Indian Railway News: भारतीय रेलवे ने पिछले 12 वर्षों में यात्री सुरक्षा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। तकनीकी आधुनिकीकरण, ट्रैक इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार, स्वदेशी ‘कवच 4.0’ जैसी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन प्रणाली और सुरक्षा बजट में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की बदौलत ट्रेन दुर्घटनाओं में 88% की कमी दर्ज की गई है। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में बताया कि जहां वित्त वर्ष 2014-15 में 135 ट्रेन हादसे हुए थे, वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर सिर्फ 16 रह गई। जून 2026 तक देश में केवल 2 ट्रेन दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं।
12 साल में कैसे बदली भारतीय रेलवे की तस्वीर?
भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में शामिल है, जहां हर दिन करोड़ों यात्री सफर करते हैं। इतने विशाल नेटवर्क में सुरक्षा बनाए रखना हमेशा सबसे बड़ी चुनौती रही है। पिछले एक दशक में रेलवे ने ट्रैक, सिग्नलिंग, कोच, लोकोमोटिव और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम में बड़े निवेश किए हैं, जिनका असर अब आंकड़ों में साफ दिखाई दे रहा है।
रेल मंत्रालय के अनुसार, दुर्घटना सूचकांक (Accident Index) भी 2014-15 के 0.11 से घटकर 2025-26 में 0.01 पर पहुंच गया है, यानी करीब 91% की गिरावट।
सुरक्षा बजट में रिकॉर्ड बढ़ोतरी बनी सबसे बड़ा कारण
रेलवे ने सुरक्षा से जुड़े कार्यों पर खर्च में लगातार इजाफा किया है।
| वित्त वर्ष | सुरक्षा बजट |
|---|---|
| 2013-14 | ₹39,200 करोड़ |
| 2022-23 | ₹87,336 करोड़ |
| 2023-24 | ₹1,01,662 करोड़ |
| 2024-25 | ₹1,14,022 करोड़ |
| 2025-26 | ₹1,17,693 करोड़ |
| 2026-27 | ₹1,20,389 करोड़ |
इस बढ़े हुए निवेश का उपयोग ट्रैक अपग्रेड, सिग्नलिंग सिस्टम, पुलों की मजबूती, आधुनिक कोच, फायर सेफ्टी और डिजिटल सुरक्षा तकनीकों में किया गया।
सिग्नलिंग सिस्टम हुआ पूरी तरह आधुनिक
रेलवे ने मानवीय भूलों को कम करने के लिए सिग्नलिंग सिस्टम में बड़े बदलाव किए हैं।
मुख्य उपलब्धियां:
- 30 जून 2026 तक 6,671 स्टेशनों पर इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम लागू।
- 10,395 लेवल क्रॉसिंग फाटकों की इंटरलॉकिंग पूरी।
- सभी संबंधित स्टेशनों पर Complete Track Circuiting की सुविधा।
- सिग्नलिंग कार्यों के लिए सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू।
- डिस्कनेक्शन और रीकनेक्शन प्रक्रिया को पूरी तरह मानकीकृत किया गया।
इन सुधारों से सिग्नल फेलियर और ऑपरेशन संबंधी दुर्घटनाओं का जोखिम काफी कम हुआ है।
लोको पायलटों के लिए बढ़ाई गई सुरक्षा
रेलवे ने ट्रेन चालकों की सतर्कता बढ़ाने के लिए भी कई आधुनिक तकनीकें अपनाई हैं।
इनमें शामिल हैं:
- सभी लोकोमोटिव में Vigilance Control Device (VCD)।
- कोहरे वाले क्षेत्रों में GPS आधारित Fog Safety Device (FSD)।
- सिग्नल से पहले Retro Reflective Sigma Board लगाए गए।
- कम दृश्यता में भी सिग्नल और लेवल क्रॉसिंग की पहले से जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है।
इससे खराब मौसम में भी ट्रेन संचालन पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हुआ है।
ट्रैक सुरक्षा पर विशेष फोकस
रेलवे ने ट्रैक टूटने और पटरी उखड़ने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए आधुनिक तकनीक अपनाई है।
