मजबूत था और डॉलर सस्ता था।
अब जब डॉलर महंगा हो चुका है, तो पुराने भंडार से डॉलर बेचने पर केंद्रीय बैंक को बड़ा लाभ हुआ। अनुमान है कि इस प्रक्रिया में करीब 10% तक का लाभ मिला। यही वजह है कि केवल विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप से ही आरबीआई की आय में लगभग ₹50,000 करोड़ का योगदान हुआ।
यह स्थिति किसी निवेशक के उस मुनाफे जैसी है, जब वह कम कीमत पर खरीदी गई संपत्ति को बाद में ऊंचे दाम पर बेचता है।
सोने ने भी संभाली RBI की बैलेंस शीट
FY26 में डॉलर बिक्री से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव जरूर पड़ा, लेकिन इसी दौरान सोने की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने राहत दी। आरबीआई के विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी मात्रा में गोल्ड रिजर्व भी शामिल है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें बढ़ने से केंद्रीय बैंक की कुल संपत्ति वैल्यू मजबूत बनी रही। यही कारण है कि डॉलर बिक्री के बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार पर बहुत बड़ा नकारात्मक असर नहीं दिखाई दिया।
साल के आखिरी महीनों में आक्रामक हुआ RBI
वित्त वर्ष 2025-26 के अंतिम महीनों में आरबीआई का रुख काफी आक्रामक नजर आया। मार्च 2026 में केंद्रीय बैंक ने बाजार में 9.8 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की। इसका उद्देश्य रुपये की तेजी से हो रही कमजोरी को रोकना था।
दिलचस्प बात यह रही कि फरवरी 2026 में तस्वीर बिल्कुल उलट थी। उस दौरान आरबीआई ने बाजार से 7.4 अरब डॉलर की शुद्ध खरीद की थी। इससे साफ है कि केंद्रीय बैंक लगातार बाजार की परिस्थितियों के हिसाब से अपनी रणनीति बदल रहा था।
पिछले दो वर्षों के बड़े रिकॉर्ड
विदेशी मुद्रा बाजार में आरबीआई का सबसे बड़ा हस्तक्षेप नवंबर 2024 में देखने को मिला था। उस समय केंद्रीय बैंक ने रिकॉर्ड 20.2 अरब डॉलर बाजार में झोंक दिए थे। वहीं FY26 में सबसे ज्यादा डॉलर बिक्री अक्टूबर 2025 में हुई, जब 11.9 अरब डॉलर बेचे गए।
इसके उलट मार्च 2025 में आरबीआई ने डॉलर जमा करने में सबसे ज्यादा रुचि दिखाई थी और रिकॉर्ड 14.7 अरब डॉलर की शुद्ध खरीद की गई थी। इन आंकड़ों से साफ है कि आरबीआई केवल रुपये को बचाने के लिए डॉलर नहीं बेच रहा, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय रणनीतिक प्रबंधन भी कर रहा है।
RBI के कदम से रुपये को मिला सहारा
आरबीआई के हस्तक्षेप और 5 अरब डॉलर के स्वैप ऐलान का असर रुपये पर साफ दिखाई दिया। शुक्रवार को रुपया लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में मजबूत होकर 95.69 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले गुरुवार को भी रुपये में 62 पैसे की मजबूती आई थी। यानी दो दिनों में भारतीय मुद्रा ने बड़ी रिकवरी दिखाई।
यह मजबूती ऐसे समय आई जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही थीं और अमेरिका-ईरान वार्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी। आमतौर पर ऐसे माहौल में उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है। लेकिन आरबीआई की सक्रिय रणनीति ने भारतीय मुद्रा को स्थिरता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
रुपये की मजबूती का असर सीधे आम लोगों और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अगर रुपया बहुत तेजी से कमजोर होता है तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, आयातित सामान की कीमत बढ़ सकती है, महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है, विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी हो जाती है वहीं मजबूत रुपया इन दबावों को कुछ हद तक कम करता है। हालांकि बहुत ज्यादा मजबूत रुपया निर्यातकों के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है क्योंकि भारतीय सामान विदेशी बाजारों में महंगा पड़ने लगता है।
आगे क्या रहेगा RBI का फोकस?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में भी आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय बना रह सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है या अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को ऊंचा बनाए रखता है, तो डॉलर और मजबूत हो सकता है। ऐसी स्थिति में भारतीय मुद्रा पर फिर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि भारत का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और आरबीआई की सक्रिय रणनीति फिलहाल रुपये के लिए बड़ी सुरक्षा दीवार साबित हो रही है।
Also Read:


