पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव नहीं रह गया है। इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था, तेल बाजार और एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखाई देने लगा है। इसी बीच Moody’s की नई रिपोर्ट ने भारत समेत कई बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है। एजेंसी का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द किसी स्थायी समझौते की संभावना फिलहाल बेहद कम दिखाई देती है। ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट के सामान्य रूप से खुलने की उम्मीद भी कमजोर पड़ गई है।
मूडीज के मुताबिक आने वाले महीनों में भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को तेल और गैस की सप्लाई बनाए रखने के लिए ईरान के साथ अलग स्तर पर बातचीत करनी पड़ सकती है। रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि ये देश सुरक्षित ट्रांजिट कॉरिडोर बनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं ताकि ऊर्जा सप्लाई पूरी तरह बाधित न हो।
दुनिया की ऊर्जा सप्लाई में Strait of Hormuz की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। सामान्य हालात में दुनिया के कुल समुद्री कच्चे तेल और एलएनजी सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। लेकिन संघर्ष बढ़ने के बाद यहां जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो चुकी है। मूडीज का अनुमान है कि संघर्ष से पहले की तुलना में समुद्री ट्रैफिक 90 फीसदी से ज्यादा गिर चुका है। बढ़ते सुरक्षा जोखिम, महंगे बीमा और समुद्री खतरों की वजह से कई शिपिंग कंपनियां इस रास्ते का इस्तेमाल करने से बच रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में ट्रांजिट फ्लो धीरे-धीरे बेहतर हो सकता है, लेकिन यह सामान्य तरीके से नहीं होगा। इसके बजाय अलग-अलग देशों के बीच द्विपक्षीय समझौतों के जरिए सीमित कॉरिडोर बनाए जा सकते हैं। मूडीज ने खासतौर पर भारत, चीन, जापान और कोरिया का जिक्र करते हुए कहा कि ये देश ओमान के जलक्षेत्र और लारक द्वीप के आसपास वैकल्पिक मार्गों पर बातचीत कर सकते हैं। हालांकि एजेंसी ने साफ किया कि यह प्रक्रिया धीमी, जटिल और रुकावटों से भरी हो सकती है। यही वजह है कि 2026 में युद्ध से पहले वाले ट्रैफिक स्तर पर लौटना फिलहाल मुश्किल माना जा रहा है।
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा असर तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। मूडीज ने अपनी 12 मई की रिपोर्ट में कहा कि इस साल ज्यादातर समय ब्रेंट क्रूड 90 से 110 डॉलर प्रति बैरल के बीच रह सकता है। एजेंसी ने यह भी माना कि नई सैन्य घटनाओं या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने पर कीमतें इस दायरे से ऊपर भी जा सकती हैं। लगातार ऊंचे तेल दाम वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव डालेंगे क्योंकि ऊर्जा लागत बढ़ने से परिवहन, उत्पादन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ती हैं।
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर मानी जा रही है क्योंकि देश अब भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आयात करता है। मूडीज के अनुसार भारत अपने कुल कच्चे तेल का करीब 46 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से खरीदता है। ऐसे में अगर तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है तो इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। इससे महंगाई, चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। एजेंसी ने यह भी कहा कि भारत मुद्रा अवमूल्यन के प्रति संवेदनशील है और ऊंचे ऊर्जा आयात बिल का असर सरकारी वित्तीय प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में मूडीज ने 2026 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 0.8 फीसदी घटाकर 6 फीसदी कर दिया है। एजेंसी का मानना है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की वास्तविक विकास दर 0.2 से 0.8 फीसदी तक कम हो सकती है। भारत में महंगाई का औसत स्तर भी पहले के अनुमान से ज्यादा रहने की आशंका जताई गई है। मूडीज ने अनुमान लगाया है कि 2026 में देश की औसत महंगाई दर करीब 4.5 फीसदी रह सकती है।
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब तीसरे महीने में पहुंच चुका है। इसकी शुरुआत अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए संयुक्त हवाई हमलों के बाद हुई थी। इसके बाद होर्मुज स्ट्रेट में आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हो गई। सामान्य परिस्थितियों में यह समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा सप्लाई की लाइफलाइन माना जाता है, लेकिन अब यहां जहाजों की आवाजाही बेहद सीमित रह गई है।
मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि यह केवल अस्थायी झटका नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा सप्लाई से जुड़ा एक बड़ा संरचनात्मक संकट बनता जा रहा है। एजेंसी का मानना है कि अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे तो ऊर्जा कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना रहेगा। इसका असर दुनिया भर में महंगाई, ब्याज दरों और उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता पर दिखाई देगा। साथ ही कंपनियों और जोखिम वाले कर्जदारों के लिए फाइनेंसिंग की शर्तें भी और सख्त हो सकती हैं।
भारत जैसे देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे बढ़ती ऊर्जा लागत और आर्थिक दबाव के बीच अपनी सप्लाई चेन को कितना सुरक्षित रख पाते हैं। आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया का यह संकट केवल भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि यह एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की स्थिरता और महंगाई की दिशा तय करने वाला बड़ा फैक्टर बन सकता है।
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