Ravi Kumar Diwakar: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में फास्ट-ट्रैक कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच 10 मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। अब हत्या समेत गंभीर अपराधों से जुड़े करीब 100 मामले उनकी अदालत से दूसरी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिए गए हैं।
सरकारी वकील ने समाचार एजेंसी PTI को बताया कि जिन मामलों में मौत की सजा या उम्रकैद जैसी सजा की संभावना है, उन्हें जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हटाकर डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में भेजा गया है। डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी के मुताबिक, वकीलों और मुकदमे से जुड़े लोगों के बीच यह आशंका थी कि इन मामलों में भी मौत की सजा सुनाई जा सकती है।
कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?
रवि कुमार दिवाकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ के रहने वाले हैं और उनकी उम्र करीब 46 वर्ष बताई गई है। उनके पास BCom और LLM की डिग्री है। उन्होंने वर्ष 2009 में आजमगढ़ में एडिशनल सिविल जज के तौर पर न्यायिक सेवा की शुरुआत की थी।
इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई जिलों में न्यायिक जिम्मेदारियां संभालीं। उनके कार्यक्षेत्र में आजमगढ़, सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी और बरेली जैसे जिले शामिल रहे हैं। नवंबर 2025 से वह मुजफ्फरनगर में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के तौर पर तैनात हैं।
2022 में ज्ञानवापी मामले से आए थे सुर्खियों में
रवि कुमार दिवाकर पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2022 में चर्चा में आए थे। उस समय वह वाराणसी में सिविल जज के पद पर तैनात थे। उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश दिया था।
इस आदेश के बाद ज्ञानवापी परिसर से जुड़ा मामला देश के सबसे चर्चित कानूनी और धार्मिक विवादों में शामिल हो गया। इसके बाद जज दिवाकर की प्रोफाइल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई थी।
चार महीनों में 10 मामलों में 22 मौत की सजा
मुजफ्फरनगर में जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच हत्या, अपहरण और डकैती जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े 10 मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। कई मामलों में अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए उन्हें ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी का माना।
इनमें से कुछ प्रमुख मामलों में सुनाई गई सजा इस प्रकार है:
वकील की हत्या के मामले में 3 को मौत की सजा
6 अप्रैल को 2019 में वकील मोहम्मद समीर के अपहरण और हत्या के मामले में तीन दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। यह मामला 45 लाख रुपये के पैसों के विवाद से जुड़ा था।
महिला और उसके तीन बेटों को फांसी की सजा
28 अप्रैल को वर्ष 2019 के एक हत्या मामले में एक महिला और उसके तीन बेटों को मौत की सजा सुनाई गई।
15 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में सजा
30 मई को 50 वर्षीय रहीस को वर्ष 2011 में एक महिला और उसके छह वर्षीय बेटे की हत्या के मामले में मौत की सजा दी गई। अदालत ने इस अपराध को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ माना।
दो आरोपियों को मौत की सजा
20 जून को राजेंद्र सैनी की हत्या के मामले में गजेंद्र और रामकिरण को मौत की सजा सुनाई गई।
होमगार्ड की हत्या के मामले में फांसी
2 जुलाई को दीपक को वर्ष 2020 में ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड रतिराम की चाकू मारकर हत्या करने के मामले में मौत की सजा सुनाई गई। अदालत ने मामले को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी का माना।
पूर्व ग्राम प्रधान और साथी को मौत की सजा
6 जुलाई को पूर्व ग्राम प्रधान प्रमोद और उनके साथी सहदेव को वर्ष 2010 में राजबीर सिंह की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई। कोर्ट ने इसे भी ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामला माना।
किसान की हत्या के मामले में 4 को फांसी
17 जुलाई को शामली में वर्ष 2011 में लूट की कोशिश के दौरान किसान राज सिंह की हत्या के मामले में चार लोगों को मौत की सजा सुनाई गई।
1999 के अपहरण और हत्या मामले में मौत की सजा
12 अगस्त को शाहनवाज को वर्ष 1999 में लकड़ी व्यापारी सलीम के अपहरण और हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई। आरोप था कि सलीम को 5 लाख रुपये की फिरौती के लिए अगवा किया गया था।
2014 की हत्या के मामले में 4 दोषियों को मौत की सजा
13 अगस्त को शामली में पुरानी रंजिश से जुड़ी गोलीबारी में पवन कुमार की हत्या के मामले में रामवीर, राजीव, राहुल और हरेंद्र कुमार को मौत की सजा सुनाई गई।
अब करीब 100 मामले दूसरी अदालत में क्यों गए?
मुजफ्फरनगर में रवि कुमार दिवाकर की अदालत में हत्या समेत गंभीर अपराधों के करीब 100 मामले लंबित थे। इनमें ऐसे मामले भी शामिल थे जिनमें दोष साबित होने पर मौत की सजा या उम्रकैद हो सकती थी।
अब इन मामलों को डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में ट्रांसफर किया गया है। डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने कहा कि वकीलों और मुकदमे से जुड़े लोगों के बीच इस बात की आशंका थी कि जज दिवाकर की अदालत इन मामलों में भी मौत की सजा सुना सकती है।
हालांकि, किसी मामले में मौत की सजा दी जाएगी या नहीं, यह उसके तथ्यों, सबूतों और लागू कानून के आधार पर अदालत के निर्णय पर निर्भर करता है। केवल केस ट्रांसफर होने का मतलब यह नहीं है कि दूसरी अदालत में भी किसी आरोपी को निश्चित रूप से कोई खास सजा मिलेगी।
जज दिवाकर का न्यायिक सफर क्यों खास है?
रवि कुमार दिवाकर का न्यायिक करियर करीब 17 वर्षों का है। वर्ष 2009 में आजमगढ़ से शुरुआत करने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में न्यायिक पदों पर काम किया। वर्ष 2022 में ज्ञानवापी सर्वे के आदेश ने उन्हें राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया था।
अब मुजफ्फरनगर में कम समय के भीतर बड़ी संख्या में मौत की सजा सुनाए जाने के कारण वह फिर सुर्खियों में हैं। हालांकि, मौत की सजा के मामलों में अंतिम फैसला केवल ट्रायल कोर्ट के आदेश से नहीं होता। ऐसे मामलों में कानून के तहत आगे की न्यायिक प्रक्रिया और उच्च अदालतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।


