नई दिल्ली: भारत में गैर-निवासी भारतीयों (NRI) की बढ़ती जमा राशि और एफसीएनआर-बी (FCNR-B) डिपॉजिट के मजबूत प्रवाह से आने वाले वर्षों में बैंकिंग सेक्टर को बड़ा सहारा मिलने की उम्मीद है। एसबीआई रिसर्च की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में देश के बैंकों की डिपॉजिट ग्रोथ 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। हालांकि, इसी दौरान क्रेडिट ग्रोथ (Loan Growth) भी मजबूत बनी रहेगी और डिपॉजिट की तुलना में अधिक रहने की संभावना जताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, एफसीएनआर-बी डिपॉजिट और एनआरआई निवेश बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इससे बैंकों की फंडिंग क्षमता बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था में निवेश को भी गति मिलेगी।
FCNR-B डिपॉजिट से बैंकों को मिला बड़ा सहारा
एसबीआई रिसर्च ने बताया कि अब तक एफसीएनआर-बी डिपॉजिट के जरिए लगभग 13 से 14 अरब डॉलर जुटाए जा चुके हैं। इससे चालू वित्त वर्ष में बैंकों के डिपॉजिट बेस को मजबूती मिली है।
हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि वित्त वर्ष 2023 से शुरू हुआ ट्रेंड अभी भी जारी है, जिसमें बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ डिपॉजिट ग्रोथ से अधिक बनी हुई है। इसका मतलब है कि बैंक जितनी तेजी से जमा राशि जुटा रहे हैं, उससे अधिक गति से वे कर्ज भी दे रहे हैं।
क्रेडिट और डिपॉजिट के बीच बढ़ा अंतर
30 जून को समाप्त पखवाड़े के आंकड़ों के अनुसार—
- बैंक क्रेडिट में सालाना आधार पर 18.6% की वृद्धि दर्ज की गई।
- कुल बैंक डिपॉजिट में 13.3% की बढ़ोतरी हुई।
- क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ के बीच का अंतर बढ़कर 5.3 प्रतिशत अंक हो गया।
रिपोर्ट के मुताबिक यह अंतर केवल अस्थायी लिक्विडिटी समस्या नहीं है, बल्कि कोविड-19 महामारी के बाद बैंकिंग सिस्टम में आए संरचनात्मक बदलावों का परिणाम है।
अब ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत बन रहा है नया डिपॉजिट हब
एसबीआई रिसर्च का मानना है कि देश के बड़े महानगरों में पारंपरिक जमा बाजार काफी हद तक संतृप्त (Saturated) हो चुके हैं। अब बैंक डिपॉजिट की नई वृद्धि अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से आ रही है।
इसके पीछे कई प्रमुख कारण बताए गए हैं—
- ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आय में बढ़ोतरी
- महिलाओं के लिए चलाई जा रही सरकारी कल्याणकारी योजनाएं
- बैंकिंग सेवाओं का तेजी से विस्तार
- वित्तीय समावेशन में सुधार
इन वजहों से इन इलाकों में बचत की प्रवृत्ति बढ़ रही है और बैंक डिपॉजिट में भी इजाफा देखने को मिल रहा है।
शहरों में निवेश का रुख बदला
रिपोर्ट के अनुसार, शहरी परिवार अब अपनी बचत का बड़ा हिस्सा पारंपरिक बैंक एफडी और सेविंग अकाउंट के बजाय म्यूचुअल फंड, इक्विटी और अन्य मार्केट-लिंक्ड निवेश विकल्पों में लगा रहे हैं।
इसी कारण बैंकिंग सिस्टम में घरेलू जमा राशि का हिस्सा धीरे-धीरे कम हो रहा है। निवेशकों का बढ़ता रुझान शेयर बाजार और निवेश फंडों की ओर बैंकों के लिए नई चुनौती भी बन रहा है।
अब इन सेक्टरों में बढ़ रहा है लोन
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक, बिना गारंटी वाले पर्सनल लोन पर रेगुलेटरी सख्ती के बाद बैंकों का कर्ज वितरण अधिक संतुलित हुआ है।
अब नए लोन मुख्य रूप से इन क्षेत्रों में बढ़ रहे हैं—
- उद्योग (Industry)
- इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट
- वर्किंग कैपिटल लोन
- गोल्ड लोन
- उत्पादक क्षेत्रों के लिए वित्तपोषण
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) ने इस बदलाव को समर्थन दिया है।
कच्चे तेल और वैश्विक तनाव का असर
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो इसका असर बैंकिंग सिस्टम में क्रेडिट ग्रोथ पर डिपॉजिट की तुलना में अधिक पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी पर दबाव बना रह सकता है। फिर भी भारतीय बैंक इस चुनौती से निपटने की अच्छी स्थिति में हैं।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर ‘गोल्डीलॉक्स’ स्थिति में
एसबीआई रिसर्च ने भारतीय बैंकिंग सेक्टर को फिलहाल ‘गोल्डीलॉक्स’ स्थिति में बताया है। इसका अर्थ है कि बैंकिंग व्यवस्था न तो अत्यधिक जोखिम में है और न ही कमजोर।
रिपोर्ट के अनुसार—
- बैंकों की कैपिटल एडिक्वेसी मजबूत है।
- एनपीए (Non-Performing Assets) का स्तर कम है।
- बैलेंस शीट पहले की तुलना में अधिक मजबूत है।
- पूंजी पर्याप्त होने से भविष्य की क्रेडिट मांग पूरी करने की क्षमता बनी हुई है।
आगे क्या है उम्मीद?
रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले समय में घरेलू खपत (Consumption Demand) और सरकारी एवं निजी पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) के बढ़ने से बैंकिंग सेक्टर में कर्ज की मांग मजबूत बनी रह सकती है।
साथ ही, एनआरआई डिपॉजिट और एफसीएनआर-बी निवेश के चलते बैंक अपनी फंडिंग क्षमता को मजबूत बनाए रख सकेंगे। यदि यह रुझान जारी रहा तो वित्त वर्ष 2027 तक डिपॉजिट ग्रोथ 15 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जो भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।


