HighLights
- पूर्व CEA अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा- भारत विदेशी मुद्रा संकट में नहीं, बल्कि ‘किफायत और आजीविका संकट’ से जूझ रहा
- ईरान युद्ध लंबा खिंचा तो पेट्रोल, गैस और खाद की कीमतें और बढ़ सकती हैं
- पीएम मोदी की खर्च घटाने की अपील का समर्थन, लेकिन बोझ बांटने की नीति पर जोर
- निजी निवेश और FDI की कमजोरी पर भी उठाए सवाल
नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था इस समय सिर्फ महंगे तेल या कमजोर रुपये की चुनौती का सामना नहीं कर रही, बल्कि आम लोगों की जेब और आजीविका पर बढ़ते दबाव के दौर से गुजर रही है। यह चेतावनी देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) Arvind Subramanian ने दी है।
उन्होंने साफ कहा कि भारत के सामने इस समय “विदेशी मुद्रा संकट” नहीं है, क्योंकि देश के पास करीब 700 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। असली संकट यह है कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतें आम आदमी, किसानों और मध्यम वर्ग की जिंदगी को लगातार महंगा बना रही हैं।
पूर्व CEA के मुताबिक अगर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ईरान युद्ध लंबा खिंचता है, तो हालात बेहतर होने से पहले और ज्यादा बिगड़ सकते हैं। खासकर तेल सप्लाई, होर्मुज स्ट्रेट और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर डाल सकती है।
‘यह डॉलर का नहीं, जेब का संकट है’
इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा कि लोग इस संकट को गलत तरीके से सिर्फ रुपये और डॉलर के नजरिए से देख रहे हैं। उनके अनुसार असली समस्या यह है कि महंगाई का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है और देश आयात करने में सक्षम है। लेकिन जब तेल, गैस और उर्वरक की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका असर सीधे आम परिवारों के खर्च पर पड़ता है।
यानी संकट इस बात का नहीं कि भारत चीजें खरीद नहीं सकता, बल्कि इस बात का है कि आम लोग उन्हें खरीदने की क्षमता कितनी देर तक बनाए रख पाएंगे।
ऊर्जा संकट का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसके जरिए ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है, खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं, खेती की लागत बढ़ती है और अंततः महंगाई पूरे सिस्टम में फैल जाती है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री इसे “livelihood crisis” यानी आजीविका संकट बता रहे हैं।
युद्ध लंबा चला तो भारत पर क्या असर होगा?
पूर्व CEA ने साफ संकेत दिए कि मौजूदा संकट की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि पश्चिम एशिया में तनाव कितने समय तक जारी रहता है। अगर होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो वैश्विक तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। सप्लाई चेन बाधित होने का मतलब होगा कि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में हर डॉलर की बढ़ोतरी देश के आयात बिल पर भारी असर डालती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि Brent crude लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहता है, तो भारत को कई मोर्चों पर दबाव झेलना पड़ सकता है:
- पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं
- LPG और PNG की कीमतों में बढ़ोतरी संभव
- खाद सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है
- रुपया कमजोर हो सकता है
- चालू खाता घाटा बढ़ सकता है
- महंगाई नियंत्रण मुश्किल हो सकता है
PM मोदी की खर्च घटाने वाली अपील का समर्थन
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल के दिनों में लोगों से गैर-जरूरी खर्च कम करने, विदेशी यात्राएं घटाने और बचत बढ़ाने की अपील की थी। अरविंद सुब्रमण्यम ने इस अपील को “अच्छा शुरुआती कदम” बताया। उनका कहना है कि अल्पकालिक तौर पर voluntary spending cut यानी स्वैच्छिक खर्च में कमी मददगार हो सकती है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ लोगों से खर्च कम करने को कहना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनसे महंगाई और ऊर्जा संकट का बोझ समाज के अलग-अलग वर्गों में संतुलित तरीके से बांटा जा सके।
उनके मुताबिक सबसे बड़ी नीति चुनौती यही है कि गरीब और मध्यम वर्ग पर ज्यादा बोझ न पड़े।
गरीबों और किसानों पर सबसे ज्यादा असर क्यों?
