नई दिल्ली। शादी के बाद पति-पत्नी के बीच पैसों को लेकर होने वाली बहस आम बात है। कभी एक पार्टनर को लगता है कि दूसरा जरूरत से ज्यादा खर्च कर रहा है, तो कभी बचत और निवेश को लेकर दोनों की राय अलग होती है। घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, घूमने-फिरने की योजना और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा जैसे मुद्दे भी कई बार तनाव की वजह बन जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पति-पत्नी मिलकर पैसे कैसे मैनेज करें, ताकि बचत भी बढ़े और रिश्ते में पैसों को लेकर बार-बार बहस भी न हो?
मान लीजिए राहुल और रोशनी की हाल ही में शादी हुई है। राहुल को बाहर खाना खाने और शॉपिंग करने का शौक है, जबकि रोशनी हर महीने अपनी सैलरी का एक हिस्सा बचाकर रखना चाहती है। दोनों की प्राथमिकताएं अलग हैं, इसलिए अक्सर उनके बीच बहस हो जाती है। ऐसी स्थिति में किसी एक को गलत ठहराने के बजाय दोनों को अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं पर खुलकर बात करनी चाहिए।
वित्तीय प्रबंधन का मतलब सिर्फ खर्चों पर रोक लगाना नहीं है, बल्कि अपनी कमाई, जरूरतों, इच्छाओं और भविष्य के लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना भी है। आइए जानते हैं ऐसे चार तरीके, जिनकी मदद से कपल्स अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकते हैं।
1. आपका, मेरा और हमारा फाइनेंस का फॉर्मूला अपनाएं
शादी के बाद जरूरी नहीं कि पति-पत्नी अपनी पूरी सैलरी एक ही खाते में जमा करें। दोनों अपनी सुविधा, कमाई और आपसी सहमति के अनुसार पैसों का प्रबंधन कर सकते हैं। इसके लिए तीन हिस्सों में वित्तीय व्यवस्था बनाना उपयोगी हो सकता है।
पहला हिस्सा साझा खर्चों के लिए रखें। इसमें घर का किराया या होम लोन की किस्त, राशन, बिजली-पानी के बिल, इंटरनेट, बच्चों की फीस और दूसरे जरूरी खर्च शामिल हो सकते हैं। दोनों पार्टनर अपनी कमाई के अनुपात में इस खाते में पैसे जमा कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक पार्टनर की आय दूसरे से अधिक है, तो दोनों पर बराबर रकम देने का दबाव बनाने के बजाय आय के अनुपात में योगदान तय किया जा सकता है।
दूसरा हिस्सा व्यक्तिगत खर्चों के लिए रखें। इससे दोनों को अपने शौक, कपड़ों, दोस्तों के साथ बाहर जाने या पसंद की चीजें खरीदने की स्वतंत्रता मिलती है। हर छोटे खर्च के लिए पार्टनर से अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ती, बशर्ते दोनों पहले से तय बजट का पालन करें।
तीसरा हिस्सा साझा लक्ष्यों के लिए रखें। इसमें इमरजेंसी फंड, छुट्टियों, घर खरीदने, बच्चों की शिक्षा और रिटायरमेंट के लिए बचत शामिल हो सकती है। इन लक्ष्यों के लिए अलग बचत खाता या उपयुक्त निवेश विकल्प चुना जा सकता है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि दोनों को आर्थिक जिम्मेदारियों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलती है।
2. 50/30/20 नियम से व्यवस्थित करें अपना बजट
अगर महीने के अंत तक यह समझ नहीं आता कि सैलरी कहां खर्च हो गई, तो 50/30/20 नियम से शुरुआत की जा सकती है। इस तरीके में हर महीने मिलने वाली कुल टेक-होम सैलरी को तीन हिस्सों में बांटने का सुझाव दिया जाता है।
