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Reading: India Vs Pakistan Vs Bangladesh: पड़ोसियों की मुद्रा के मुकाबले क्यों कमजोर हुआ भारतीय रुपया? जानिए पूरी कहानी
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India Vs Pakistan Vs Bangladesh: पड़ोसियों की मुद्रा के मुकाबले क्यों कमजोर हुआ भारतीय रुपया? जानिए पूरी कहानी

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 11:49 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाती है। इसके बावजूद पिछले एक साल में भारतीय रुपया अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश की मुद्रा के मुकाबले कमजोर हुआ है। यह बदलाव सिर्फ विदेशी मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आम लोगों की जेब, विदेश यात्रा, पढ़ाई, व्यापार और महंगाई तक पर दिखाई देने लगा है।

Contents
एक साल में कितना कमजोर हुआ रुपया?भारतीय रुपये पर दबाव क्यों बढ़ा?अमेरिका-ईरान तनाव का असरविदेशी निवेश में कमी भी बड़ी वजहडॉलर के मुकाबले भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपयाआम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?1. विदेश यात्रा महंगी2. विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ेगा3. आयातित सामान महंगे4. महंगाई बढ़ने का खतराक्या पाकिस्तान और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत से बेहतर हो गई?आगे क्या हो सकता है?निष्कर्ष

हालिया आंकड़ों के अनुसार मई 2025 से मई 2026 के बीच भारतीय रुपया पाकिस्तानी रुपये और बांग्लादेशी टका दोनों के मुकाबले कमजोर हुआ है। ऐसे समय में जब अमेरिकी डॉलर पहले ही मजबूत बना हुआ है, रुपये पर यह अतिरिक्त दबाव भारत की आर्थिक चुनौतियों को और बढ़ाता दिख रहा है।

एक साल में कितना कमजोर हुआ रुपया?

द इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार मई 2025 में 1 भारतीय रुपया लगभग 3.29 पाकिस्तानी रुपये के बराबर था। मई 2026 तक यह घटकर करीब 2.90 पाकिस्तानी रुपये पर पहुंच गया। यानी एक साल में भारतीय मुद्रा में लगभग 11.86 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बांग्लादेशी टका के मुकाबले भी भारतीय रुपया कमजोर हुआ है। मई 2025 में 1 भारतीय रुपया करीब 1.42 टका के बराबर था, जो अब घटकर लगभग 1.28 टका रह गया है। यह करीब 10 फीसदी की गिरावट मानी जा रही है।

हालांकि दीर्घकालिक तस्वीर देखें तो पिछले एक दशक में भारतीय रुपया पाकिस्तानी मुद्रा के मुकाबले काफी मजबूत रहा है। लेकिन हालिया गिरावट ने निवेशकों और अर्थशास्त्रियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।


भारतीय रुपये पर दबाव क्यों बढ़ा?

भारतीय मुद्रा की कमजोरी के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी को माना जा रहा है।

भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होने लगता है।

अमेरिका-ईरान तनाव का असर

बीते कुछ महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। खासतौर पर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बढ़ी चिंताओं ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर असर डाला है।

होर्मुज स्ट्रेट को दुनिया की तेल सप्लाई की सबसे अहम लाइफलाइन माना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से दुनिया भर में पहुंचता है। किसी भी तरह की बाधा तेल की कीमतों को तेजी से ऊपर ले जाती है।

तेल महंगा होने का सीधा असर भारत जैसे आयात आधारित देशों पर पड़ता है। इससे: आयात बिल बढ़ता है, चालू खाता घाटा बढ़ता है, महंगाई का दबाव बढ़ता है, रुपये पर दबाव आता है.


