Highlights
- 25 जून तक खरीफ फसलों की बुआई पिछले साल से करीब 23% कम।
- धान, दाल, तिलहन, मोटे अनाज और कपास सभी की बुआई प्रभावित।
- कमजोर मॉनसून और अल-नीनो से खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका।
- सरकार ने 315 जिलों के लिए विशेष कृषि रणनीति तैयार की।
नई दिल्ली: देश में मॉनसून की धीमी शुरुआत का असर अब खेती पर साफ दिखाई देने लगा है। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार 25 जून तक खरीफ सीजन की कुल बुआई केवल 182.72 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि तक 236.46 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई हो चुकी थी। यानी इस बार अब तक करीब 23 फीसदी कम बुआई दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में बारिश सामान्य नहीं हुई तो इसका असर खाद्यान्न उत्पादन और खाद्य महंगाई दोनों पर पड़ सकता है।
धान समेत सभी प्रमुख फसलों की बुआई घटी
इस बार केवल धान ही नहीं बल्कि दालें, तिलहन, मोटे अनाज और कपास जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुआई भी पिछले साल के मुकाबले कम रही है। जून के अधिकांश दिनों में सामान्य से काफी कम बारिश होने के कारण किसानों को खेत तैयार करने और समय पर बुआई करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ फसलों की शुरुआती बुआई का समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। यदि यह समय निकल जाता है तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है।
कमजोर मॉनसून से बढ़ सकती है खाद्य महंगाई
देश में पहले से ही खाद्य वस्तुओं की कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं। मई महीने में खुदरा महंगाई दर 3.93% रही, जो पिछले 16 महीनों का उच्च स्तर था। ऐसे में यदि खरीफ उत्पादन प्रभावित होता है तो आने वाले महीनों में चावल, दाल, खाद्य तेल और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि उत्पादन घटने से बाजार में आपूर्ति प्रभावित होगी, जिसका असर सीधे उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा के अनुसार, देश के पास फिलहाल पर्याप्त खाद्यान्न भंडार मौजूद है, इसलिए तत्काल संकट की स्थिति नहीं है। हालांकि यदि मॉनसून की प्रगति लगातार कमजोर रहती है तो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों में मांग भी कमजोर पड़ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि उत्पादन में गिरावट का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
अल-नीनो का खतरा बना चिंता का कारण
मौसम विशेषज्ञ पहले ही इस वर्ष अल-नीनो के प्रभाव की आशंका जता चुके हैं। कृषि मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश सहित 14 राज्यों की पहचान ऐसे क्षेत्रों के रूप में की है जहां सामान्य से कम बारिश होने की संभावना अधिक है।
कम वर्षा होने की स्थिति में सिंचाई, जल उपलब्धता और फसल उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
जलाशयों में भी पानी का स्तर कम
कम बारिश का असर देश के प्रमुख जलाशयों पर भी दिखाई दे रहा है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 25 जून तक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल 48.405 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल भंडारण क्षमता का केवल 23.27% है।
हालांकि पिछले वर्ष इसी अवधि के मुकाबले जल स्तर की तुलना के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अंतर देखने को मिला है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जुलाई में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो सिंचाई की स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
सरकार ने बनाई विशेष रणनीति
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में बताया कि कम वर्षा की आशंका वाले 315 जिलों के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की गई है।
इस रणनीति में शामिल हैं:
- वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देना।
- सूखा सहन करने वाली किस्मों का उपयोग।
- सिंचाई संसाधनों का बेहतर प्रबंधन।
- किसानों को समय पर कृषि सलाह उपलब्ध कराना।
- बीज और उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना।
आगे क्या रहेगा सबसे अहम?
मौसम विभाग के अनुसार जुलाई और अगस्त खरीफ खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण महीने होते हैं। यदि इन महीनों में सामान्य या उससे बेहतर बारिश होती है तो बुआई का अंतर काफी हद तक कम किया जा सकता है और उत्पादन पर बड़ा असर टाला जा सकता है।
लेकिन यदि बारिश में कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण आय और महंगाई—तीनों पर दबाव बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
देश में खरीफ फसलों की बुआई में आई लगभग 23% की गिरावट फिलहाल चिंता का विषय जरूर है, लेकिन अंतिम तस्वीर अभी मॉनसून की आगामी प्रगति पर निर्भर करेगी। सरकार ने प्रभावित जिलों के लिए तैयारी शुरू कर दी है और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार भी मौजूद है। इसके बावजूद यदि जुलाई में बारिश सामान्य नहीं रही तो खाद्य महंगाई बढ़ने, कृषि उत्पादन घटने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह खेती और महंगाई—दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं.


