Lottery Lessons: लॉटरी को अक्सर लोग रातोंरात अमीर बनने का आसान जरिया मानते हैं, लेकिन केरल के एक बुजुर्ग की कहानी बताती है कि किस्मत के भरोसे जिंदगी की कमाई दांव पर लगाना कितना भारी पड़ सकता है। करीब 60 वर्षों तक लगातार लॉटरी खरीदने वाले पी.पी. राघवन ने टिकटों पर लगभग 2 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। कई छोटे इनाम जरूर मिले, लेकिन जिस जैकपॉट का इंतजार था, वह कभी नहीं आया। हालात ऐसे बने कि उन्हें अपनी जमीन और पत्नी के गहने तक बेचने पड़े।
1967 में खरीदा पहला लॉटरी टिकट, फिर कभी नहीं टूटा सिलसिला
केरल के करिवेलूर के पलक्कुन्नू निवासी पी.पी. राघवन का लॉटरी से रिश्ता राज्य की सरकारी लॉटरी शुरू होने से पहले ही जुड़ गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने 1967 में अपना पहला भूटान लॉटरी टिकट खरीदा था। इसके कुछ समय बाद जब केरल सरकार ने अपनी लॉटरी योजना शुरू की तो उन्होंने एक रुपये का पहला केरल लॉटरी टिकट भी खरीदा।
उस समय शायद उन्हें भी उम्मीद रही होगी कि एक दिन बड़ा इनाम उनकी जिंदगी बदल देगा। लेकिन यही उम्मीद धीरे-धीरे एक ऐसी आदत बन गई, जिसने उनकी पूरी जिंदगी को प्रभावित कर दिया।
घर में आज भी रखे हैं हजारों पुराने टिकट
राघवन की सबसे अनोखी बात यह रही कि उन्होंने कभी भी खरीदे गए टिकट फेंके नहीं। जहां अधिकांश लोग ड्रॉ खत्म होने के बाद टिकट कूड़ेदान में डाल देते हैं, वहीं उन्होंने हर टिकट को संभालकर रखा।
आज उनके घर में पांच बड़े बोरों में हजारों पुराने लॉटरी टिकट सुरक्षित रखे हैं। ये टिकट सिर्फ कागज के टुकड़े नहीं, बल्कि छह दशक की उम्मीद, इंतजार और अधूरे सपनों की कहानी बयान करते हैं।
हिसाब लगाया तो उड़ गए होश, टिकटों पर खर्च हो चुके थे ₹2 करोड़
जब राघवन ने वर्षों बाद अपने खर्च का हिसाब लगाया तो उन्हें खुद यकीन नहीं हुआ। अलग-अलग समय में खरीदे गए टिकटों की कुल कीमत जोड़ने पर यह रकम करीब 2 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
राघवन खुद कहते हैं कि शायद वे उन सबसे बदकिस्मत लोगों में हैं जिन्होंने लॉटरी के पीछे करोड़ों रुपये गंवा दिए, लेकिन कभी बड़ा इनाम नहीं जीत पाए।
छोटे इनाम कई बार मिले, लेकिन जैकपॉट कभी नहीं लगा
ऐसा नहीं है कि राघवन को कभी कोई इनाम नहीं मिला। उन्होंने कई बार छोटे पुरस्कार जीते। इनमें भूटान लॉटरी में 4,000 रुपये का इनाम भी शामिल था।
हालांकि ये रकम कभी भी इतनी बड़ी नहीं रही कि वर्षों तक किए गए खर्च की भरपाई हो सके। जिस जैकपॉट के भरोसे वे लगातार टिकट खरीदते रहे, वह हमेशा उनकी पहुंच से दूर ही रहा।
खेती की कमाई भी लगाई, कई बार एक दिन में ₹3,000 तक खर्च किए
राघवन के पास करीब ढाई एकड़ कृषि भूमि थी, जहां वे धान, नारियल और केले की खेती करते थे। इसके अलावा पशुपालन से भी आमदनी होती थी।
इसी कमाई का एक हिस्सा वे नियमित रूप से लॉटरी टिकट खरीदने में खर्च करते रहे। कई बार वे पय्यानूर और कान्हांगद जाकर टिकट खरीदते थे और एक ही दिन में 1,000 से 3,000 रुपये तक खर्च कर देते थे।
धीरे-धीरे यह खर्च इतना बढ़ गया कि उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी।
कर्ज बढ़ा तो बेचनी पड़ी जमीन और पत्नी के गहने
लगातार टिकट खरीदने और किस्मत पर भरोसा बनाए रखने की कीमत आखिरकार पूरे परिवार को चुकानी पड़ी।
जब कर्ज बढ़ने लगा तो राघवन को अपनी जमीन बेचनी पड़ी। इतना ही नहीं, आर्थिक संकट से निकलने के लिए पत्नी के गहने भी बेचने पड़े।
आज राघवन और उनकी पत्नी के. शांता केवल 25 सेंट के एक छोटे से प्लॉट पर बने साधारण घर में रहते हैं।
अब सिर्फ बंपर लॉटरी खरीदते हैं
उम्र बढ़ने और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के कारण अब राघवन पहले की तरह बाहर नहीं निकल पाते। उन्होंने लॉटरी खरीदने की आदत भी काफी कम कर दी है।
अब वे केवल बंपर लॉटरी टिकट खरीदते हैं। हालांकि उनके भीतर कहीं न कहीं यह उम्मीद आज भी बाकी है कि शायद एक दिन किस्मत उनका साथ दे दे।
“मैंने हमेशा सोचा था कि किस्मत बदलेगी”
राघवन अपनी कहानी सुनाते हुए मुस्कुराकर कहते हैं,
“मुझे हमेशा विश्वास था कि एक दिन किस्मत की देवी मुझ पर मेहरबान होंगी, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। आज मैं खुद को उन सबसे बदकिस्मत लोगों में मानता हूं जिन्होंने करोड़ों रुपये गंवा दिए।”
क्या सीख देती है यह कहानी?
राघवन की कहानी यह याद दिलाती है कि लॉटरी पूरी तरह किस्मत का खेल है। इसमें कुछ लोगों को बड़ा इनाम जरूर मिलता है, लेकिन अधिकांश लोगों के लिए लगातार टिकट खरीदना आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है।
विशेषज्ञ भी सलाह देते हैं कि लॉटरी या किसी भी तरह के भाग्य-आधारित खेल में केवल उतनी ही राशि लगानी चाहिए, जिसका नुकसान आपकी वित्तीय स्थिति पर असर न डाले। जीवनभर की बचत या परिवार की संपत्ति को ऐसे खेलों में दांव पर लगाना गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर सकता है।


