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Trade Deficit Crisis: इलेक्ट्रॉनिक्स आयात ने बढ़ाई भारत की टेंशन, 2026 तक दबाव में रह सकता है व्यापार घाटा

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 10:44 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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7 Min Read
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भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) आने वाले महीनों में और बढ़ सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में तेज उछाल, महंगा कच्चा तेल और वैश्विक मांग में कमजोरी को माना जा रहा है। Nuvama Institutional Equities की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 के दौरान भारत के निर्यात पर दबाव बना रह सकता है, जबकि आयात बिल लगातार बढ़ रहा है।

Contents
अप्रैल में तेजी से बढ़ा व्यापार घाटाइलेक्ट्रॉनिक्स आयात बना सबसे बड़ा खतरानिर्यात में सुधार, लेकिन स्थिति अभी कमजोरवैश्विक संकट का भारत पर असररुपये की कमजोरी से मिल सकती है राहत?सोने पर बढ़ी ड्यूटी से क्या होगा फायदा?भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या?

विशेष रूप से मोबाइल, चिप्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग ने भारत के आयात खर्च को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया है। दूसरी ओर, लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स जैसे टेक्सटाइल, चमड़ा और छोटे मैन्युफैक्चरिंग निर्यात में कमजोरी दिखाई दे रही है।

अप्रैल में तेजी से बढ़ा व्यापार घाटा

रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2026 में भारत का वस्तु व्यापार घाटा बढ़कर 28 अरब डॉलर पहुंच गया, जो मार्च में 21 अरब डॉलर था। केवल एक महीने में 7 अरब डॉलर की बढ़ोतरी ने अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।

इस बढ़ोतरी में सबसे बड़ा योगदान तेल और सोने के आयात का रहा। दोनों सेक्टर्स का घाटा लगभग 2-2 अरब डॉलर बढ़ा। हालांकि असली चिंता “कोर डेफिसिट” को लेकर है, यानी तेल और सोने को हटाकर जो व्यापार घाटा बचता है।

मार्च में यह आंकड़ा 9 अरब डॉलर था, जो अप्रैल में बढ़कर 13 अरब डॉलर हो गया। इसका मतलब है कि देश का आयात दबाव केवल तेल या सोने तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स और कृषि उत्पादों में भी तेजी से बढ़ रहा है।

इलेक्ट्रॉनिक्स आयात बना सबसे बड़ा खतरा

रिपोर्ट की सबसे बड़ी चिंता इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को लेकर है। भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापार घाटा अप्रैल में 7.6 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। केवल एक महीने में इसमें 0.7 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई।

आज भारत दुनिया के सबसे बड़े स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, सर्वर चिप्स, सेमीकंडक्टर पार्ट्स और हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की भारी मांग देश के आयात बिल को तेजी से बढ़ा रही है।

हालांकि भारत में लोकल मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के लिए PLI योजना जैसी नीतियां लागू की गई हैं, लेकिन अभी भी कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए देश चीन, ताइवान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम पर निर्भर है।

यही वजह है कि इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट बढ़ने के बावजूद आयात उससे कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है।

निर्यात में सुधार, लेकिन स्थिति अभी कमजोर

अप्रैल में भारत के कुल निर्यात में सालाना आधार पर 14% की वृद्धि दर्ज की गई। मार्च में इसमें 7.4% की गिरावट आई थी। पहली नजर में यह आंकड़ा मजबूत दिखता है, लेकिन रिपोर्ट कहती है कि इसकी असली गति अभी भी कमजोर बनी हुई है। ट्रेंड बेसिस पर निर्यात वृद्धि केवल 1.6% रही, जबकि मार्च में यह -2.8% थी। इसका मतलब है कि सुधार जरूर आया है, लेकिन वैश्विक मांग अभी भी कमजोर है।

नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट्स में भी मामूली सुधार हुआ। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 1% से बढ़कर 13% हो गया, जो सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। लेकिन टेक्सटाइल, फुटवियर और अन्य श्रम-आधारित निर्यात सेक्टर्स में दबाव जारी है। रिपोर्ट के अनुसार लेबर-इंटेंसिव एक्सपोर्ट्स अभी भी ट्रेंड बेसिस पर 9% की गिरावट में हैं।

वैश्विक संकट का भारत पर असर

भारत की व्यापार स्थिति पर कई अंतरराष्ट्रीय कारकों का दबाव है।

  • पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं
  • वैश्विक सप्लाई चेन में रुकावटें जारी हैं
  • अमेरिका और यूरोप में मांग कमजोर पड़ने लगी है
  • चीन की धीमी अर्थव्यवस्था का असर एशियाई व्यापार पर दिख रहा है

अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था में और सुस्ती आती है, तो भारत के निर्यात सेक्टर पर दबाव और बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में आईटी, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और केमिकल निर्यात प्रभावित हो सकते हैं।

रुपये की कमजोरी से मिल सकती है राहत?

रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपये में गिरावट भारत के निर्यातकों को कुछ राहत दे सकती है। जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते दिखाई देते हैं। इससे निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

हालांकि इसका दूसरा असर यह भी होता है कि तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आयात और महंगे हो जाते हैं। यानी रुपये की कमजोरी एक तरफ निर्यातकों को फायदा देती है, लेकिन दूसरी तरफ आयात बिल बढ़ाकर व्यापार घाटा और बढ़ा सकती है।

सोने पर बढ़ी ड्यूटी से क्या होगा फायदा?

हाल ही में सरकार ने बुलियन इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाई है। रिपोर्ट के अनुसार इससे सोने के आयात बिल को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड इंपोर्टर्स में शामिल है। जब भी वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, देश में सोने की मांग तेज हो जाती है।सरकार का मानना है कि आयात शुल्क बढ़ाने से गोल्ड इंपोर्ट कम होगा और विदेशी मुद्रा पर दबाव घटेगा।

हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर सोने की घरेलू मांग बहुत मजबूत रही, तो इसका असर सीमित रह सकता है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या?

इस पूरी रिपोर्ट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि भारत की घरेलू मांग अभी मजबूत बनी हुई है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी सेक्टर में। लेकिन बाहरी मांग कमजोर पड़ रही है। यानी देश के लोग ज्यादा खरीदारी कर रहे हैं, लेकिन दुनिया भारतीय सामान उतनी तेजी से नहीं खरीद रही। यही असंतुलन व्यापार घाटे को बढ़ा रहा है।

अगर आने वाले महीनों में तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं और वैश्विक मांग कमजोर रहती है, तो भारत के चालू खाते और रुपये दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत को अब केवल आयात कम करने पर नहीं, बल्कि हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी निर्यात बढ़ाने पर तेजी से काम करना होगा। वरना इलेक्ट्रॉनिक्स आयात आने वाले वर्षों में भारत के लिए नया “ऑयल शॉक” बन सकता है।

Source: ANI

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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