Hormuz Crisis Returns: होर्मुज संकट की वापसी ने एक बार फिर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। योजना आयोग के पूर्व डिप्टी चेयरमैन और जाने-माने अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा है कि भारत को अपने नियंत्रण वाले स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (Strategic Petroleum Reserve) को काफी बड़ा करने की जरूरत है। उनके मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव यह दिखाता है कि सीमित इमरजेंसी स्टॉक और कुछ चुनिंदा सप्लाई रूट पर निर्भरता कितना बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है।
अहलूवालिया ने कहा कि होर्मुज संकट से भारत को सिर्फ तेल के मामले में नहीं, बल्कि हर जरूरी वस्तु की सप्लाई को लेकर सीख लेनी चाहिए। किसी एक देश, क्षेत्र या रास्ते पर ज्यादा निर्भरता भविष्य में परेशानी खड़ी कर सकती है।
होर्मुज संकट ने दिखाई ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती
मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने एक बातचीत में कहा कि हालिया पश्चिम एशिया संकट एक वैश्विक संकट था, जिसके कारण कई देशों को ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौजूद रणनीतिक भंडारों का इस्तेमाल किया गया।
उन्होंने कहा कि समस्या यह है कि हर संकट वैश्विक नहीं होता। कई बार कोई ऐसी स्थिति बन सकती है जिसका असर केवल भारत पर पड़े। ऐसे हालात में केवल अंतरराष्ट्रीय रिजर्व पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
उनके अनुसार, भारत को अपने नियंत्रण में बड़े स्तर पर तेल भंडारण क्षमता विकसित करनी होगी, ताकि अचानक पैदा होने वाले संकट से निपटा जा सके।
भारत के पास अभी कितनी है रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता?
भारत की मौजूदा स्ट्रैटेजिक क्रूड ऑयल रिजर्व क्षमता करीब 53.3 लाख टन है। इसे देश में तीन प्रमुख स्थानों पर रखा जाता है:
- विशाखापत्तनम: 13.3 लाख टन
- मंगलुरु: 15 लाख टन
- पादुर: 25 लाख टन
इन भंडारों का प्रबंधन सरकारी कंपनी इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) करती है।
हालांकि, भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ता देशों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में विशेषज्ञ लंबे समय से रणनीतिक भंडार बढ़ाने की मांग करते रहे हैं।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और यहां से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
यदि इस मार्ग में लंबे समय तक बाधा आती है तो इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। तेल महंगा होने से:
- पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
- महंगाई बढ़ सकती है।
- रुपये पर दबाव आ सकता है।
- कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
पिछले पश्चिम एशिया तनाव के दौरान कच्चे तेल की कीमतें करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। हालांकि बाद में तनाव कम होने की उम्मीद के चलते कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई थीं।
भारत ने संकट को बेहतर तरीके से संभाला: अहलूवालिया
मोंटेक सिंह अहलूवालिया का कहना है कि भारत ने होर्मुज संकट को अपेक्षाकृत अच्छे तरीके से संभाला। उनके मुताबिक, शुरुआती आशंका के मुकाबले संकट ज्यादा गंभीर नहीं हुआ क्योंकि बाजार को उम्मीद थी कि स्थिति जल्द सामान्य हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि भारत की रणनीति सही थी क्योंकि सरकार ने यह अनुमान लगाया था कि सप्लाई बाधित होने की स्थिति लंबे समय तक नहीं रहेगी।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी अनिश्चितताओं से बचने के लिए भारत को अपनी तैयारी और मजबूत करनी होगी।
सिर्फ तेल नहीं, हर सप्लाई चेन के लिए सबक
अहलूवालिया ने कहा कि होर्मुज संकट से सबसे बड़ा सबक यह है कि किसी एक रास्ते या स्रोत पर निर्भरता कम करनी होगी।
उन्होंने इसे “चोकपॉइंट रिस्क” बताया। यानी अगर किसी महत्वपूर्ण सप्लाई मार्ग में समस्या आती है तो पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने भारत के लिए दो बड़ी प्राथमिकताएं बताईं:
1. ऊर्जा स्रोतों में विविधता
भारत को अलग-अलग देशों और क्षेत्रों से तेल आयात करने की क्षमता बढ़ानी होगी। इससे किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर असर कम होगा।
2. बड़े रणनीतिक भंडार तैयार करना
भारत को ऐसे तेल भंडार बनाने होंगे जो लंबे समय तक आपात स्थिति में देश की जरूरतों को पूरा कर सकें।
ONGC बढ़ा रहा है तेल भंडारण इंफ्रास्ट्रक्चर
भारत सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां रणनीतिक तेल भंडारण क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं।
सरकारी कंपनी ONGC ने कर्नाटक के मंगलुरु में करीब 17.5 लाख टन (लगभग 1.3 करोड़ बैरल) क्षमता वाला नया रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाने की योजना बताई है।
कंपनी ने इसके लिए केंद्र सरकार से स्टोरेज के व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति लेने की बात कही है।
मौजूदा समय में मंगलुरु, पादुर और विशाखापत्तनम स्थित रिजर्व के कुछ हिस्सों के व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति दी गई है।
भारत की तेल जरूरत और भविष्य की चुनौती
भारत रोजाना करीब 55-56 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत करता है। देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में आने वाले वर्षों में ऊर्जा की मांग और बढ़ने की संभावना है।
सरकार के अनुसार, भारत के पास कुल रिजर्व क्षमता करीब 74 दिनों की है, जबकि वास्तविक स्टॉक कवर लगभग 60 दिनों के आसपास है। इसमें क्रूड ऑयल स्टॉक, पेट्रोलियम उत्पादों का स्टॉक और रणनीतिक भंडार शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए और बड़े कदम उठाने होंगे।
निष्कर्ष: होर्मुज संकट भारत के लिए चेतावनी
होर्मुज संकट ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी बड़े देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। मोंटेक सिंह अहलूवालिया की सलाह के मुताबिक, भारत को न केवल तेल आयात के स्रोतों को बढ़ाना होगा बल्कि अपने रणनीतिक भंडार को भी मजबूत करना होगा।
भविष्य में वैश्विक तनाव, युद्ध या सप्लाई बाधा जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मजबूत घरेलू रिजर्व भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा सुरक्षा कवच दे सकता है।


