बच्चों की पढ़ाई में अच्छे नंबर और बेहतर रैंक की चाह स्वाभाविक है, लेकिन जब यही उम्मीद उनके ऊपर लगातार दबाव बनने लगे तो इसका असर उनके आत्मविश्वास और खुशी पर पड़ सकता है। न्यू-एज पैरेंटिंग का फोकस सिर्फ बच्चे को सफल बनाने पर नहीं, बल्कि उसे आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और खुश रखने पर भी है। जानिए ऐसे 5 जरूरी नियम, जिन्हें माता-पिता अपनी पैरेंटिंग में शामिल कर सकते हैं।
आज के दौर में बच्चों से पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद काफी कम उम्र से ही की जाने लगी है। अच्छे नंबर, क्लास में पहली रैंक और प्रतियोगिताओं में आगे रहने को सफलता का पैमाना मान लिया जाता है। माता-पिता अपने बच्चे का भविष्य बेहतर देखना चाहते हैं, लेकिन कई बार अनजाने में उनकी अपेक्षाएं बच्चे के लिए तनाव का कारण बन जाती हैं।
जब किसी बच्चे से बार-बार यह पूछा जाए कि उसके कितने नंबर आए या वह क्लास में कौन-सी रैंक पर रहा, तो धीरे-धीरे उसके मन में यह धारणा बन सकती है कि उसकी कीमत केवल उसके रिजल्ट से तय होती है। जबकि हर बच्चे की सीखने की क्षमता, रुचि और प्रतिभा अलग होती है।
यही वजह है कि आज न्यू-एज पैरेंटिंग में बच्चों को सिर्फ मार्क्स और रैंक के नजरिए से देखने के बजाय उनकी भावनाओं, रुचियों और व्यक्तिगत क्षमताओं को समझने पर जोर दिया जाता है। माता-पिता बच्चों को मेहनत करने के लिए प्रेरित करें, लेकिन उन्हें हर समय दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में न धकेलें।

1. नंबर से ज्यादा बच्चे का सेल्फ-कॉन्फिडेंस बढ़ाएं
बच्चे के अच्छे नंबर आने पर भी अगर माता-पिता का पहला सवाल यह हो कि वह फर्स्ट क्यों नहीं आया, तो इससे बच्चे की मेहनत कमतर महसूस हो सकती है।
मान लीजिए बच्चे को किसी टेस्ट में 20 में से 18 नंबर मिले हैं। ऐसे में उसकी दो नंबर की कमी पर ध्यान देने के बजाय उसकी मेहनत और उपलब्धि की तारीफ करना ज्यादा सकारात्मक तरीका हो सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि बच्चे को पढ़ाई में सुधार करने के लिए न कहा जाए। उसे बताया जा सकता है कि अगली बार वह किन विषयों या सवालों पर ज्यादा मेहनत कर सकता है। लेकिन बातचीत का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे उसे अपनी कमियों के साथ-साथ अपनी खूबियों का भी एहसास हो।
बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि रिजल्ट चाहे जैसा हो, माता-पिता का भरोसा उस पर कायम है।
2. कॉम्पिटिशन को दूसरों से नहीं, खुद से जोड़ें
बच्चों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता उन्हें मेहनत करने और अपनी क्षमता बेहतर करने के लिए प्रेरित कर सकती है। लेकिन अगर हर बातचीत का आधार दूसरे बच्चे से तुलना बन जाए, तो प्रतियोगिता तनाव में बदल सकती है।
‘देखो, तुम्हारा दोस्त तुमसे ज्यादा नंबर लाया है’ जैसी बातें बच्चे के मन में हीन भावना पैदा कर सकती हैं। इसके बजाय माता-पिता बच्चे को उसकी पिछली उपलब्धियों से तुलना करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, अगर बच्चे ने पिछले टेस्ट में 60 प्रतिशत अंक हासिल किए थे और इस बार 70 प्रतिशत, तो इस सुधार को पहचानना जरूरी है। इससे बच्चे को समझ आता है कि उसकी असली प्रतियोगिता खुद को बेहतर बनाने की है।
जीत का मतलब हमेशा किसी दूसरे को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि कल से आज बेहतर बनना भी है।
3. बच्चों को अपना काम खुद करने की आदत डालें
न्यू-एज पैरेंटिंग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बच्चों को उम्र के अनुसार जिम्मेदार और आत्मनिर्भर बनाना है। माता-पिता अगर बच्चे के हर छोटे-बड़े काम को खुद करने लगें, तो बच्चा धीरे-धीरे दूसरों पर निर्भर हो सकता है।
