नई दिल्ली: देश में खरीफ फसलों की बुवाई अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। इसी बीच जारी ताजा सरकारी आंकड़ों ने किसानों, कृषि विशेषज्ञों और बाजार की चिंता बढ़ा दी है। नए आंकड़ों के मुताबिक, 2026-27 खरीफ सीजन में कुल बुवाई क्षेत्र 894.22 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 920.72 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार 26.50 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में बुवाई हुई है।
सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि धान, दलहन और मिलेट्स जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसलों के रकबे में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि तिलहन और गन्ने जैसी कुछ फसलों में क्षेत्रफल बढ़ा है, लेकिन कुल मिलाकर बुवाई में कमी भविष्य में उत्पादन और खाद्य महंगाई दोनों पर असर डाल सकती है।
Highlights
- कुल खरीफ बुवाई क्षेत्र में 26.50 लाख हेक्टेयर की कमी।
- धान, मिलेट्स और दलहन की बुवाई में बड़ी गिरावट।
- तिलहन और गन्ने के रकबे में मामूली बढ़ोतरी दर्ज।
- कमजोर मानसून का असर कई राज्यों में बुवाई पर पड़ा।
- उत्पादन घटने से कृषि जिंसों की कीमतें बढ़ने की आशंका।
कितनी हुई खरीफ फसलों की कुल बुवाई?
कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष खरीफ सीजन में अब तक 894.22 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है। पिछले साल इसी समय तक यह आंकड़ा 920.72 लाख हेक्टेयर था। इसका मतलब है कि इस बार करीब 2.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
खरीफ सीजन भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी दौरान धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दलहन, बाजरा और कई अन्य प्रमुख फसलों की खेती की जाती है। इन फसलों का उत्पादन सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा और महंगाई को प्रभावित करता है।
किन फसलों की बुवाई में सबसे ज्यादा गिरावट?
ताजा आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक कमी मिलेट्स (मोटे अनाज) की बुवाई में दर्ज की गई है।
| फसल | बुवाई में बदलाव |
|---|---|
| मिलेट्स | -12.83 लाख हेक्टेयर |
| धान | -6.89 लाख हेक्टेयर |
| दलहन | -6.41 लाख हेक्टेयर |
| कपास | -2.52 लाख हेक्टेयर |
धान भारत की सबसे महत्वपूर्ण खरीफ फसल है। इसके रकबे में कमी भविष्य में चावल के उत्पादन पर असर डाल सकती है। वहीं दलहन की कम बुवाई से दालों की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ गई है।
किन फसलों में बढ़ा रकबा?
हालांकि सभी आंकड़े निराशाजनक नहीं हैं। कुछ फसलों में किसानों ने पिछले वर्ष की तुलना में अधिक बुवाई की है।
| फसल | बढ़ोतरी |
|---|---|
| तिलहन | +1.19 लाख हेक्टेयर |
| गन्ना | +0.86 लाख हेक्टेयर |
| जूट एवं मेस्टा | +0.12 लाख हेक्टेयर |
विशेषज्ञों का मानना है कि तिलहन की बुवाई बढ़ने से भविष्य में खाद्य तेलों की घरेलू उपलब्धता बेहतर हो सकती है और आयात पर दबाव कुछ हद तक कम पड़ सकता है।
कमजोर मानसून बना बड़ी वजह
विशेषज्ञों के अनुसार कई राज्यों में मानसून की धीमी शुरुआत और बारिश के असमान वितरण का असर खरीफ बुवाई पर साफ दिखाई दिया है। जहां समय पर पर्याप्त बारिश नहीं हुई, वहां किसानों ने बुवाई टाल दी या कम क्षेत्र में खेती की।
यदि अगस्त और सितंबर में अच्छी बारिश होती है तो कुछ क्षेत्रों में देर से बुवाई के जरिए नुकसान की भरपाई संभव है, लेकिन कई फसलों में अब इसकी संभावना सीमित मानी जा रही है।
पैदावार और महंगाई पर क्या होगा असर?
धान, दलहन और मिलेट्स जैसी प्रमुख फसलों के रकबे में कमी का सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है। यदि मौसम आगे भी पूरी तरह अनुकूल नहीं रहा तो बाजार में इन कृषि जिंसों की उपलब्धता कम हो सकती है, जिससे कीमतों को समर्थन मिलेगा।
दूसरी ओर, तिलहन की बुवाई बढ़ने से इस क्षेत्र में उत्पादन बेहतर रहने की उम्मीद है। इससे खाद्य तेलों की आपूर्ति को कुछ राहत मिल सकती है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अंतिम उत्पादन का अनुमान केवल बुवाई पर नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में बारिश, तापमान, कीट प्रबंधन और फसल की स्थिति पर भी निर्भर करेगा।
किसानों के लिए क्या मायने हैं?
अगर मौसम सामान्य रहता है तो कई क्षेत्रों में फसल की उत्पादकता बेहतर रह सकती है, जिससे बुवाई में आई कमी का कुछ असर कम हो सकता है। लेकिन यदि बारिश में और बाधा आती है तो उत्पादन प्रभावित होने के साथ किसानों की आय पर भी असर पड़ सकता है।
सरकार की नजर अब मानसून की प्रगति और राज्यों से मिलने वाली फसल रिपोर्ट पर बनी हुई है। आने वाले सप्ताहों में जारी होने वाले नए बुवाई और फसल विकास के आंकड़े कृषि बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
निष्कर्ष
ताजा खरीफ बुवाई आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष कुल रकबा पिछले साल की तुलना में 26.50 लाख हेक्टेयर कम है। धान, मिलेट्स, दलहन और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई में कमी चिंता बढ़ाने वाली है, जबकि तिलहन और गन्ने में मामूली सुधार राहत देता है। अब उत्पादन और कीमतों की दिशा काफी हद तक आने वाले हफ्तों में मानसून की स्थिति और फसल विकास पर निर्भर करेगी।


