नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि नेपाल के स्नो लेपर्ड नियमित रूप से भारत और चीन की सीमाएं पार करते हैं। GPS ट्रैकिंग से इनके होम रेंज को लेकर चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है।
नेपाल से भारत और चीन तक घूमते मिले स्नो लेपर्ड, वैज्ञानिक भी रह गए हैरान
हिमालय की ऊंची और बर्फीली चोटियों पर रहने वाले दुर्लभ स्नो लेपर्ड (हिम तेंदुए) को लेकर हुई एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने वन्यजीव संरक्षण की मौजूदा रणनीतियों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। नेपाल में जीपीएस कॉलर की मदद से ट्रैक किए गए चार स्नो लेपर्ड्स के डेटा से पता चला है कि ये हिम तेंदुए नियमित रूप से नेपाल, भारत और चीन की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार करते हैं।
रिसर्च के मुताबिक, इनका होम रेंज (आवासीय क्षेत्र) पहले के वैज्ञानिक अनुमानों से 6 से 97 गुना तक बड़ा निकला है। इसका मतलब है कि स्नो लेपर्ड्स को सुरक्षित रखने के लिए सिर्फ राष्ट्रीय उद्यान या देश की सीमाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को एक इकाई मानकर संरक्षण की जरूरत है।
GPS कॉलर से खुला ‘माउंटेन घोस्ट’ का रहस्य
यह अध्ययन नेपाल के कंचनजंगा संरक्षण क्षेत्र में किया गया, जहां नेपाल, भारत के सिक्किम और चीन के तिब्बत क्षेत्र की सीमाएं मिलती हैं।
वर्ष 2013 से 2017 के बीच वैज्ञानिकों ने कठिन अभियान चलाकर चार जंगली स्नो लेपर्ड्स के गले में जीपीएस कॉलर लगाए। इन कॉलर से कुल 4,707 GPS लोकेशन रिकॉर्ड हुईं।
- एक कॉलर केवल 20 दिन बाद खराब हो गया।
- दूसरे स्नो लेपर्ड से लगातार 659 दिनों तक डेटा मिलता रहा।
- अध्ययन में शामिल प्रमुख स्नो लेपर्ड्स के नाम लापछेंबा, यालुंग और घांगजेनज्वेंगा रखे गए।
GPS तकनीक की वजह से पहली बार वैज्ञानिकों को इन दुर्लभ जीवों की वास्तविक गतिविधियों को इतने लंबे समय तक रिकॉर्ड करने का मौका मिला।
कई बार पार की भारत और चीन की सीमा
स्टडी की सबसे अहम खोज यह रही कि चार में से तीन स्नो लेपर्ड नियमित रूप से नेपाल से बाहर भारत और चीन के इलाकों में जाते रहे।
अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:
- तीन स्नो लेपर्ड्स ने ट्रैकिंग अवधि में 5 से 7 बार अंतरराष्ट्रीय सीमाएं पार कीं।
- उन्होंने अपने कुल निगरानी समय का 10% से 34% हिस्सा नेपाल के बाहर बिताया।
- लापछेंबा पांच बार चीन की सीमा में गया और वहां 2 से 37 दिन तक रुका।
- यालुंग ने अपने होम रेंज का लगभग आधा हिस्सा भारत में बिताया।
- दो स्नो लेपर्ड्स के कुल होम रेंज का 28% से 50% हिस्सा भारतीय सीमा के भीतर पाया गया।
इससे स्पष्ट हुआ कि इन जानवरों के लिए राजनीतिक सीमाओं का कोई महत्व नहीं है।
97 गुना बड़ा निकला होम रेंज
वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग मॉडल के जरिए स्नो लेपर्ड्स के होम रेंज का विश्लेषण किया।
अध्ययन में सामने आया कि:
- एक मॉडल के अनुसार होम रेंज 39 से 120 वर्ग मील रही।
- दूसरे मॉडल के अनुसार यह 81 से 398 वर्ग मील तक पहुंची।
- दोनों तरीकों से यह निष्कर्ष निकला कि पहले के अनुमान वास्तविकता से काफी छोटे थे।
- कुछ मामलों में यह दायरा पुराने अनुमानों से 97 गुना तक अधिक निकला।
इस खोज से यह साबित हुआ कि स्नो लेपर्ड्स को जीवित रहने और शिकार की तलाश के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक बड़े क्षेत्र की आवश्यकता होती है।
क्यों कहा जाता है ‘पहाड़ का प्रेत’?
स्नो लेपर्ड को अंग्रेजी में Mountain Ghost (माउंटेन घोस्ट) भी कहा जाता है।
इसके पीछे कई वजह हैं—
- यह समुद्र तल से 19,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर रहता है।
- इसका आवास बेहद दुर्गम, पथरीला और बर्फीला होता है।
- इसकी धूसर और धब्बेदार खाल चट्टानों में आसानी से छिप जाती है।
- यह शेर और बाघ की तरह दहाड़ता नहीं है।
- इसलिए इसे देख पाना दुनिया के सबसे कठिन वन्यजीव अनुभवों में माना जाता है।
GPS तकनीक ने बदल दी रिसर्च
पहले वैज्ञानिक रेडियो कॉलर का इस्तेमाल करते थे, जिसमें जानवर के काफी करीब जाकर सिग्नल लेना पड़ता था।
अब आधुनिक GPS कॉलर हजारों लोकेशन पॉइंट्स अपने आप रिकॉर्ड और भेज देते हैं। इससे वैज्ञानिकों को बिना जानवरों को परेशान किए उनकी गतिविधियों का विस्तृत अध्ययन करने में मदद मिली है।
संरक्षण नीति में बदलाव की जरूरत
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन केवल चार स्नो लेपर्ड्स पर आधारित जरूर है, लेकिन इसके निष्कर्ष बेहद महत्वपूर्ण हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- वन्यजीव अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को नहीं पहचानते।
- केवल राष्ट्रीय उद्यानों के भीतर संरक्षण पर्याप्त नहीं है।
- भारत, नेपाल और चीन को साझा संरक्षण रणनीति बनानी होगी।
- प्राकृतिक वन्यजीव गलियारों (Wildlife Corridors) की सुरक्षा बढ़ानी होगी।
- सीमा पार निगरानी और अवैध शिकार रोकने के लिए तीनों देशों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
यदि हिमालयी देशों ने मिलकर काम नहीं किया, तो इस दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजाति को बचाना भविष्य में और कठिन हो सकता है।
निष्कर्ष
नई GPS ट्रैकिंग स्टडी ने यह साबित कर दिया है कि स्नो लेपर्ड किसी एक देश या राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित नहीं रहते। उनका प्राकृतिक जीवन पूरे हिमालयी क्षेत्र में फैला हुआ है। ऐसे में संरक्षण की पारंपरिक सीमित सोच को बदलकर सीमा-पार सहयोग (Transboundary Conservation) अपनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। यही रणनीति भविष्य में हिमालय के इस रहस्यमयी शिकारी को सुरक्षित रखने में सबसे प्रभावी साबित हो सकती है।


