Highlights
- ITAT ने कहा- सिर्फ डीड में देरी होने से नहीं रुकेगी Section 54 की टैक्स छूट।
- समय सीमा के भीतर निवेश और फ्लैट पर कानूनी अधिकार होना सबसे अहम।
- रीडेवलपमेंट और अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में निवेश करने वालों को बड़ी राहत।
- टैक्सपेयर को 2 करोड़ रुपये के कैपिटल गेन डिडक्शन की मंजूरी मिली।
नई दिल्ली
अगर आपने अपना पुराना घर बेचकर किसी नए फ्लैट में निवेश किया है और बिल्डर ने फाइनल कन्वेयंस डीड (Sale/Conveyance Deed) तय समय से काफी बाद में रजिस्टर्ड कराई है, तो अब आपके लिए राहत की खबर है। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सिर्फ डीड के देर से बनने की वजह से किसी टैक्सपेयर को इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54 (Section 54) के तहत मिलने वाली कैपिटल गेन टैक्स छूट से वंचित नहीं किया जा सकता।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि यदि टैक्सपेयर ने कानून में तय समय-सीमा के भीतर किसी रिहायशी संपत्ति में निवेश कर दिया है और उस संपत्ति पर उसके कानूनी रूप से लागू किए जा सकने वाले अधिकार (Enforceable Rights) बन चुके हैं, तो बाद में डीड रजिस्टर होने से टैक्स छूट प्रभावित नहीं होगी।
इस फैसले से खास तौर पर अंडर-कंस्ट्रक्शन, रीडेवलपमेंट और बिल्डर प्रोजेक्ट्स में निवेश करने वाले हजारों टैक्सपेयर्स को राहत मिलने की उम्मीद है।
क्या होता है Section 54 का फायदा?
इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54 के तहत यदि कोई व्यक्ति अपना रिहायशी मकान बेचता है और उससे हुए Long Term Capital Gain को तय समय के भीतर किसी दूसरी रिहायशी संपत्ति में निवेश कर देता है, तो उसे कैपिटल गेन टैक्स में छूट मिल सकती है।
आमतौर पर यह शर्त होती है कि—
- नया घर निर्धारित समय सीमा में खरीदा जाए।
- या नया मकान तय समय में बनवाया जाए।
- निवेश के पर्याप्त दस्तावेज और भुगतान का रिकॉर्ड मौजूद हो।
कई मामलों में विवाद तब पैदा होता है जब बिल्डर या डेवलपर की ओर से रजिस्टर्ड सेल डीड या कन्वेयंस डीड काफी देर से बनाई जाती है।
क्या था पूरा मामला?
मामला वित्त वर्ष 2013-14 का था। एक टैक्सपेयर ने अपना पुराना मकान बेचने के बाद मिले कैपिटल गेन पर करीब 2 करोड़ रुपये की टैक्स छूट का दावा किया।
बाद में उनके कानूनी उत्तराधिकारी ने ट्रिब्यूनल को बताया कि—
- जनवरी 2014 में रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट में निवेश किया गया।
- उसी समय एग्रीमेंट किया गया।
- आवश्यक भुगतान भी कर दिया गया।
- लेकिन रजिस्टर्ड ट्रांसफर डीड नवंबर 2016 में बनी।
यानी निवेश समय पर हो गया था, लेकिन कानूनी रजिस्ट्रेशन बाद में हुआ।
टैक्स विभाग ने क्यों किया था दावा खारिज?
आयकर अधिकारी (Assessing Officer) और बाद में National Faceless Appeal Centre (NFAC) ने टैक्स छूट देने से इनकार कर दिया।
उनका तर्क था कि—
- टैक्सपेयर के पास समय सीमा के भीतर रजिस्टर्ड सेल डीड नहीं थी।
- केवल अनरजिस्टर्ड एग्रीमेंट के जरिए भविष्य की संपत्ति पर अधिकार मिला था।
- इसलिए इसे कानून के अनुसार “घर खरीदना” नहीं माना जा सकता।
इसी आधार पर Section 54 का लाभ देने से मना कर दिया गया।
ITAT ने क्या कहा?