विदेशी निवेश में कमी भी बड़ी वजह

भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की भूमिका काफी बड़ी होती है। लेकिन हाल के महीनों में वैश्विक बॉन्ड यील्ड बढ़ने के कारण विदेशी निवेशकों ने उभरते बाजारों से पैसा निकालना शुरू किया है।

अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने से निवेशकों को वहां सुरक्षित और बेहतर रिटर्न मिल रहा है। ऐसे में भारत जैसे बाजारों से पूंजी का बाहर जाना रुपये को कमजोर कर रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार: विदेशी निवेश घटने से डॉलर की उपलब्धता कम होती है, आयातकों की डॉलर मांग बढ़ती है, रिजर्व बैंक पर दबाव बढ़ता है, मुद्रा में गिरावट तेज हो सकती है


डॉलर के मुकाबले भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया

भारतीय रुपया पहले ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच चुका है। हाल में रुपया 96.96 प्रति डॉलर तक गिर गया। जब डॉलर मजबूत होता है तो दुनिया की ज्यादातर मुद्राओं पर दबाव आता है। लेकिन भारत के मामले में तेल आयात और विदेशी निवेश निकासी ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है।

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि रुपया पिछले कई तिमाहियों से कमजोर प्रदर्शन करने वाली प्रमुख एशियाई मुद्राओं में शामिल रहा है।


आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

रुपये की कमजोरी सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है। इसका असर सीधे आम नागरिकों की जिंदगी पर पड़ता है।

1. विदेश यात्रा महंगी

अगर रुपया कमजोर होता है तो विदेश घूमना महंगा हो जाता है क्योंकि डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

2. विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ेगा

अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों को ज्यादा फीस और रहने का खर्च उठाना पड़ सकता है।

3. आयातित सामान महंगे

मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, पेट्रोल-डीजल और कई विदेशी उत्पाद महंगे हो सकते हैं।

4. महंगाई बढ़ने का खतरा

तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है। इसका असर सब्जी, दूध, किराना और रोजमर्रा के सामान पर भी पड़ता है।


क्या पाकिस्तान और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत से बेहतर हो गई?

Pakistan can feel proud that the PKR is trashing the INR. While the Indian rupee has depreciated almost 10% against the dollar, the Pakistani currency has appreciated approximately 0.7%.

Unfortunately, there are some curmudgeons who might ask why India is allowing its currency… pic.twitter.com/wPwaDEv23X

— Javed Hassan (@javedhassan) May 20, 2026

सिर्फ मुद्रा के आधार पर यह कहना गलत होगा कि पाकिस्तान या बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत से मजबूत हो गई है।

मुद्रा की चाल कई कारणों से प्रभावित होती है: केंद्रीय बैंक की नीति, विदेशी मुद्रा भंडार, आयात-निर्यात संतुलन, ब्याज दरें, राजनीतिक स्थिति, निवेश प्रवाह

भारत अभी भी: जीडीपी आकार में बहुत बड़ा है, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत रखता है, वैश्विक निवेशकों के लिए बड़ा बाजार बना हुआ है हालांकि अल्पकाल में रुपये की कमजोरी आर्थिक दबाव का संकेत जरूर देती है।


आगे क्या हो सकता है?

विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में रुपये की दिशा काफी हद तक इन बातों पर निर्भर करेगी: कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिका की ब्याज दरें, विदेशी निवेश प्रवाह, भू-राजनीतिक तनाव, भारत की महंगाई दर.

अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और वैश्विक निवेशक सुरक्षित बाजारों की ओर पैसा लगाते रहते हैं, तो रुपये में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है।

हालांकि अगर: तेल की कीमतें नियंत्रित होती हैं, विदेशी निवेश लौटता है, निर्यात मजबूत होता है तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है।


निष्कर्ष

भारतीय रुपये का पाकिस्तान और बांग्लादेश की मुद्रा के मुकाबले कमजोर होना एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेत है। इसके पीछे वैश्विक तेल संकट, विदेशी निवेश में कमी और डॉलर की मजबूती जैसे कई बड़े कारण काम कर रहे हैं।

हालांकि दीर्घकालिक दृष्टि से भारत की अर्थव्यवस्था अब भी मजबूत मानी जाती है, लेकिन रुपये पर बढ़ता दबाव सरकार और रिजर्व बैंक दोनों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। आने वाले महीनों में वैश्विक हालात और ऊर्जा बाजार की दिशा तय करेगी कि भारतीय मुद्रा को राहत मिलेगी या दबाव और बढ़ेगा।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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