जरूरतों पर 50 फीसदी खर्च: इसमें घर का किराया, राशन, बिजली-पानी के बिल, जरूरी यात्रा, स्वास्थ्य संबंधी खर्च और कर्ज की न्यूनतम किस्तें शामिल हो सकती हैं।
इच्छाओं पर 30 फीसदी खर्च: इसमें बाहर खाना, मनोरंजन, ऑनलाइन सब्सक्रिप्शन, शॉपिंग, घूमने-फिरने और दूसरे गैर-जरूरी खर्चों को रखा जा सकता है।
बचत और वित्तीय लक्ष्यों के लिए 20 फीसदी: इस हिस्से का इस्तेमाल इमरजेंसी फंड बनाने, भविष्य के लिए निवेश करने और महंगे कर्ज को कम करने में किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, अगर पति-पत्नी की संयुक्त मासिक टेक-होम सैलरी 80,000 रुपये है, तो इस नियम के मुताबिक 40,000 रुपये जरूरतों, 24,000 रुपये इच्छाओं और 16,000 रुपये बचत व वित्तीय लक्ष्यों के लिए रखे जा सकते हैं।
हालांकि, यह नियम हर परिवार के लिए एक जैसा काम नहीं करेगा। बड़े शहरों में रहने वाले परिवारों का किराया और जरूरी खर्च अधिक हो सकता है। अगर घर का खर्च ही आय का 60 फीसदी है, तो बजट को वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार बदलना बेहतर होगा। जरूरी बात यह है कि दोनों मिलकर खर्चों की समीक्षा करें और बचत के लिए नियमित रकम तय करें।
3. इमरजेंसी फंड बनाएं, अचानक आने वाले खर्चों से बचें
अचानक नौकरी छूटना, मेडिकल इमरजेंसी, वाहन की मरम्मत या घर में कोई जरूरी काम निकल आना बजट बिगाड़ सकता है। ऐसी स्थिति में अगर बचत नहीं है, तो परिवार को क्रेडिट कार्ड या महंगे पर्सनल लोन का सहारा लेना पड़ सकता है।
इस समस्या से बचने के लिए पति-पत्नी को धीरे-धीरे कम से कम तीन से छह महीने के जरूरी घरेलू खर्चों के बराबर इमरजेंसी फंड बनाने का लक्ष्य रखना चाहिए। यह रकम ऐसी जगह रखनी चाहिए, जहां जरूरत पड़ने पर उसे आसानी से निकाला जा सके और मूलधन पर अनावश्यक जोखिम न हो।
मान लीजिए आपके परिवार का जरूरी मासिक खर्च 35,000 रुपये है। ऐसे में तीन महीने के खर्च के हिसाब से 1,05,000 रुपये और छह महीने के खर्च के हिसाब से 2,10,000 रुपये का इमरजेंसी फंड बनाने का लक्ष्य रखा जा सकता है।
अगर इतनी बड़ी रकम एक साथ बचाना संभव नहीं है, तो हर महीने छोटी रकम से शुरुआत करें। उदाहरण के लिए, दोनों मिलकर हर महीने 5,000 रुपये अलग रखते हैं, तो एक साल में 60,000 रुपये जमा हो सकते हैं। इसके बाद आय बढ़ने या खर्च कम होने पर बचत की रकम बढ़ाई जा सकती है।
ध्यान रखें कि इमरजेंसी फंड का उद्देश्य अधिक रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि मुश्किल समय में आर्थिक सुरक्षा देना है। इसलिए इस रकम को ऐसे निवेश में रखने से बचें, जहां से जरूरत के समय पैसे निकालना मुश्किल हो या बाजार में गिरावट के कारण नुकसान उठाना पड़े।
4. ज्यादा ब्याज वाले कर्ज को चुकाने की बनाएं योजना
कई परिवार नियमित बचत तो करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ क्रेडिट कार्ड का बकाया या महंगे पर्सनल लोन की किस्तें भी चुकाते रहते हैं। ऐसे में ब्याज का खर्च उनकी आर्थिक प्रगति को धीमा कर सकता है।
