नई दिल्ली: मध्य पूर्व में हालिया भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी थीं। इस घटनाक्रम ने भारत सरकार को एक बड़ा सबक दिया है। अब सरकार ने देश में ही कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को तेज करने का फैसला किया है। इसके तहत करीब 10 अरब डॉलर (लगभग ₹95,000 करोड़) का निवेश किया जाएगा और 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर ऐसे क्षेत्रों में खोज अभियान चलाया जाएगा, जहां अब तक कभी ड्रिलिंग नहीं हुई।
यह पहल केवल नए तेल भंडार खोजने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य भारत की आयात पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट के प्रभाव को सीमित करना भी है।
होर्मुज संकट ने बढ़ाई भारत की चिंता
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका ने दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ा दी थी। यही समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में यदि इस मार्ग पर लंबे समय तक बाधा आती, तो देश में ईंधन की उपलब्धता और कीमतों दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता था। इसी अनुभव के बाद सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने की रणनीति को प्राथमिकता दी है।
2.5 लाख वर्ग किलोमीटर में होगी नई खोज
केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार सरकार अब देश के 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर ऐसे भूभाग और समुद्री क्षेत्रों में तेल एवं गैस की खोज शुरू करेगी, जहां अब तक किसी प्रकार की व्यावसायिक ड्रिलिंग नहीं हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक के जरिए पहले से अनदेखे क्षेत्रों में भी ऊर्जा संसाधनों की खोज की जा सकती है। सरकार इसी दिशा में बड़े स्तर पर निवेश कर रही है।
भारत की तेल निर्भरता कितनी बड़ी?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक और एलपीजी का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। देश की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन घरेलू उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पाया।
वर्तमान स्थिति
- भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 90% आयात करता है।
- केवल 10% कच्चा तेल घरेलू उत्पादन से मिलता है।
- वर्ष 2011 की तुलना में घरेलू तेल उत्पादन लगभग आधा रह गया है।
- बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण तेल की मांग हर वर्ष बढ़ रही है।
यही कारण है कि सरकार अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है।
अंडमान बनेगा भारत का नया ऊर्जा केंद्र?
अब तक भारत में सबसे अधिक तेल उत्पादन मुंबई ऑफशोर, राजस्थान, गुजरात और असम से होता रहा है। लेकिन सरकार की नजर अब अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के समुद्री क्षेत्रों पर है।
भूवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार यहां समुद्र की गहराइयों में बड़े तेल और गैस भंडार मौजूद होने की संभावना है। जून महीने में एक परीक्षण कुएं के दौरान गैस की मौजूदगी के संकेत मिलने से उम्मीद और मजबूत हुई है।
यदि यहां व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन शुरू होता है तो भारत के ऊर्जा क्षेत्र में यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि हो सकती है।
समुद्र की गहराइयों में होगी हाईटेक ड्रिलिंग
डीप-सी ऑयल एक्सप्लोरेशन सामान्य ड्रिलिंग से कहीं अधिक जटिल और महंगा होता है। इसके लिए अत्याधुनिक जहाज, रोबोटिक उपकरण, विशेष प्लेटफॉर्म और उन्नत तकनीक की आवश्यकता होती है।
इसी वजह से भारत इस मिशन में दुनिया की अग्रणी ऊर्जा कंपनियों के साथ सहयोग कर रहा है। इनमें प्रमुख नाम हैं—
- ExxonMobil
- Shell
- BP
इन कंपनियों के अनुभव और तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग समुद्री क्षेत्रों में संभावित तेल एवं गैस भंडार खोजने के लिए किया जाएगा।
‘समुद्र मंथन’ मिशन क्या है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष National Deep Water Exploration Mission की घोषणा की थी, जिसे लोकप्रिय रूप से ‘समुद्र मंथन’ मिशन कहा जा रहा है।
इस मिशन का उद्देश्य है—
- गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज
- घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना
- आयात पर निर्भरता कम करना
- ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाना
- विदेशी निवेश और आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देना
सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में यही मिशन भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण आधार बनेगा।
₹95,000 करोड़ का निवेश कहां होगा?
सरकार ने लगभग 10 अरब डॉलर (करीब ₹95,000 करोड़) के निवेश की योजना बनाई है। यह राशि मुख्य रूप से इन कार्यों में खर्च होगी—
- नए समुद्री क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वे
- अत्याधुनिक ड्रिलिंग उपकरण
- डीप-सी एक्सप्लोरेशन प्लेटफॉर्म
- अंतरराष्ट्रीय तकनीकी साझेदारी
- नए तेल एवं गैस कुओं की खोज
- उत्पादन अवसंरचना का विकास
यह भारत के ऊर्जा क्षेत्र में पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा निवेश माना जा रहा है।
लगातार बढ़ रही है तेल की मांग
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ ऊर्जा की मांग भी लगातार बढ़ रही है।
| वर्ष | प्रतिदिन तेल की मांग |
|---|---|
| 2021 | लगभग 50 लाख बैरल |
| वर्तमान | लगभग 56 लाख बैरल |
| अनुमानित भविष्य | 60 लाख बैरल प्रतिदिन |
यदि घरेलू उत्पादन नहीं बढ़ा तो भविष्य में आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है।
आयात के स्रोत भी बढ़ाए गए
हालिया वैश्विक संकट के दौरान भारत ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए तेल आयात करने वाले देशों की संख्या 27 से बढ़ाकर 41 कर दी।
इस दौरान भारत ने रूस सहित कई देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा ताकि घरेलू बाजार में आपूर्ति बनी रहे और कीमतों पर अत्यधिक दबाव न आए।
ऊर्जा सुरक्षा क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। उद्योग, परिवहन, बिजली उत्पादन और पेट्रोकेमिकल सेक्टर की बढ़ती जरूरतों के कारण ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है।
यदि वैश्विक स्तर पर किसी कारण तेल आपूर्ति बाधित होती है तो इसका असर सीधे—
- पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर,
- एलपीजी सिलेंडर,
- परिवहन लागत,
- महंगाई,
- औद्योगिक उत्पादन,
- और आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।
इसीलिए सरकार अब ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज कदम उठा रही है।
भारत को क्या होगा फायदा?
यदि नए तेल और गैस भंडार मिलते हैं तो इसके कई बड़े लाभ हो सकते हैं—
- कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी।
- विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- पेट्रोलियम क्षेत्र में निवेश और रोजगार बढ़ेंगे।
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
- भविष्य में वैश्विक संकट का असर अपेक्षाकृत कम होगा।
- देश की आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलेगी।
निष्कर्ष
होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े हालिया संकट ने भारत को यह एहसास कराया कि केवल आयात पर निर्भर रहना लंबे समय में जोखिम भरा हो सकता है। इसी कारण सरकार ने घरेलू तेल एवं गैस खोज अभियान को नई गति देने का फैसला किया है। ₹95,000 करोड़ के निवेश, 2.5 लाख वर्ग किलोमीटर में नई खोज, अंडमान में डीप-सी ड्रिलिंग और समुद्र मंथन मिशन जैसे कदम भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे ले जा सकते हैं। यदि यह अभियान सफल रहा तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक तेल बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रभाव को भी काफी हद तक कम कर सकेगा।


