पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब सिर्फ भू-राजनीतिक संकट नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं, ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य उत्पादन पर भी तेजी से दिखने लगा है। भारत जैसे देश, जो कच्चे तेल, गैस और उर्वरक आयात पर काफी निर्भर हैं, उनके लिए यह संकट वित्तीय दबाव में बदलता जा रहा है। इसी बीच जाने-माने आर्थिक विश्लेषक Swaminathan S. Anklesaria Aiyar ने उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में बड़े सुधार की जरूरत पर जोर दिया है।
उनका कहना है कि अगर सरकार मौजूदा हालात को अवसर के रूप में इस्तेमाल करे, तो भारत न केवल अरबों डॉलर की सब्सिडी बचा सकता है बल्कि छोटे किसानों को सीधे नकद सहायता देकर ज्यादा प्रभावी कृषि व्यवस्था भी बना सकता है। अय्यर ने सुझाव दिया है कि सरकार उर्वरकों की कीमतों को बाजार के अनुसार तय होने दे और इसके बदले हर किसान को सीधे ₹5000 की सहायता राशि बैंक खाते में दे।
ईरान युद्ध ने क्यों बढ़ाई भारत की चिंता?
ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते संघर्ष का सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का बेहद महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। यहां तनाव बढ़ने से कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की कीमतों में तेज उछाल आया है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। इसके अलावा यूरिया, पोटाश और प्राकृतिक गैस जैसे कृषि इनपुट्स में भी आयात पर बड़ी निर्भरता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी सीधे सरकार की सब्सिडी लागत बढ़ा रही है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के हवाले से बताया गया कि ब्रेंट क्रूड करीब 51% महंगा हुआ, यूरिया और अमोनिया में लगभग 65% तेजी आई, ब्यूटेन की कीमतें 51% बढ़ीं ये केवल अस्थायी उतार-चढ़ाव नहीं माने जा रहे, बल्कि अगले एक साल तक सप्लाई दबाव बने रहने की आशंका जताई जा रही है।
भारत की सब्सिडी व्यवस्था पर कितना दबाव?
सरकार पहले से ही पेट्रोल, डीजल, LPG और उर्वरकों पर भारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडी दे रही है। जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं, तब यह बोझ और तेजी से बढ़ जाता है।
उदाहरण के तौर पर:
| सेक्टर | स्थिति |
|---|---|
| यूरिया | 45 किलो बैग किसानों को ₹300 से कम में |
| वास्तविक आयात लागत | लगभग ₹3000 प्रति बैग |
| घरेलू LPG | अंतरराष्ट्रीय कीमतों के मुकाबले काफी सस्ता |
| पेट्रोल-डीजल | एक्साइज कटौती से सरकार को राजस्व नुकसान |
इसका असर सीधे वित्तीय घाटे और रुपये पर पड़ रहा है। हाल के महीनों में रुपया भी डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर हुआ है।
क्यों बिगड़ रहा है उर्वरक उपयोग का संतुलन?
भारत की मौजूदा उर्वरक नीति पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। यूरिया पर भारी सब्सिडी होने के कारण किसान नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि पोटाश और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों का उपयोग अपेक्षाकृत कम हो रहा है।
इसका असर कई स्तरों पर दिख रहा है:
- मिट्टी की गुणवत्ता कमजोर हो रही
- कृषि उत्पादकता पर दीर्घकालिक असर
- भूजल और पर्यावरणीय नुकसान
- उर्वरक असंतुलन बढ़ रहा
कृषि विशेषज्ञ लंबे समय से Nutrient-Based Subsidy (NBS) मॉडल को मजबूत करने की बात करते रहे हैं, लेकिन राजनीतिक कारणों से यूरिया को पूरी तरह बाजार आधारित मूल्य प्रणाली में नहीं लाया गया।
तस्करी और दुरुपयोग भी बड़ी समस्या
कम कीमत के कारण भारत का सब्सिडी वाला यूरिया पड़ोसी देशों तक पहुंच जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक बड़ी मात्रा में यूरिया की तस्करी बांग्लादेश और नेपाल तक होती है। कुछ मामलों में इसका इस्तेमाल रासायनिक उद्योगों में भी किया जाता है।
यानी सरकार जिस सब्सिडी का उद्देश्य किसानों को राहत देना बताती है, उसका पूरा लाभ वास्तविक किसानों तक नहीं पहुंचता।
किसानों को सीधे ₹5000 देने का प्रस्ताव क्या है?