अगर पति-पत्नी में से किसी पर ज्यादा ब्याज वाला कर्ज है, तो दोनों को मिलकर उसे चुकाने की योजना बनानी चाहिए। सबसे पहले सभी कर्जों की ब्याज दर, बकाया रकम और मासिक किस्तों की सूची तैयार करें। इसके बाद सभी कर्जों की न्यूनतम किस्तें समय पर चुकाते हुए अतिरिक्त रकम को सबसे ज्यादा ब्याज वाले कर्ज पर लगाने पर विचार करें।
उदाहरण के लिए, अगर क्रेडिट कार्ड पर बकाया रकम का ब्याज काफी अधिक है, तो अतिरिक्त भुगतान के लिए उसे प्राथमिकता देना फायदेमंद हो सकता है। इससे भविष्य में ब्याज के रूप में जाने वाली रकम कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, कर्ज चुकाने के लिए अपनी पूरी बचत खत्म कर देना भी उचित नहीं है। परिवार की जरूरतों और संभावित आपात स्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक छोटी नकदी सुरक्षा बनाए रखना जरूरी है। अगर कर्ज की शर्तें जटिल हैं या प्रीपेमेंट चार्ज लगता है, तो भुगतान से पहले संबंधित नियमों की जांच करें।
इसके साथ ही पति-पत्नी को नए कर्ज लेने से पहले यह तय करना चाहिए कि वह वास्तव में जरूरी है या सिर्फ तत्काल इच्छा पूरी करने के लिए लिया जा रहा है।
पैसों को लेकर बहस से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें
चार वित्तीय तरीकों के साथ कुछ छोटी आदतें भी पति-पत्नी के रिश्ते और बजट, दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं।
सबसे पहले, महीने में एक बार बैठकर घरेलू आय, खर्च और बचत की समीक्षा करें। इस बातचीत को किसी की गलती निकालने का जरिया न बनाएं, बल्कि अगले महीने की योजना बनाने का अवसर समझें।
दूसरा, बड़े खर्चों के लिए पहले से सहमति बनाएं। उदाहरण के लिए, दोनों तय कर सकते हैं कि एक निश्चित रकम से अधिक की खरीदारी करने से पहले आपस में चर्चा करेंगे। इससे अचानक होने वाले खर्चों को लेकर विवाद कम हो सकता है।
तीसरा, अपने वित्तीय लक्ष्य लिखकर रखें। अगले साल छुट्टी पर जाना, पांच साल में घर के लिए डाउन पेमेंट जुटाना या रिटायरमेंट के लिए निवेश करना जैसे लक्ष्य बचत को उद्देश्य देते हैं।
चौथा, अपनी तुलना दूसरे परिवारों से न करें। हर परिवार की आय, जिम्मेदारियां और प्राथमिकताएं अलग होती हैं। इसलिए ऐसा बजट बनाएं, जिसे दोनों लंबे समय तक आसानी से अपना सकें।
निष्कर्ष
पति-पत्नी के बीच पैसों को लेकर होने वाली अनबन को कम करने के लिए जरूरी है कि दोनों एक-दूसरे की आर्थिक सोच को समझें। अलग-अलग खाते रखने, 50/30/20 नियम से बजट बनाने, इमरजेंसी फंड तैयार करने और ज्यादा ब्याज वाले कर्ज को प्राथमिकता से चुकाने जैसे तरीके वित्तीय अनुशासन विकसित करने में मदद कर सकते हैं।
याद रखें, अमीर बनने का कोई रातोंरात फॉर्मूला नहीं है। नियमित बचत, सोच-समझकर खर्च और लंबे समय तक निवेश की आदत ही आर्थिक मजबूती की नींव बनाती है। जब पति-पत्नी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि एक टीम के रूप में अपने पैसों का प्रबंधन करते हैं, तो आर्थिक तनाव कम करने और भविष्य के लक्ष्यों को हासिल करने की संभावना बेहतर हो जाती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य वित्तीय जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी निवेश या कर्ज संबंधी निर्णय से पहले अपनी आर्थिक स्थिति, जोखिम क्षमता और संबंधित शर्तों का आकलन करें। जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें।


