नई दिल्ली: कमजोर मानसून की वजह से खरीफ सीजन की शुरुआत किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण रही। 25 जून तक देश में खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले करीब 23 फीसदी पीछे चल रही थी। हालांकि जुलाई के पहले सप्ताह में कई राज्यों में अच्छी बारिश होने से धान की बुवाई में सुधार देखने को मिला है। इसके बावजूद कपास, दलहन और तिलहन फसलों की बुवाई अब भी पिछले साल की तुलना में काफी कम बनी हुई है।
जुलाई की बारिश से धान की बुवाई में सुधार
कृषि मंत्रालय के 5 जुलाई तक के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई की शुरुआत में हुई अच्छी बारिश का सबसे ज्यादा फायदा धान की बुवाई को मिला है। 5 जुलाई तक देश में 60.24 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुवाई या रोपाई हो चुकी है। पिछले साल इसी अवधि तक यह आंकड़ा 69.30 लाख हेक्टेयर था।
हालांकि धान की बुवाई में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन यह अभी भी पिछले वर्ष की तुलना में करीब 13 फीसदी कम है। यदि आने वाले दिनों में मानसून सामान्य बना रहता है तो धान का रकबा और तेजी से बढ़ सकता है।
कपास की खेती में बड़ी गिरावट
इस खरीफ सीजन में सबसे ज्यादा चिंता कपास की खेती को लेकर है। अच्छी आय देने वाली इस नकदी फसल का रकबा इस बार काफी घट गया है।
- पिछले साल 5 जुलाई तक कपास की बुवाई: 82 लाख हेक्टेयर
- इस साल 5 जुलाई तक कपास की बुवाई: 63.18 लाख हेक्टेयर
यानी कपास का रकबा करीब 23 फीसदी घट गया है। मौसम की अनिश्चितता और कई क्षेत्रों में देर से हुई बारिश को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।
दलहन और तिलहन पर भी मौसम की मार
सरकार लगातार दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है, लेकिन इस बार कमजोर मानसून का असर इन फसलों पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
दलहन की स्थिति
- पिछले साल 5 जुलाई तक: 47.49 लाख हेक्टेयर
- इस साल 5 जुलाई तक: 37.15 लाख हेक्टेयर
दलहन में सबसे ज्यादा गिरावट अरहर और उड़द की बुवाई में दर्ज की गई है।
तिलहन की स्थिति
- पिछले साल 5 जुलाई तक: 109.27 लाख हेक्टेयर
- इस साल 5 जुलाई तक: 66.31 लाख हेक्टेयर
तिलहन फसलों में सोयाबीन और मूंगफली की बुवाई पिछले वर्ष के मुकाबले काफी पीछे चल रही है।
आगे क्या है उम्मीद?
मौसम विभाग के अनुसार यदि जुलाई और अगस्त में मानसून सामान्य रहता है तो खरीफ फसलों की बुवाई में और तेजी आ सकती है। विशेष रूप से धान, सोयाबीन, मूंगफली और दलहन की बुवाई में सुधार की संभावना है। हालांकि कपास और कुछ अन्य फसलों का रकबा पिछले साल के स्तर तक पहुंच पाना अभी भी चुनौती बना हुआ है।