अय्यर का सुझाव है कि सरकार उर्वरकों की कीमतों को नियंत्रणमुक्त करे, सभी किसानों को सीधे नकद सहायता दे, DBT मॉडल के जरिए बैंक खातों में पैसा भेजे
उनके अनुसार ₹5000 की समान सहायता छोटे किसानों के लिए पर्याप्त राहत बन सकती है, 2 हेक्टेयर से कम जमीन वाले 89% किसानों को फायदा दे सकती है, उर्वरक उपयोग में संतुलन ला सकती है, सरकारी लीकेज और तस्करी कम कर सकती है यह मॉडल कुछ हद तक PM-KISAN जैसी प्रत्यक्ष सहायता योजनाओं की तरह काम कर सकता है।
क्या सरकार इतना बड़ा फैसला ले सकती है?
यही सबसे बड़ा सवाल है। भारत में कृषि राजनीति बेहद संवेदनशील मानी जाती है। उर्वरक कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर खेती की लागत पर पड़ता है, इसलिए सरकारें आमतौर पर ऐसे फैसलों से बचती रही हैं।
लेकिन मौजूदा वैश्विक संकट ने सरकार के सामने कठिन विकल्प खड़े कर दिए हैं या तो सब्सिडी बोझ लगातार बढ़ता रहे या फिर संरचनात्मक सुधार किए जाएं
अय्यर का तर्क है कि अभी राजनीतिक रूप से भी सरकार के पास अवसर है क्योंकि निकट भविष्य में बड़े चुनाव नहीं हैं।
अर्थव्यवस्था पर क्या असर हो सकता है?
अगर सरकार उर्वरक सब्सिडी में सुधार करती है, तो इसके कई संभावित प्रभाव हो सकते हैं:
सकारात्मक असर
- राजकोषीय घाटा कम हो सकता है
- रुपये पर दबाव घट सकता है
- उर्वरक उपयोग संतुलित हो सकता है
- लीकेज और तस्करी कम होगी
- छोटे किसानों को सीधे लाभ मिलेगा
संभावित चुनौतियां
- शुरुआती दौर में खेती लागत बढ़ सकती है
- बड़े किसान विरोध कर सकते हैं
- खाद्य महंगाई बढ़ने का जोखिम
- राजनीतिक विरोध संभव
क्या भारत सब्सिडी मॉडल बदलने की ओर बढ़ रहा है?
पिछले कुछ वर्षों में सरकार Direct Benefit Transfer मॉडल को कई क्षेत्रों में बढ़ा चुकी है। LPG सब्सिडी से लेकर किसानों की आय सहायता तक, नकद हस्तांतरण पर जोर बढ़ा है। ऐसे में भविष्य में उर्वरक सेक्टर में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि किसी भी बड़े सुधार के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और चरणबद्ध क्रियान्वयन जरूरी होगा।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध और ऊर्जा संकट ने भारत को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या मौजूदा सब्सिडी मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ है। उर्वरक सब्सिडी पर हर साल लाखों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद मिट्टी की गुणवत्ता, कृषि दक्षता और वित्तीय स्थिरता जैसे सवाल बने हुए हैं।
ऐसे में किसानों को सीधे सहायता देकर उर्वरक बाजार को धीरे-धीरे मुक्त करने का विचार आने वाले समय में राष्ट्रीय बहस का बड़ा विषय बन सकता है। सवाल सिर्फ आर्थिक नहीं है, बल्कि यह भारत की खाद्य सुरक्षा, कृषि सुधार और वित्तीय अनुशासन से भी जुड़ा हुआ है।
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