ITAT ने टैक्स विभाग की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि—
- टैक्सपेयर ने जनवरी 2014 में एग्रीमेंट किया था।
- उसी समय भुगतान किया गया।
- एक निश्चित और पहचान योग्य फ्लैट आवंटित हो चुका था।
- इसलिए वास्तव में फ्लैट की खरीद उसी समय पूरी मानी जाएगी।
ट्रिब्यूनल के अनुसार बाद में हुई रजिस्टर्ड सेल डीड केवल उस पहले से हुए लेनदेन को कानूनी औपचारिक रूप देने का काम करती है।
पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
ITAT ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट के कई पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया।
इन फैसलों में कहा गया है कि—
- किसी संपत्ति पर महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त होना खरीद का पर्याप्त आधार हो सकता है।
- रजिस्टर्ड डीड बाद में होने से खरीद की वास्तविक तारीख नहीं बदल जाती।
- Section 54 जैसे प्रावधानों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए क्योंकि इनका उद्देश्य लोगों को नए घरों में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है।
16.24 लाख रुपये के खर्च को भी मिली मंजूरी
इस मामले में ट्रिब्यूनल ने केवल कैपिटल गेन टैक्स छूट ही नहीं दी, बल्कि पुराना मकान बेचने के दौरान किए गए 16.24 लाख रुपये के विभिन्न खर्चों को भी स्वीकार किया।
इनमें शामिल थे—
- कानूनी फीस
- ब्रोकरेज
- कंसल्टेंसी फीस
- अन्य ट्रांजैक्शन खर्च
टैक्स विभाग ने यह कहकर खर्च सीमित करने की कोशिश की थी कि पुरानी संपत्ति में टैक्सपेयर की हिस्सेदारी केवल 49 प्रतिशत थी।
लेकिन ITAT ने कहा कि यदि वास्तविक भुगतान टैक्सपेयर ने किया है और उसका पर्याप्त प्रमाण मौजूद है, तो केवल हिस्सेदारी के आधार पर खर्च कम नहीं किया जा सकता।
किन लोगों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?
यह फैसला खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्होंने—
- रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कराया है।
- अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में निवेश किया है।
- बिल्डर से अलॉटमेंट लेटर प्राप्त किया है।
- समय पर भुगतान किया लेकिन रजिस्ट्री बाद में हुई।
- बिल्डर की देरी के कारण डीड समय पर नहीं बन सकी।
ऐसे मामलों में अब यह फैसला टैक्स विवादों में एक मजबूत आधार बन सकता है।
टैक्सपेयर्स को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
हालांकि यह फैसला राहत देने वाला है, लेकिन कुछ जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखना बेहद आवश्यक है।
- खरीद का एग्रीमेंट
- भुगतान की रसीदें
- बैंक ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड
- अलॉटमेंट लेटर
- बिल्डर के साथ हुई पत्राचार
- कब्जा (Possession) से जुड़े दस्तावेज
ये सभी रिकॉर्ड यह साबित करने में मदद करते हैं कि निवेश वास्तव में तय समय-सीमा के भीतर किया गया था।
क्या हर मामले में अपने-आप मिल जाएगी छूट?
नहीं। ITAT का यह फैसला महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मामले में स्वतः टैक्स छूट मिल जाएगी।
यदि—
- निवेश समय सीमा के बाहर हुआ हो,
- भुगतान का रिकॉर्ड न हो,
- संपत्ति की पहचान स्पष्ट न हो,
- या लेनदेन केवल कागजी हो,
तो टैक्स विभाग Section 54 का लाभ देने से इनकार कर सकता है।
इसलिए प्रत्येक मामला उसके तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तय किया जाएगा।
निष्कर्ष
ITAT का यह फैसला उन लाखों घर खरीदारों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो बिल्डर की देरी की वजह से टैक्स विवादों में फंस जाते थे। ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि यदि टैक्सपेयर ने समय पर निवेश किया है और संपत्ति पर उसके कानूनी अधिकार स्थापित हो चुके हैं, तो केवल रजिस्टर्ड डीड में देरी के आधार पर Section 54 की कैपिटल गेन टैक्स छूट नहीं रोकी जा सकती। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में टैक्सपेयर्स के पक्ष को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।


