नई दिल्ली: करीब 20 साल पुराने NTPC और Reliance Industries (RIL) के प्राकृतिक गैस सप्लाई विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कंपनी की मुकदमेबाजी की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि मामले की सुनवाई को आगे बढ़ने से रोकने के लिए हर स्तर पर कोई न कोई आपत्ति उठाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रिलायंस इंडस्ट्रीज पर ₹10 लाख का जुर्माना भी लगाया है। अदालत ने कहा कि लगभग दो दशक पुराने मुकदमे में अब तक अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई है और सुनवाई के अलग-अलग चरणों में लगातार अड़चनें आती रही हैं।
2005 से चल रहा है NTPC-RIL गैस विवाद
यह पूरा मामला साल 2005 में शुरू हुआ था। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी NTPC Ltd. ने प्राकृतिक गैस की आपूर्ति से जुड़े एक समझौते को लेकर रिलायंस इंडस्ट्रीज के खिलाफ मुकदमा दायर किया था।
गैस सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े इस विवाद में कई कानूनी पड़ाव आए और मामला अलग-अलग अदालतों से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। करीब दो दशक बीत जाने के बाद भी मुकदमे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी लंबी कानूनी प्रक्रिया पर चिंता जताई और कहा कि मामले को इतने लंबे समय तक लंबित रहना गंभीर विषय है।
हर स्तर पर आपत्ति से कोर्ट नाराज
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया पर नाराजगी जताई।
अदालत के मुताबिक, ऐसा लगता है कि मामले के हर चरण में कोई न कोई आपत्ति उठाई गई। जब निचली अदालत में किसी चुनौती को खारिज किया गया, तो मामला अपीलीय अदालत तक पहुंचा और उसके बाद विशेष अनुमति याचिका यानी SLP के जरिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।
पीठ ने इस लंबी प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए मुकदमेबाजी की तुलना कई सीजन और एपिसोड वाली कहानी से की। अदालत का कहना था कि 2005 में शुरू हुआ मुकदमा अभी तक ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया है और अलग-अलग स्तरों पर प्रक्रिया में रुकावट आती रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी दिया था समय में निपटारे का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि करीब सात साल पहले शीर्ष अदालत ने इस मामले को नौ महीने के भीतर निपटाने का निर्देश दिया था।
इसके बावजूद मामले में उस गति से प्रगति नहीं हो पाई, जिसकी अदालत ने उम्मीद की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात को लेकर नाराजगी जताई कि इतने पुराने मामले में बार-बार होने वाली कानूनी चुनौतियों के कारण सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी।
अदालत ने यह भी कहा कि बड़ी कंपनियों के पास मुकदमेबाजी के लिए पर्याप्त संसाधन होते हैं। ऐसे में किसी मामले को अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं में लंबे समय तक खींचना छोटी संस्थाओं या सामान्य पक्षकारों की तुलना में उनके लिए अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
‘हर चरण पर आपत्ति उठाना कंपनी के लिए फायदेमंद हो सकता है’
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में यह भी सामने आया कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए हर चरण में कोई न कोई आपत्ति उठाना और मुकदमे को आगे बढ़ने से रोकना शायद फायदेमंद हो सकता है।
अदालत ने लंबित मामलों के बढ़ते बोझ के बीच ऐसी मुकदमेबाजी पर चिंता जताई। कोर्ट का संकेत था कि लगातार कानूनी चुनौतियों के कारण न्यायिक प्रक्रिया में देरी होती है और पुराने मामलों का निपटारा प्रभावित होता है।
यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब अदालतें लंबे समय से लंबित मामलों को तेजी से निपटाने पर जोर दे रही हैं।
किस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला?
मौजूदा सुनवाई का संबंध बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश से है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें NTPC के गवाह बीके गांगुली के हलफनामे के कुछ हिस्सों में संशोधन या उन्हें हटाने का आदेश दिया गया था।
रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाने का आदेश दिया।
20 साल पुराने विवाद में क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
NTPC और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच गैस सप्लाई का विवाद केवल दो कंपनियों के बीच एक सामान्य कारोबारी मामला नहीं है। यह मामला लंबे समय से अदालतों में चल रहा है और इसकी कानूनी प्रक्रिया में कई स्तरों पर सुनवाई हो चुकी है।
करीब दो दशक तक चलने वाले मुकदमे में बार-बार होने वाली अपील और आपत्तियों ने इसकी अवधि को और बढ़ाया। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि लंबी मुकदमेबाजी से न्यायिक व्यवस्था पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
₹10 लाख का जुर्माना आर्थिक दृष्टि से रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी बड़ी कंपनी के लिए बहुत बड़ा नहीं माना जाएगा, लेकिन इस आदेश का महत्व अदालत की सख्त टिप्पणी और मुकदमेबाजी के तरीके पर जताई गई नाराजगी के कारण ज्यादा है।
NTPC-RIL विवाद की पृष्ठभूमि
NTPC ने 2005 में रिलायंस इंडस्ट्रीज के साथ प्राकृतिक गैस की आपूर्ति से जुड़े समझौते को लेकर कानूनी विवाद शुरू किया था। इसके बाद मामला विभिन्न कानूनी मंचों से होकर आगे बढ़ता रहा।
समय के साथ इस विवाद में कॉन्ट्रैक्ट, गवाहों के बयान, दस्तावेजों और अदालतों में दायर विभिन्न याचिकाओं से जुड़े कई मुद्दे सामने आए। यही वजह है कि विवाद को शुरू हुए लगभग 20 साल बीतने के बावजूद इसकी कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई।
मौजूदा आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज की उस अपील को खारिज कर दिया, जो बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश
इस मामले में शीर्ष अदालत की टिप्पणी का एक व्यापक संदेश भी है। अदालतें लगातार यह कहती रही हैं कि कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करना हर पक्ष का अधिकार है, लेकिन मुकदमेबाजी को अनावश्यक रूप से लंबा खींचने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।
NTPC-RIL मामले में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 20 साल की लंबी अवधि, पहले दिए गए नौ महीने के निपटारे के निर्देश और लगातार सामने आई कानूनी आपत्तियों को ध्यान में रखा।
इसी संदर्भ में अदालत ने रिलायंस इंडस्ट्रीज पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया और कंपनी की मुकदमेबाजी की रणनीति पर कड़ी टिप्पणी की।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा रिलायंस इंडस्ट्रीज की मौजूदा अपील खारिज किए जाने के बाद मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया संबंधित अदालत में जारी रहेगी। करीब दो दशक पुराने इस विवाद में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि NTPC और रिलायंस इंडस्ट्रीज के बीच मूल गैस सप्लाई विवाद का अंतिम निपटारा कब होता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी यह भी दिखाती है कि शीर्ष अदालत पुराने वाणिज्यिक विवादों को अनावश्यक रूप से लंबा खिंचने से रोकने के लिए सख्त रुख अपना रही है।
नोट: यह खबर उपलब्ध न्यायिक घटनाक्रम और दिए गए विवरण पर आधारित है। जुर्माने का आदेश मौजूदा अपील और अदालत के समक्ष सामने आए कानूनी आचरण से संबंधित है; इससे मूल NTPC-RIL गैस सप्लाई विवाद के सभी मुद्दों का अंतिम निपटारा स्वतः नहीं माना जाना चाहिए।