इसके तहत:
- 60 किलोग्राम, 90 UTS रेल का उपयोग।
- प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट (PSC) स्लीपर।
- PQRS, TRT और T-28 जैसी आधुनिक ट्रैक मशीनें।
- 130 और 260 मीटर लंबे रेल पैनलों का इस्तेमाल।
- Ultrasonic Flaw Detection (USFD) टेस्ट।
- Flash Butt Welding तकनीक।
- Track Recording Car और Oscillation Monitoring System से नियमित निगरानी।
- वेब आधारित ऑनलाइन मेंटेनेंस मॉनिटरिंग सिस्टम लागू।
एलएचबी कोच और फायर सेफ्टी से बढ़ी यात्रियों की सुरक्षा
रेलवे ने पुराने ICF कोचों की जगह तेजी से सुरक्षित LHB कोच शामिल किए हैं।
साथ ही:
- जनवरी 2019 तक सभी ब्रॉडगेज मानवरहित लेवल क्रॉसिंग समाप्त।
- रेल पुलों का नियमित निरीक्षण।
- सभी कोचों में फायर सेफ्टी निर्देश।
- नई पावर और पेंट्री कारों में Fire Detection & Suppression System।
- पुराने कोचों में चरणबद्ध तरीके से स्मोक और फायर डिटेक्शन सिस्टम लगाया जा रहा है।
‘कवच 4.0’ बना रेलवे सुरक्षा का सबसे बड़ा हथियार
भारतीय रेलवे की स्वदेशी Automatic Train Protection (ATP) प्रणाली ‘कवच 4.0’ सुरक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जा रही है।
यह तकनीक:
- लोको पायलट की गलती होने पर स्वतः ब्रेक लगाती है।
- ट्रेन को निर्धारित गति सीमा के भीतर रखती है।
- टक्कर की संभावना को काफी हद तक कम करती है।
- इसे SIL-4 स्तर का उच्च सुरक्षा प्रमाणन प्राप्त है।
फरवरी 2016 में इसका पहला परीक्षण हुआ था और जुलाई 2020 में इसे राष्ट्रीय एटीपी प्रणाली के रूप में अपनाया गया। 16 जुलाई 2024 को RDSO ने कवच 4.0 को मंजूरी दी।
दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा रूट पर सफल संचालन
20 जुलाई 2026 तक 2,569 रूट किलोमीटर पर कवच 4.0 सफलतापूर्वक चालू किया जा चुका है।
इसमें शामिल हैं:
- दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर: 1,423 रूट किमी
- दिल्ली-हावड़ा कॉरिडोर: 1,146 रूट किमी
दिल्ली-मुंबई मार्ग पर तिलक ब्रिज, पलवल, मथुरा, कोटा, रतलाम, वडोदरा, विरार और अहमदाबाद सेक्शन कवर किए जा चुके हैं।
जबकि दिल्ली-हावड़ा मार्ग पर चिपियाना, टूंडला, कानपुर, सूबेदारगंज, गया, सासाराम, बर्द्धमान और हावड़ा सेक्शन में कवच चालू हो चुका है।
पूरे देश में तेजी से हो रहा कवच का विस्तार
रेल मंत्रालय के अनुसार, कवच तकनीक का विस्तार तेजी से जारी है।
अब तक की प्रगति:
- 21,858 रूट किमी पर कार्य जारी।
- 11,253 किमी ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाई गई।
- 1,668 टेलीकॉम टावर स्थापित।
- 988 स्टेशन डेटा सेंटर तैयार।
- 7,726 रूट किमी पर ट्रैक साइड उपकरण लगाए गए।
- 6,153 लोकोमोटिव में कवच स्थापित।
- 7,327 अतिरिक्त लोकोमोटिव और 1,200 EMU/MEMU ट्रेनों में इंस्टॉलेशन का काम जारी।
निष्कर्ष
भारतीय रेलवे ने पिछले 12 वर्षों में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए तकनीक, इंफ्रास्ट्रक्चर और आधुनिक निगरानी प्रणालियों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। सुरक्षा बजट में रिकॉर्ड वृद्धि, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग, मजबूत ट्रैक, एलएचबी कोच, फायर सेफ्टी सिस्टम और खासकर ‘कवच 4.0’ जैसी स्वदेशी तकनीक ने ट्रेन दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि इसी गति से आधुनिकीकरण जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे सुरक्षित रेल नेटवर्क में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।