बच्चों को अपनी किताबें व्यवस्थित करने, स्कूल बैग तैयार करने, अपनी चीजों को संभालकर रखने और छोटे-छोटे फैसले लेने का मौका देना चाहिए।
कई बार बच्चे प्रतियोगिता में जीतने के बजाय किसी दूसरे की मदद करना चुनते हैं। इसे असफलता के नजरिए से देखने के बजाय उनके व्यवहार में मौजूद संवेदनशीलता को भी पहचानना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, किसी रेस में बच्चा अपनी जीत की परवाह किए बिना किसी भाई-बहन या दोस्त की मदद करता है, तो उसका यह व्यवहार भी उसके व्यक्तित्व की एक बड़ी खूबी है।
बच्चों को सिर्फ जीतना नहीं, जिम्मेदारी लेना, दूसरों की मदद करना और सही फैसला करना भी सिखाएं।
4. मार्कशीट नहीं, बच्चे की असली काबिलियत पहचानें
हर बच्चा पढ़ाई में अव्वल हो, यह जरूरी नहीं है। किसी बच्चे को गणित पसंद हो सकता है तो किसी को खेल, संगीत, ड्राइंग, डांस, लेखन या तकनीक में दिलचस्पी हो सकती है।
अगर कोई बच्चा पढ़ाई में औसत प्रदर्शन करता है, लेकिन खेल या कला में शानदार है, तो उसकी उस प्रतिभा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसी तरह किसी तेज धावक से यह उम्मीद करना भी सही नहीं कि वह हर दूसरे क्षेत्र में भी उतना ही अच्छा प्रदर्शन करे।
माता-पिता को बच्चों की रुचियों को समझने की कोशिश करनी चाहिए और उन्हें अलग-अलग गतिविधियों को आजमाने का अवसर देना चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे को यह समझाया जाए कि किसी दूसरे व्यक्ति की सफलता उसकी अपनी क्षमता को कम नहीं करती।
हर बच्चे का फर्स्ट आना जरूरी नहीं है। जरूरी यह है कि वह अपनी खूबियों को पहचाने और खुद पर विश्वास करना सीखे।
5. बच्चे की बात सुनें, तुरंत फैसला न सुनाएं
कई माता-पिता बच्चे के स्कूल से लौटते ही पूछते हैं- ‘आज कितने नंबर आए?’ लेकिन इसके साथ यह पूछना भी जरूरी है कि उसका दिन कैसा रहा, उसे किस चीज में मजा आया और कहां परेशानी हुई।
अगर बच्चा किसी विषय में कमजोर है, तो सीधे डांटने के बजाय उसकी परेशानी समझने की कोशिश करें। हो सकता है उसे किसी कॉन्सेप्ट को समझने में दिक्कत हो, पढ़ाई का तरीका पसंद न आता हो या वह किसी और वजह से परेशान हो।
बच्चे को अपनी बात पूरी तरह कहने का मौका देने से माता-पिता और बच्चे के बीच भरोसा मजबूत होता है। जब बच्चे को लगेगा कि उसकी बात सुनी जा रही है, तो वह अपनी समस्याएं छिपाने के बजाय खुलकर शेयर करेगा।
इसलिए हर समस्या का समाधान तुरंत बताने से पहले बच्चे से पूछें कि वह खुद इस स्थिति को कैसे देखता है और उसे किस तरह की मदद चाहिए।
बचपन को सिर्फ रिजल्ट तक सीमित न करें
बच्चे का भविष्य महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके वर्तमान की खुशी भी उतनी ही जरूरी है। पढ़ाई में मेहनत करने के लिए प्रेरित करना अच्छी बात है, लेकिन हर समय नंबर, रैंक और तुलना को बातचीत का केंद्र बना देना सही नहीं है।
माता-पिता बच्चों की मेहनत की तारीफ करें, उनकी रुचियों को समझें और उन्हें अपनी गलतियों से सीखने का मौका दें। उन्हें यह भरोसा भी दें कि एक खराब रिजल्ट उनकी पूरी पहचान नहीं है।
आखिरकार, बच्चे की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि वह स्कूल में कितने नंबर लाता है। आत्मविश्वास, जिम्मेदारी, संवेदनशीलता, सीखने की इच्छा और खुश रहने की क्षमता भी उसके व्यक्तित्व की बड़ी उपलब्धियां हैं।
इसलिए बच्चों को दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में शामिल करने के बजाय उन्हें अपनी क्षमता पहचानने और हर दिन थोड़ा बेहतर बनने के लिए प्रेरित करना ज्यादा जरूरी है। फर्स्ट आने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि बच्चा आत्मविश्वासी, खुश और एक अच्छा इंसान बने।