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा असर गरीब परिवारों और किसानों पर पड़ता है। भारत में खेती अभी भी बड़े पैमाने पर डीजल, उर्वरक और सिंचाई लागत पर निर्भर है। यदि गैस और खाद महंगी होती है तो खेती की लागत तेजी से बढ़ेगी। इसका असर फसल कीमतों और खाद्य महंगाई पर भी दिखाई देगा। पूर्व CEA ने चेतावनी दी कि यदि सरकार समय रहते राहत उपाय नहीं लाती, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि ऊर्जा की कीमतें ऐसी चीज नहीं हैं जिन्हें पूरी तरह रोका जा सके। लेकिन सरकार को यह तय करना होगा कि इसका असर कम आय वर्ग तक सीमित रहे।
रुपये पर अत्यधिक फोकस को बताया गलत
अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा कि भारत में अक्सर रुपये की कमजोरी को प्रतिष्ठा के मुद्दे की तरह देखा जाता है, जबकि असली फोकस अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर होना चाहिए। नके मुताबिक कुछ हद तक रुपये का कमजोर होना जरूरी adjustment process का हिस्सा हो सकता है।
यदि रुपया कमजोर होता है आयात महंगे होते हैं, विदेश यात्रा महंगी होती है, विदेश में पढ़ाई की लागत बढ़ती है लेकिन दूसरी तरफ इससे भारतीय निर्यात को प्रतिस्पर्धात्मक फायदा भी मिल सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार को केवल exchange rate बचाने की कोशिश में फंसने के बजाय व्यापक आर्थिक संतुलन पर ध्यान देना चाहिए।
निजी निवेश और FDI पर उठाए बड़े सवाल
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर भारत वास्तव में 7.5% से 8% की तेज आर्थिक वृद्धि कर रहा है, तो फिर निजी निवेश और विदेशी निवेश उम्मीद के मुताबिक क्यों नहीं बढ़ रहे? उन्होंने इसे “अजीब स्थिति” बताया।
भारत लंबे समय से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा कर रहा है। इसके बावजूद:
- निजी कंपनियों का capex उतना मजबूत नहीं
- FDI inflow अपेक्षाकृत कमजोर
- manufacturing investment uneven
- export competitiveness पर दबाव
यह स्थिति संकेत देती है कि सिर्फ GDP growth number काफी नहीं है। निवेशकों को स्थिर नीति वातावरण, निष्पक्ष प्रशासन और predictable governance भी चाहिए।
दक्षिण भारत मॉडल की तारीफ
सुब्रमण्यम ने कहा कि भारत को उन राज्यों से सीखना चाहिए जो निजी निवेश आकर्षित करने में सफल रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्यों का उदाहरण दिया, जहां electronics, manufacturing और China+1 strategy के तहत बड़े निवेश आए हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों ने बेहतर industrial ecosystem, stable policy, logistics support, skilled workforce, faster approvals की वजह से निवेश आकर्षित किया है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को किसी एक समूह को विशेष प्राथमिकता देने के बजाय सभी निवेशकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने चाहिए।
मौसम और कृषि को लेकर भी चिंता
पूर्व CEA ने सिर्फ युद्ध और तेल संकट ही नहीं, बल्कि मौसम को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अत्यधिक तापमान और अल नीनो जैसी परिस्थितियां कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। यदि खाद्य उत्पादन प्रभावित हुआ, तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।
भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, वहां मौसम आधारित जोखिम आर्थिक संकट को और गंभीर बना सकते हैं।
भारत के लिए आगे क्या बड़ी चुनौती?
अरविंद सुब्रमण्यम के बयान का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत के सामने फिलहाल सिर्फ macroeconomic stability की चुनौती नहीं है, बल्कि affordability crisis यानी जीवनयापन की लागत का संकट तेजी से उभर रहा है।
यदि तेल, गैस और खाद्य कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो middle class savings प्रभावित होंगी, ग्रामीण मांग कमजोर पड़ सकती है, inflation लंबे समय तक बनी रह सकती है, सरकार का fiscal burden बढ़ सकता है.
आने वाले महीनों में सरकार के सामने सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह growth, inflation और social stability के बीच संतुलन कैसे बनाए रखती है।
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