Nepal Flood: नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी के बीच सद्गुरु ने हिमालय से जुड़े पांच देशों को एक साझा बोर्ड बनाने का सुझाव दिया है। इसमें भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान को शामिल करने की बात कही गई है।
नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन से मची भारी तबाही के बीच आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जगी वासुदेव ने हिमालयी क्षेत्र की आपदाओं से सामूहिक रूप से निपटने के लिए एक अहम प्रस्ताव रखा है। काठमांडू में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान को मिलाकर एक पांच-देशीय हिमालयन बोर्ड बनाने की वकालत की।
सद्गुरु का कहना है कि हिमालय राजनीतिक सीमाओं को नहीं पहचानता। इसलिए इस संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र से जुड़े देशों को भी आपदा प्रबंधन और राहत के लिए एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
काठमांडू कार्यक्रम में रखा प्रस्ताव
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ईशा फाउंडेशन की ओर से जारी बयान में बताया गया कि सद्गुरु ने काठमांडू में आयोजित ‘इन सॉलिडेरिटी विद नेपाल’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह प्रस्ताव रखा।
उन्होंने कहा कि हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं कई देशों में फैली हुई हैं और इन इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है। ऐसे में केवल किसी एक देश के स्तर पर तैयारी करना पर्याप्त नहीं होगा।
सद्गुरु ने इस मौके पर नेपाल के प्रधानमंत्री डिजास्टर रिलीफ फंड में 1 करोड़ रुपये देने की घोषणा भी की।
‘पहाड़ राजनीतिक सीमाओं को नहीं जानते’
सद्गुरु ने राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़कर हिमालयी क्षेत्र को देखने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि पहाड़ यह नहीं जानते कि किसी व्यक्ति की राजनीतिक संबद्धता क्या है और वह कौन-सी भाषा बोलता है।
उनके मुताबिक हिमालय पृथ्वी की सबसे शानदार भौगोलिक संरचनाओं में से एक है, लेकिन यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील भी है। यहां बाढ़, भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाएं बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकती हैं।
इसी वजह से उन्होंने हिमालय से जुड़े सभी देशों के बीच एक साझा व्यवस्था बनाने पर जोर दिया। उनका तर्क है कि आपदा आने के बाद राहत और बचाव के लिए अलग-अलग देशों की सीमाओं में बंटकर काम करने के बजाय पहले से ही एक साझा तंत्र तैयार होना चाहिए।
भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान होंगे बोर्ड में
प्रस्तावित हिमालयन बोर्ड में भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान को शामिल करने की बात कही गई है। इन देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद भले ही हों, लेकिन हिमालयी क्षेत्र से जुड़ी प्राकृतिक चुनौतियां सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं।
इस तरह के किसी साझा निकाय का उद्देश्य आपदा की स्थिति में सूचनाओं का आदान-प्रदान, पूर्व चेतावनी प्रणाली, राहत एवं बचाव अभियान और आपदा प्रबंधन को बेहतर तरीके से समन्वित करना हो सकता है।
सद्गुरु ने यह भी कहा कि नेपाल जैसे छोटे देश से इतनी बड़ी प्राकृतिक त्रासदी के सभी परिणामों से अकेले निपटने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। ऐसे समय में पड़ोसी देशों की सामूहिक जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
ईशा फाउंडेशन के तीर्थयात्री भी बताए गए लापता
यह प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जब चीन-नेपाल सीमा के आसपास आई भीषण बाढ़ के बाद ईशा फाउंडेशन के 77 तीर्थयात्रियों के एक समूह के संपर्क से बाहर होने की बात कही गई है। इसके अलावा नेपाल में तैनात संस्था के तीन वालंटियर्स के भी लापता होने की जानकारी दी गई है।
ईशा फाउंडेशन की ओर से हर वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा का आयोजन किया जाता है। इस यात्रा के दौरान तीर्थयात्री नेपाल के रास्ते तिब्बत की ओर जाते हैं। बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदा के कारण इस मार्ग पर यात्रा करने वाले लोगों के सामने गंभीर चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
नेपाल के लिए एकजुटता का संदेश
काठमांडू में आयोजित ‘इन सॉलिडेरिटी विद नेपाल’ कार्यक्रम का उद्देश्य बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों के प्रति समर्थन जताना था। कार्यक्रम में नेपाल के लिए राहत और सामूहिक सहयोग की जरूरत पर जोर दिया गया।
सद्गुरु का पांच देशों के हिमालयन बोर्ड का प्रस्ताव इसी व्यापक विचार पर आधारित है कि हिमालय को केवल अलग-अलग देशों की भौगोलिक सीमा के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा प्राकृतिक क्षेत्र के तौर पर देखा जाए।
अगर भारत, चीन, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान जैसे देश हिमालयी क्षेत्र में आपदा पूर्व चेतावनी, मौसम संबंधी डेटा साझा करने, राहत-बचाव और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में समन्वय बढ़ाते हैं, तो भविष्य की आपदाओं से निपटने की क्षमता मजबूत हो सकती है।


